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14 दिन के सैफई महोत्सव का जिसे राज महोत्सव कहा जाना चाहिये, समापन गत 8 जनवरी को धूमधाम के साथ हुआ। महोत्सव में वैसे तो सभी प्रस्तुतियां और कार्यक्रम अनूठे रहे लेकिन आठ चार्टर्ड प्लेन में भरकर बुलाये गये बालीवुड के महंगे कलाकारों की रंगारंग प्रस्तुतियों ने मानो इसकी भव्यता को चरम पर पहुंचा दिया। वैसे तो 8 जनवरी के बाद महोत्सव 4 दिन के लिये और बढ़ाने के लिये घोषणा की गयी है लेकिन आगे सांस्कृतिक व अन्य कार्यक्रमों के सिलसिले का पटाक्षेप इसी दिन कर दिया गया।

सैफई महोत्सव को लेकर सरकार की गत वर्ष काफी आलोचना हुई थी। मुजफ्फरनगर में शिविरों में रह रहे दंगा विस्थापितों के बच्चे ठंड से मर रहे थे और सरकार के कर्ता धर्ता सैफई के नाच गाने में मस्त थे। इस तरह की आलोचनायें जब मीडिया में सुर्खियों में छायीं तो राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी के सारे शीर्षस्थ नेताओं ने मीडिया को लताडऩे में आपा तक खो दिया था। भले ही देश में लोकतंत्र हो लेकिन समाजवादी पार्टी को यह बर्दाश्त नहीं है कि मीडिया के टुच्चे लोग उसकी कारगुजारियों पर उंगलियां उठायें और उन्हें कटघरे में खड़ा करें। समाजवादी पार्टी दल से ज्यादा समर्थ राजवंश के बतौर पहचानी जाने लगी है। जो जानती है कि सत्ता का स्रोत असीम शक्तियों को राजवंश में केन्द्रित करने में है और इस शक्ति का प्रदर्शन भी होता रहना चाहिये। जिसका एक तरीका सम्राट के पैतृक गांव में आमोद प्रमोद की बेनजीर मिसाल कायम करना भी है। लोकतंत्र और समाजवादी नारे के क्षितिज पर घोर सामंतवादी ब्रान्डिंग की नायाब शैली के तहत सपा के मुखिया मुलायम सिंह यादव के जन्मदिन का जश्न रामपुर में मनाने में भी लोकलाज की सारी मर्यादायें ताक पर रख दी गयी थीं। सो गत वर्ष की आलोचना की वजह से प्रदेश का राजवंश इस वर्ष सैफई महोत्सव के प्रदर्शन में कुछ कृपणता बरतने की सोचेगा, यह कल्पना करना ही नितांत मूर्खता थी और इस कारण इस वर्ष महोत्सव में और ज्यादा चकाचौंध रही।

राजा महाराजाओं का सुरुचि बोध कला और सौन्दर्य के उनके प्रतिमान जन संस्कृति के प्रतिमानों से पूरी तरह जुदा होते हैं। उनमें विलासिता की इतनी भव्य अभिव्यक्ति होती है कि आम लोग चमत्कृत होकर उनके प्रति और ज्यादा नतमस्तक हो जायें। सामंतवाद में सत्ता को सुदृढ़ करने का एक तरीका राजा महाराजाओं के हर कार्यक्रम में जोरदार तामझाम व आडम्बर के रूप में भी प्रदर्शित किया जाता है। एक गरीब किसान परिवार में जन्मे मुलायम सिंह ने संघर्ष और पुरुषार्थ से राजनीति का बुलंद मुकाम पाया। संघर्ष में मजबूती के लिये समाजवादी आन्दोलन की नैतिक प्रेरणाओं ने उनके मनोबल निर्माण में बड़ी भूमिका अदा की पर मुलायम सिंह ने अपने बचपन में सत्ता का जो स्वरूप और चरित्र देखा उसकी भी अमिट लकीर है उनके मनोजगत में कायम रही। नतीजतन सत्ता में पहुंचते ही समाजवादी आन्दोलन की फीकी प्रतिबद्धता के खूंटे से बंधे रहने के बजाय सत्ता के मद और रंगीनियों के लुत्फ में खुद को चूर करने के लोभ का संवरण उनसे नहीं हो सका।

सैफई महोत्सव के आयोजन के औचित्य पर कई सवाल हो सकते हैं। सैफई में ऐसा क्या है जिसकी वजह से वहां ऐसा महोत्सव आयोजित करने की जरूरत महसूस की गयी जिसमें सारी राज्य सरकार काम धाम छोड़कर इसी की तैयारी में जुटी रहती है। भले ही यह कहा जाये कि इस आयोजन में सरकार का एक पैसा खर्च नहीं होता लेकिन पंचायती राज प्रतिनिधियों के सम्मेलन जैसे आयोजनों के बहाने सरकार ने ही इसका खर्चा उठाया है यह प्रत्यक्ष है। लोकतंत्र और समाजवाद विशिष्ट व जन के भेद को खत्म कर नागरिक की एकरूप परिभाषा में पूरे समाज को पिरोने का काम करते हैं लेकिन सैफई में विराट महोत्सव के आयोजन का औचित्य इस आधार पर बताया जाये कि यह अवतार तुल्य सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव का पैतृक गांव है तो इसका मतलब है कि राजा का गांव होने के नाते उसे ऐसे विशेषाधिकार से परिपूर्ण आयोजन का पात्र माना गया। गोया वहां पर स्वर्ग से सुन्दर जश्न कराना सरकार का सर्वोपरि कर्तव्य हो। साफ जाहिर है कि इसमें यह ध्वनित होता है कि समाजवादी पार्टी विशिष्ट और जन के भेद को बढ़ाने वाली राजनैतिक संस्कृति की जड़ें मजबूत करने का उपकरण बन गयी हैं।

देश में लोकतंत्र की शुरूआत में जवाहर लाल नेहरू और उसके बाद उनकी पुत्री इन्दिरा गांधी का व्यक्तित्व जनता के लिये सम्मोहनकारी था। नेहरू का कोट पेरिस में धुलने जाता है जैसी दंत कथायें उनके व्यक्तित्व के करिश्मे को और पुख्ता करती थीं। लोगों के जेहन में उनकी भव्यता और विराटता ने ऐसी पैठ बनायी थी कि मतदाता उनके प्रति भक्ति भावना से भरे होते थे जिसके आगे चुनाव में सारे तर्क और लोकतांत्रिक विवेक बेमानी हो जाता था। मुलायम सिंह को भी उन दिनों की स्मृतियां जरूर होंगी। जो चलचित्र की तरह से उनके मस्तिष्क पटल पर गुजरती होंगी। जिसमें यह भी था कि त्याग शांति की राजनीति के कारण लोगों के श्रद्धाभाजन होने के बावजूद उनके प्रेरणास्रोत डा.राममनोहर लोहिया अपनी स्वीकार्यता को चुनावी जीत के रूप में नहीं भुना पाते थे। सत्ता के लिये जीत सबसे जरूरी है। भले ही वह कैसे भी हासिल की जाये जिसे मुलायम सिंह ने राजनीति के सर्वोपरि सूत्र वाक्य के रूप में आत्मसात किया है। शायद इसी कारण उन्हें लगता है कि सिद्धांतों से चिपके रहने की मनोवृत्ति का कोई सार नहीं है। सत्ता हासिल करने के राजनीति के सिद्ध फार्मूलों और करिश्माई शख्सियत के विंब में अपने को ढालने के लिये वे जो जतन कर रहे हैं सैफई महोत्सव उसका एक नमूना है। मुलायम सिंह की सायास इस मुहिम का नतीजा है कि उनका पूरा परिवार समाज के एक वर्ग में सहज ही नेहरू परिवार की तरह राजवंश के बतौर स्थापित हो गया है। तमिलनाडु की राजनीति की तरह उत्तरप्रदेश में भी मुलायम सिंह और उनकी प्रतिद्वंद्वी मायावती सत्ता के लिये अपेक्षित पात्रता के प्रतीक बनकर स्थापित हो चुके हैं। नतीजतन जिस तरह तमिलनाडु में चेयर रेस जयललिता और करुणानिधि के बीच ही होती है उसी तरह उत्तरप्रदेश में भी सत्ता संघर्ष मुलायम सिंह व मायावती के बीच सिमटा हुआ है। जिसमें अभी तक किसी नये विकल्प की गुंजाइश नहीं देखी गयी थी। हालांकि सत्ता की पात्रता का व्यक्ति पूजा के टोटकों से अर्जित यह मिथक तोडऩे की जद्दोजहद भाजपा इस बार तमिलनाडु में भी कर रही है और उत्तरप्रदेश में भी। देखिये इसकी कोशिशों का नतीजा क्या हासिल होता है।