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सिडनी, पेशावर और फिर पेरिस! सीरिया, इराक़, नाइजीरिया, पाकिस्तान और जाने कहाँ-कहाँ! कहीं तालिबान, कहीं अल क़ायदा, कहीं बोको हराम, कहीं आइएसआइएस और कहीं कुछ और, कोई और! वहशत और दहशत की लगातार ख़ूँख़ार मुनादियाँ! इसलाम के एक ख़ास संस्करण, एक कूढ़मग़ज़ समझ और तथाकथित जिहाद के उन्माद ने क्या दुनिया को एक नये ख़तरे के कगार पर ला खड़ा किया है? आज यह सवाल शिद्दत से पूछा जा रहा है?

‘शार्ली एब्दो’: 2011 और 2015 का फ़र्क़
कार्टून पत्रिका ‘शार्ली एब्दो’ पर यह वहशियाना हमला क्यों हुआ? ‘शार्ली एब्दो’ कोई दक्षिणपंथी पत्रिका नहीं है. यह वाम रुझान की पत्रिका है, जो मानती है कि धर्म मानव की स्वतंत्रता के लिए सबसे बड़ा ख़तरा है. चाहे वह कोई भी धर्म क्यों न हो. इसलिए उसके कार्टूनों के निशाने पर हमेशा कई धर्म रहे हैं, कैथोलिक ईसाई धर्म भी, यहूदी भी और इसलाम भी. यह अलग बात है कि पत्रिका के काफ़ी कार्टून अकसर चरमपंथी इसलाम और तथाकथित जिहादी तत्वों पर तीखा वार करते रहे हैं, क्योंकि हाल के बरसों में इसलामी चरमपंथ का हिंसक उभार पूरी दुनिया के लिए चिन्ता का विषय रहा है. लेकिन दूसरी तरफ़ यह भी सही है कि ‘शार्ली एब्दो’ के कुछ कार्टून वाक़ई मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाले और उन्हें चिढ़ाने वाले भी माने जा सकते हैं. इसीलिए कई बार उसने मुसलमानों की नाराज़गी मोल ली. तीन साल पहले, नवम्बर 2011 में उसके दफ़्तर पर हमला भी हुआ. लेकिन उस हमले और आज के हमले में बड़ा फ़र्क़ है.

यूरोप में बढ़ता तनाव
क्या फ़र्क़ है? सवाल तब भी वही था. आख़िर ऐसे कार्टूनों से मुसलमान ही क्यों भड़कते हैं? सवाल आज भी यही है. और जवाब तब भी वही था. पैग़म्बर मुहम्मद का चित्र नहीं बनाया जा सकता, उनका कार्टून बना कर खिल्ली उड़ाना तो क़तई बर्दाश्त नहीं किया जा सकता. जवाब आज भी वही है. लेकिन तब दफ़्तर पर सिर्फ़ आगज़नी की गयी थी. आज पेशेवराना और बर्बरतम आतंकी तरीक़े से दस पत्रकारों को मौत के घाट उतार दिया गया. 2011 और 2015 का फ़र्क़ यही है. और यहीं पर सवाल यह भी है कि अगर विरोध है भी तो उसे लोकताँत्रिक तरीक़ों से क्यों नहीं जताया जा सकता? धरना, प्रदर्शन, ज्ञापन देकर भी तो विरोध व्यक्त किया जा सकता है! उसके लिए हिंसा की ज़रूरत क्यों पड़ती है?

लेकिन दो दिन बाद ही यह साफ़ भी हो गया कि यह हमला केवल कार्टूनों के विरोध में नहीं था, बल्कि यह फ़्राँस पर किया गया आतंकवादी हमला था, ताकि उसकी धमक पूरे यूरोप को दहलाये. सही या ग़लत, अब अटकलें लगायी जा रही हैं कि कई देशों से जो लगभग पन्द्रह हज़ार आतंकवादी आइएसआइएस के लिए लड़ने गये थे, उन्हें उनके देशों में वापस भेजने की योजना है. अगर यह सच है तो सचमुच चरमपंथी बड़ी ख़तरनाक साज़िश में लगे हैं!

मैं भी शार्ली ! दुनिया भर में ‘शार्ली एब्दो’ पर हमले का विरोध

चरमपंथी इसलाम अब कितना भयावह रूप ले चुका है, 2011 और 2015 के फ़र्क से इसे आसानी से समझा जा सकता है! इसलिए ‘शार्ली एब्दो’ के संकेत ज़रा ख़तरनाक नज़र आ रहे हैं. ख़ास कर इसलिए कि यूरोप में चरमपंथी इसलाम की बढ़ती दस्तक ने हाल में वहाँ के दक्षिणपंथियों को नयी ज़मीन दी है. अमेरिका, ब्रिटेन और फ़्राँस समेत पश्चिम के कई देशों के मुसलिम नौजवानों के आइएसआइएस के पक्ष में लड़ने की ख़बरों ने पश्चिम और इसलाम के बीच लगातार बढ़ रहे अविश्वास, सन्देहों और भय को और बढ़ाया है. ऐसे में सिडनी और पेरिस की घटनाओं के बाद वहाँ लोगों को लगने लगा है कि चरमपंथी इसलाम कहीं अब उनके लिए बड़ा ख़तरा तो नहीं बनने जा रहा है? और क्या यूरोप अब एक नये ध्रुवीकरण के कगार पर है? क्या ‘ईसाई और मुसलिम सभ्यताओं’ के टकराव की थ्योरी कहीं अगले कुछ बरसों में सच तो नहीं होनेवाली है, जिसकी चर्चा हाल के कुछ बरसों में रह-रह कर होती रही है! या फिर पूरी दुनिया मुसलिम और ग़ैर-मुसलिम के दो ध्रुवों में बँटने की ओर है?

नये ख़तरे के बीज
क्या ये आशंकाएँ बकवास हैं? बहुतों का मानना तो यही है कि यूरोप का सेकुलरिज़्म और लोकतंत्र इतना मज़बूत है कि उसे कहीं कोई ख़तरा नहीं. लेकिन थोड़ा ज़मीन पर उतरिए तो कुछ और दिखता है. मसलन, अभी हाल में स्वीडन में तीन मस्जिदों पर हमले की घटनाएँ हुईं! पश्चिम के तथाकथित इसलामीकरण के ख़िलाफ़ जर्मनी के द्रेसदेन शहर में पिछले सोमवार को प्रदर्शन हुआ, जिसमें अठारह हज़ार लोगों ने हिस्सा लिया! इंग्लैंड समेत यूरोप के कई देशों में आप्रवासी विरोधी भावनाएँ ज़ोर पकड़ रही हैं और क़ानूनों को सख़्त बनाने की माँग की जा रही है. ये सब बातें ‘शार्ली एब्दो’ पर हमले के पहले की हैं. तो क्या ये किसी ख़तरे के बीज नहीं हैं?

वैसे, ईसाई वर्चस्व वाले पश्चिम और इसलामी जगत के बीच छत्तीस के आँकड़े का अपना एक इतिहास रहा है. पश्चिम मानस जहाँ इसलाम को ‘मध्ययुगीन शिकंजे में क़ैद’, अनुदार, कट्टर, अलोकताँत्रिक और बदलाव-विरोधी मानता रहा है, वहीं इसलामी जगत का एक बड़ा हिस्सा पश्चिमी रहन-सहन, खुलेपन, जीवन-शैली, लोकतंत्र और आधुनिक क़ानूनों को ‘शैतानी’ मानता रहा है. इसलामी जगत में कट्टरपंथी मुल्ला अकसर इन्हीं तर्कों के सहारे ज़िन्दा रहे हैं. अपनी आँखो देखी बात है कि ईरान में शिया मज़हबी क्रान्ति हो या अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान का उदय, मुल्लाओं ने वहाँ क़ब्ज़ा जमा चुकी पश्चिमी संस्कृति को ही अपना निशाना बनाया, उसे अनैतिक और ‘अल्लाह-विरोधी’ घोषित किया और इसलिए अतीत के ‘सुनहरे’ इसलामी नैतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना की उनकी अपील को काफ़ी समर्थक भी मिल गये.

मौत के फ़तवे, कोड़ों की सज़ा!
कुल मिला कर आज इसलामी चरमपंथ एक विकट संकट के तौर पर उपस्थित है, जो पूरी दुनिया में ‘इसलामी ख़िलाफ़त की स्थापना’ और ‘अल्लाह के शासन’ का सपना देख रहा है. और इस चरमपंथ को कुछ बड़े इसलामी देशों की कट्टरपंथी सरकारों से आक्सीजन मिलती रहती है. बरसों पहले सलमान रुश्दी के ख़िलाफ़ ईरान की तरफ़ से जारी मौत का फ़तवा हो या बिलकुल अभी-अभी सऊदी अरब में उदारवादी वेबसाइट चलानेवाले रईफ़ बदावी को दी गयी एक हज़ार कोड़ों की सज़ा हो, ये घटनाएँ न सिर्फ़ दुनिया में इसलाम के ‘अनुदार’ होने की धारणाओं को और मज़बूत करती हैं, बल्कि चरमपंथ को नैतिक समर्थन और संरक्षण भी देती हैं.
और चिन्ता की बात है कि काफ़ी समय तक उदार इसलामी देशों में गिने जानेवाले कई देशों में कट्टरपंथी इसलाम का दबाव हाल के बरसों में ज़बर्दस्त तरीक़े से बढ़ा है. कट्टर सुन्नी इसलाम के दबाव का नतीजा है कि पाकिस्तान में उर्दू भाषा से फ़ारसी शब्दों की कँटाई-छँटाई और उनकी जगह अरबी शब्दों के लाने की पैरवी हो रही है. क्योंकि फ़ारसी शिया ईरान की भाषा है! देखा आपने, धार्मिक कट्टरपंथ का मूल चरित्र सब जगह एक ही होता है, धर्म चाहे जो भी कोई हो!

कोई सुनेगा अल-सिसी की आवाज़?
चरमपंथी इसलाम की इस मध्ययुगीन आकाँक्षाओं ने दुनिया भर के मुसलमानों के लिए तीन तरह की चिन्ताएँ पैदा की हैं. एक तो यह कि वे इसलाम के भीतर चरमपंथी ताक़तों के ख़िलाफ़ लड़ें और उनको किसी प्रकार भी बढ़ने न दें (हालाँकि दुर्भाग्यपूर्ण सच यह है कि ये ताक़तें लगातार मज़बूत हो रही हैं), और दूसरा यह कि इससे दुनिया में इसलाम के बारे में जो ग़लत धारणाएँ फैल रही हैं और हर मुसलमान को ‘जिहादी’ समझा जाने लगा है, उसका भी लगातार खंडन-मंडन करते रहें और सफ़ाई देते रहें. और तीसरी चिन्ता यह कि तमाम दुनिया के कई देशों में मुस्लिमों और दूसरे समुदायों के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा है. भारत और पड़ोसी देश भी इससे अछूते नहीं हैं. बांग्लादेश में उदारवादी और कट्टरपंथी मुसलमानों के बीच हिंसक टकराव रोज़ की कहानी है. पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान पहले से ही धधक रहे हैं. म्याँमार और श्रीलंका में बौद्धों और मुसलमानों के बीच तनाव हाल के वर्षों में काफ़ी बढ़ गया है. भारत में आइएसआइएस और अल क़ायदा जैसे संगठनों की आहटों के बीच संघ परिवार के संगठन भी लगातार माहौल बिगाड़ने में जुटे हैं, और उनकी भरपूर मदद के लिए याक़ूब क़ुरैशी, असदुद्दीन ओवैसी, आज़म ख़ान और अबू आज़मी हैं ही, जो अपनी घिनौनी बयानबाज़ियों से संघ के साम्प्रदायिक एजेंडे को लगातार मज़बूती देते रहे हैं.
इसलामी दुनिया में मौजूदा हालात को लेकर चिन्ता की एक बड़ी पहल अभी सामने आयी है. मिस्र के राष्ट्रपति अब्दुल फ़तह अल-सिसी ने इसलाम में एक ‘सुधारवादी क्रान्ति’ की आवाज़ बुलन्द की है. आज के इसलाम की यह सबसे बड़ी ज़रूरत है. क्या अल-सिसी की आवाज़ सुनी जायेगी? अगर अगले कुछ महीनों में चरमपंथ का यह रथ नहीं रुका तो ख़तरे के काले बादल साफ़ दिख रहे हैं.
(लोकमत समाचार, 10 जनवरी 2015) http://raagdesh.com