vigyan
मूल-लेखक — वसतुल्लाह खान

अनुवाद- अफज़ल खान

कोई भी अक़ीदा ( विश्वास ) हो उसका अपना दिव्य व भौतिक प्रणाली तथ्यों और तर्क होता है और यह प्रणाली बिना शर्त स्वीकृति की मांग करता है। जबकि विज्ञान का ज्ञान विशुद्ध भौतिक आधार पर तथ्यों की तलाश का नाम है। इसलिए अपनी जगह पर कायम मान्यताओं के विपरीत विज्ञान हमेशा अस्वीकार व स्वीकार के कसौटी पर चढ़ी रहती है।

अक़ीदा ( विश्वास ) में सवाल की गुंजाइश बहुत कम होती है जबकि विज्ञान की तो आहार ही हर ऑन सवाल उठाया है। इसलिए जब कोई दैवी विश्वास भौतिक विज्ञान भ्रमित करने की कोशिश करता है तो उसके परिणाम में जन्म लेने वाले कंफ्यूजन का अंतिम नुकसान अंततः विश्वास और विज्ञान को ही उठाना पड़ता है। इस संदर्भ में मुझ जैसे नासमझों के लिए यह समझना खासा मुश्किल है कि इंसान तो हिंदू, यहूदी, ईसाई और मुसलमान हो सकता है। विज्ञान हिंदू, यहूदी, ईसाई और मुसलमान कैसे हो सकती है। इसका यह मतलब कतई नहीं है कि वैज्ञानिक के लिए ला धर्म होना चाहिए।

जाबिर बिन हयान, उमर खयाम, इब्न-हैशम , अलबेरूनी इदरिस, तूसी और इब्ने सीना आधुनिक विज्ञान के महान स्तंभ थे और प्रार्थना उपवास और अन्य अधिनियमों का भी आयोजन करते थे। आरिया भट्ट, लगाधा, भास्कर, बधीाना, आचार्य चन्दाज्यरा आदि प्राचीन भारत में ज्ञान खगोल विज्ञान, गणित, भाषा विज्ञान, चिकित्सा और धातु निर्माण अनुसंधान में झंडे भी गाड़ रहे थे और मंदिर में देवताओं के चरण भी छूते थे। न्यूटन गुरुत्वाकर्षण पर भी काम कर रहा था लेकिन चर्च जाना नहीं भूलता था। आयन ासटाईन कभी नहीं कहा कि उसका विचार ाज़ाफ़्त टोरा की महानता का सबूत है। इन सब महान वैज्ञानिकों ने विश्वास और प्रयोगशाला दिल में साथ साथ और मन में अलग अलग रखा।

मगर जो काम कल तक नहीं हुआ वह आज हो रहा है। जो भारत मंगल पर अंतरिक्ष यान भेज रहा है उसी भारत का प्रधानमंत्री यह भी कह रहा है कि गणेश जी के शरीर पर हाथी का सिर साबित करता है कि यह काम हजारों साल पहले किसी प्लास्टिक सर्जन ने किया होगा। गुजरात में विशेषज्ञ शिक्षा जगदीश बत्रा जी की जो किताबें स्कूलों में पढ़ाई जा रही हैं उनमें बताया जा रहा है कि महाभारत के युग में मोटर कार कैसे आविष्कार हुआ?

पिछले हफ्ते ही मुंबई विश्वविद्यालय में पांच दिवसीय अंतरराष्ट्रीय विज्ञान सम्मेलन में भारत और बाहरी दुनिया के लगभग बारह हजार शोधकर्ता और वैज्ञानिक शरीक हुए। उद्घाटन सत्र में केंद्रीय मंत्री विज्ञान और प्रौद्योगिकी हर्ष वर्धन ने प्रतिभागियों को अपने ज्ञान से सम्मानित करते हुए कहा कि बीजगणित के प्रारंभिक सिद्धांत भारत वर्ष में संकलित हुए लेकिन अरबों जब बीजगणित पर दावा बोला तो हम चुप बैठे रहे। गणित फ़ेता गोरत थीवरीम हजारों साल से भारत में उपयोग हो रहा है मगर उसे यूनानियों ने जाने क्यों अपने नाम से प्रसिद्ध कर दिया।

इसी सम्मेलन में एक सत्र प्राचीन संस्कृति सिद्धांतों के शीर्षक से आयोजित हुआ। प्राचीन भारत में उड्डयन के बारे में पायलट प्रशिक्षण स्कूल के पूर्व प्रिंसिपल कैप्टन आनंद बोडरस अपने मकाले में बताया कि महा ऋषि भारद्वाज ने सात हजार साल पहले लिखा है कि भारत में साठ फुट से दो सौ फुट तक चौड़े विमान उड़ते थे। बड़े जहाजों में चालीस छोटे इंजन स्थापित थे। यह विमान दूसरे देशों तक भी उड़ान भरते थे और रडार के लिए प्राचीन संस्कृत में रोपर किन रहस्य का शबध तक मौजूद है।

एक ऐसा देश जहां अमेरिका के बाद सबसे अधिक वैज्ञानिक बताए जाते हैं। जहां वैज्ञानिकों की एसोसिएशन एक सौ दो साल से स्थापित है और लगभग तीस हजार वैज्ञानिक विशेषज्ञ इसके सदस्य हैं और जहां उन्नीस सौ बारह से वार्षिक राष्ट्रीय विज्ञान सम्मेलन आयोजित हो रही है। यह बात अब से पहले क्यों किसी भारतीय विज्ञान मंच पर धड़ल्ले से नहीं हुई कि सात हजार साल पहले भारत में प्लास्टिक सर्जन भी थे, मोटर कार भी थी, जहाज भी उड़ रहे थे। यह सब नरेंद्र मोदी सरकार में ही क्यों सामने आ रहा है?

चूंकि मोदी की मूल संगठन आरएसएस और आरएसएस के तुफैल संगठन हर वस्तुहिंदुत्व के आईने में देखने की आदी है, इसलिए वह हर क्षेत्र को अपने नजरिए से जोड़कर दिखाने के जुनून से ग्रस्त हैं। जहां तर्कसंगत चर्चा इस स्तर पर आ जाए कि भाजपा के एक सांसद योगी आदित्य नाथ खुलासा करें कि इस दुनिया में पैदा होने वाला हर बच्चा हिंदू होता है बाद में उसका धर्म जबरदस्ती बदलो दिया जाता है और इसके जवाब में मजलिस एकता ब्रदरहुड के सांसद असद उद्दीन ओवैसी यह दावा करें कि दरअसल हर बच्चा मुसलमान पैदा होता है।

एक और सांसद यह खुलासा करें कि रावण दरअसल दिल्ली के नजदीक गाजियाबाद में पैदा हुआ और एक साहब उठकर कहीं कि ताजमहल एक मंदिर की नींव पर खड़ा है और इंडियन हिस्ट्री आयोग के वर्तमान अध्यक्ष यह रखें कि जो भी वेदों में है वह कोई प्रतीकात्मक किस्से नहीं बल्कि जैसा लिखा है वैसा ही वास्तव में हुआ भी है। इसलिए रामायण के होते हमें किसी और खोज और अनुसंधान में पड़ने की जरूरत नहीं। ऐसे माहौल में अगर सात हजार साल पहले जहाज उड़ाया जा रहा है तो आश्चर्य क्यों?

भारत पर तो यह समय आज पड़ा है। पाकिस्तान तो इस चरण से छत्तीस चौनतीस वर्ष पहले ही पारित कर दिया। पाकिस्तान में विज्ञान सम्मेलन वर्ष 1948 से हो रही हैं। लेकिन जिस तरह अनुसंधान ज़िया दौर में हुई न पहले हुई न बाद में। इस दौर अनुसंधान विशेषज्ञ भौतिकी प्रोीज़होद भाई सहित कई साथी विज्ञान समेटने की कोशिश की।

मसलन पाकिस्तान एटॉमिक एनर्जी कमीशन के वरिष्ठ साइनटसट डॉक्टर बशीर उद्दीन महमूद 1980 में यह सिद्धांत पेश किया कि चूंकि से जिन्नात ( दानव ) आग से बने हैं इसलिए उन्हें काबू में लाकर उन्हें ऊर्जा पैदा की जा सकती है।

जनरल ऑफ साइंस एण्ड टेक्नोलॉजी इन दी इस्लामिक विश्व में डॉक्टर सफदरजंग राजपूत ने अपने शोध मकाले में बताया किजिन्नात ( दानव ) दरअसल मीथेन गैस से बनते हैं। मीथेन न केवल बे स्वाद व बे गंध है बल्कि उसके जलने की प्रक्रिया में धूम्रपान नहीं उठता। यही कारण है कि दानव अस्तित्व रखते हुए भी आम लोगों को दिखाई नहीं देते। उन्होंने यह भी बताया कि दानव सफेद होते हैं (हालांकि दिखाई नहीं देते)।

पाकिस्तान एसोसिएशन ऑफ साइंस एण्ड वैज्ञानिक पेशेवरों जून 1986 में कुरान और विज्ञान के विषय पर अंतरराष्ट्रीय सेमिनार करवाया इसमें पाकिस्तान काउंसिल फॉर वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान (पीसी आईआर) के एक प्रमुख विशेषज्ञ डॉक्टर अरशद अली बेग ने अपने शोध मकाले समाज में पाखंड की मात्रा नापने का फार्मूला पेश किया। आपने बताया कि उनके निर्मित स्केल पश्चिमी समाजों में पाखंड बाईस के पैमाने पर है और अगर व्यक्तिगत अध्ययन किया जाए तो स्पेन और पुर्तगाल आदि में सामाजिक पाखंड चौदह स्केल पर है। डॉक्टर साहब शायद समय की कमी के कारण पाकिस्तानी समाज का पाखंड स्केल न बता पाए।

अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान सपारको के अध्यक्ष डॉ। सलीम महमूद के मकाले का विषय था.आइंस्टीन का नजरिया इज़ाफ़त और वाक़िया मेराज

अक्टूबर 1987 में जो इस्लामिक विज्ञान सम्मेलन आयोजित इसमें सत्तर के लगभग मकाले पढ़े गए। 70 लाख रुपये काखर्च सरकार सऊदी अरब ने वहन किया। इस सम्मेलन में जर्मनी से आये एक विशेषज्ञ गणित ने फरिश्तो ( स्वर्गदूतों ) सूक्ष्म संख्या मालूम करने का फार्मूला पेश किया। जबकि कायदे आजम विश्वविद्यालय विभाग भौतिकी के पूर्व अध्यक्ष डॉ। एमएम कुरैशी ने वह तरीका बताया जिसके द्वारा एक प्रार्थना इनाम कैसे कीलकोलियट किया जा सकता है।

ज़िया दौर में ही चिकित्सा यूनानी चिकित्सा इस्लामी हुई और अब यही चिकित्सा इस्लामी है।

पाकिस्तान में तो विज्ञान को भी इस्लामिक विज्ञानं बहुत पहले बना दिया था , मगर पडोसी देश भारत में विज्ञानं के हर क्षेत्र में काम हो रहा था और तरक्की भी कर रहा था मगर मोदी सरकार आने के बाद उन का भी विज्ञानं भगवा रंग में रंग गया . मोदी सरकार की वैज्ञानिक सोच कुछ ही महीनों में इतना आगे बढ़ा दिया कि कौन जाने मोदी सरकार के पांच साल पूरे होने तक वेद और रामायण के बारे में पता चला कि यह तो वास्तव में दुनिया के सर्वोच्च विज्ञान जरनलज़ हैं ।