buddhasan

वर्तमान में पुनरुत्थानवादी विचारों को कुछ सांप्रदायिक मानसिकतावाले लेखक इस्तेमाल कर रहे हैं और उन्हें समर्थन दे रहे हैं. यह दावा किया जा रहा है कि अतीत में दुनिया में जो कुछ भी अच्छा और महान रहा है, वह भारत से ही उद्भूत हुआ और यहीं से दुनिया के दूसरे भागों में फैला. लेकिन इतिहासकार, जिन्हें ठोस प्रमाणों को आधार बनाना होता है, ऐसे विचारों को स्वीकार नही कर सकते. बात चाहे विभिन्न प्रकार की धातुओं और सिक्कों के इस्तेमाल की हो या लेखन के प्रयोग और सभ्यता के ऐसे ही अन्य तत्वों की,
दक्षिण एशिया तथा
भारतीय उपमहाद्वीप का इतिहास
पाषाण युग (७०००–३००० ई.पू.)
कांस्य युग (३०००–१३०० ई.पू.)
लौह युग (१२००–२६ ई.पू.)
मध्य राज्य (१–१२७९ ईसवी)
देर मध्ययुगीन युग (१२०६–१५९६ ईसवी)
प्रारंभिक आधुनिक काल (१५२६–१८५८ ईसवी)
अन्य राज्यों (११०२–१९४७ ईसवी)
औपनिवेशिक काल (१५०५–१९६१ ईस्वी
हमें तो बड़ी ही सावधानी से प्रमाणों की छानबीन करनी होती है. जैसाकि पता चलेगा तमाम अति पुनरुत्थानवादी विचार ऐसे इतिहासकार प्रस्तुत करते हैं, जो हिंदू संप्रदायवादी और इसलामी रुढ़िपंथी विचारों से प्रतिबद्ध है.

भारत में संप्रदायवाद की समस्या को बुनियादी तौर पर हिंदुओं और मुसलमानों के बीच संबंधों की समस्या के तौर पर देखा जाता है. यह समस्या इस तरह नहीं सुलझायी जा सकती कि एक धर्म विशेष को माननेवाले शासकों द्वारा दूसरे धर्म को माननेवाले शासकों और अधीनों के खिलाफ की गयी दमन-उत्पीड़न की कार्रवाइयों पर परदा डाला जाये. इतिहास बतलाता है कि शासक वर्ग चाहे किसी भी धर्म के रहे हों, उनका यह विशेषाधिकार रहा है कि वे अपनी प्रजा को और अपने दुश्मनों को लूटें और उनका उत्पीड़न करें और जो मालमत्ता मिले उसकी मुख्यत: शासक वर्ग के ऊपरी तबकों के सदस्यों के बीच बंदरबांट कर लें. अगर इसलामी बादशाहों और राजाओं ने हिंदू मंदिरों की लूटपाट की तो इतिहासकार इस तथ्य को नजरअंदाज करके उनके प्रति कोई सद्भावना पैदा नहीं कर सकते. पर ऐसी लूटपाट के कारणों का विश्लेषण करना होगा और उनकी व्याख्या करनी होगी जैसा कि मोहम्मद हबीब ने अपनी पुस्तक सुल्तान महमूद आफ गजनीन में महमूद गजनी द्वारा की गयी लूटपाट के मामले में किया है. साधारण व्यक्ति भी इस बात को देख सकता है कि चाहे सभी हिंदू मंदिर सोमनाथ और तिरुपति के मंदिरों की तरह समृद्ध न रहे हों तो भी आम तौर पर मसजिदों के मुकाबले मंदिर कहीं अधिक समृद्ध हुआ करते थे. ग्यारहवीं शताब्दी के आरंभ में, सोमनाथ मंदिर में 500 देवदासियां, 300 हजाम और बहुत से पुजारी थे. इस मंदिर के स्वामित्व में 10 हजार गांव थे. पर मसजिदों की वास्तु संबंधी बनावट ही ऐसी है कि संपत्ति संग्रह के लिए वहां कोई जगह नहीं होती. यह तो प्रार्थना के लिए एक खुली इमारत होती है. मंदिरो में संपदा के संचय के कारण ही कुछ हिंदू राजा कीमती धातुओ से बनायी गयी मूर्तियों को ध्वस्त करने और राजकोष के लिए धन संपत्ति पर कब्जा करने के लिए विशेष अधिकारी नियुक्त करते थे. ग्यारहवीं शताब्दी के अंत में कश्मीर के शासक हर्ष ने ऐसा ही किया था. उसने एक अधिकारी नियुक्त किया था, जिसका काम मूर्तियों को ध्वस्त करना था (देवोत्पाटन). ऐसे अधिकारियों की नियुक्ति और कौटिल्य द्वारा अर्थशास्त्र में अंधविश्वासपूर्ण युक्तियों से भोले-भाले लोगों से पैसा उगाहने के लिए सुझाये गये उपायों से यह विचार खारिज हो जाता है कि हिंदू शासक वर्ग के लोग अपनी प्रजा के प्रति लगातार सहिष्णु रहते आये थे. पतंजलि के महाभाष्य, यानी ईसा पूर्व 400 के लगभग के पाणिनी के प्रसिद्ध व्याकरण ग्रंथ अष्टाध्यायी पर ईसा पूर्व 150 के लगभग लिखित उनकी टीका के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि अपना खजाना भरने के लिए मौर्य शासक धातु मूर्तियों को पिघलाते थे. अत: धन की अदम्य लालसा के चलते मौर्यों और अन्य शासकों ने धार्मिक मूर्तियों की पवित्रता तक को नहीं बख्शा.

निश्चय ही अशोक ने जो कुछ किया वह कहीं अधिक श्लाघ्य और सराहनीय था, पर उसकी नीति से ब्राह्मणों को आर्थिक धक्का लगा. मौर्यों की सत्ता के रहे-सहे अवशेषों का सफाया करनेवाला और ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी के अंत के आसपास ब्राह्मण राजवंश का संस्थापक, पुष्यमित्र शुंग दूसरी तीसरी शताब्दि के आसपास लिखित ग्रंथ दिव्यावदान में बौद्ध मतावलंबियों के घोर उत्पीड़क के रूप में प्रकट होता है. वह अपनी चतुरंगिणी सेना के साथ स्तूपों को नष्ट करता, विहारों को जलाता, भिक्षुओं की हत्याएं करता, शाकल यानी आधुनिक सियालकोट तक आगे बढ़ता चला गया था. सियालकोट में उसने घोषणा की थी कि जो भी उसे एक बौद्ध भिक्षु का सिर लाकर देगा, उसे सोने के सौ सिक्के पुरस्कार में मिलेंगे. यह बात अतिरंजनापूर्ण भी हो सकती है, क्योंकि शुंग शासन के अंतर्गत बौद्ध स्तूपों का निर्माण भी किया गया था. लेकिन पुष्यमित्र शुंग और भिक्षुओं के बीच शत्रुतापूर्ण वातावरण से इनकार नहीं कि या जा सकता. हमें यह भी पता चलता है कि पश्चिम बंगाल में गौड़ के शैव शासक शशांक ने उस बोधिवृक्ष को कटवा डाला था, जिसके नीचे बैठ कर बुद्ध को ज्ञान (बुद्धत्व) प्राप्त हुआ था. सातवीं शताब्दी के उसके समकालीन राजा हर्ष को सहिष्णु शासक माना जाता है पर उसने भी उन ब्राह्मणों को कारावास में डाला और उनका संहार किया था जिन पर कन्नौज की सभा में बुद्ध के सम्मान में खड़ी की गयी मीनार को जलाने का षड़ंयत्र रचने का आरोप था. मध्यकाल के आरंभ में दक्षिण भारत के जैनियों और शैवों के बीच हमें खुली शत्रुता की बातें सुनने को मिलती हैं और परंपरागत कथनों से पता चलता है कि 8000 जैनियों को सूली पर चढ़ा दिया गया था. यह घटना मंदिर के उत्कीर्णनों में भी परिलक्षित है.शर्मा के व्याख्यान की छठी किस्त में इतिहासकारों द्वारा अपनायी गयी त्रुटिपूर्ण और एकांगी इतिहास दृष्टि की चर्चा की गयी है.

आरंभिक मध्यकालीन बिहार की विभिन्न प्रतिमाएं स्पष्ट रूप से यह संकेत करती हैं कि बौद्धों और ब्राह्मण धर्म के अनुयायियों के बीच खुला और हिंसक टकराव रहा था. इन प्रतिमाओं में अपराजित सहित कई बौद्ध देवताओं को शैव देवों को पैरों से रौंदते हुए चित्रित किया गया है. धर्मग्रंथों में यह टकराव बौद्धों के खिलाफ शंकर द्वारा व्यापक पैमाने पर चलाये गये अभियान में प्रतिबिंबित होता है. यह सोचना गलत होगा कि बौद्धों का इस देश से सफाया केवल इस वजह से हुआ कि उनके खिलाफ वैचारिक प्रचार किया गया था. ऐसा लगता है उनका बाकायदा उत्पीड़न किया गया था. इससे उनके सामने केवल दो विकल्प बच रहे थे. या तो वे भाग कर दूसरे देशों में चले जायें या फिर सामाजिक विषमताओं से छुटकारा पाने के लिए इस्लाम धर्म अपना ले. विचार करने की बात है कि भारत में धर्म के रूप में इस्लाम केवल उन क्षेत्रों में ही पैर जमा सका जो बौद्ध धर्म के मजबूत गढ़ थे. यह बात कश्मीर, उत्तर पश्चिमी सीमांत क्षेत्र, पंजाब और सिंध के बारे में सच लगती है. उसी तरह नालंदा (बिहार शरीफ), भागलपुर (चंपारण) और बांगलादेश में, जहां बौद्ध काफी संख्या में रहते थे, मुसलिम आबादी है. बौद्ध भारत से वस्तुत: गायब क्यों हो गये इस बात को केवल इस आधार पर ही स्पष्ट नहीं किया जा सकता कि उनका धर्म आंतरिक तौर पर परिवर्तित हो रहा था. इस प्रश्न पर विचार करने के लिए उनके प्रति मध्यकालीन हिंदू शासक वर्गों और धार्मिक नेताओं के दृष्टिकोण पर ध्यान देना होगा. जैनियों का भी उत्पीड़न किया जाता रहा था. लखनऊ संग्रहालय में रखी जैन देवी देवताओं की कई प्रस्तर मूर्तियां, विरूपित अवस्था में मिली हैं. स्पष्टत: ही यह काम इन मूर्तियों को वैष्णव जामा पहनाने के लिए कुछ वैष्णवों द्वारा किया गया था. जैनियों ने अपने कर्मकांडों और सामाजिक रीति-रिवाजों को काफी हद तक संशोधित करके, अपने को प्रभुत्वशाली ब्राह्मणवादी जीवन पद्धति के अनुरूप ढाल लिया. इस बात पर जोर देना गलत होगा कि हिंदू एक समेकित समुदाय थे. जाने-माने पुनरुत्थानवादी और मुस्लिम विरोधी इतिहासकार रमेशचंद्र मजूमदार तक इस बात को मानते हैं कि हिंदू शासक वर्ग की कतारों में एकजुटता का अभाव था और वे अंतर्विरोधों से बुरी तरह ग्रस्त थे. उन्हें यह बात बहुत ही दुखद लगती है कि जब एक हिंदू राज्य पर मुसलमानों ने हमला किया तो एक पड़ोसी हिंदू राजा ने इस अवसर का लाभ उठा कर पीछे की तरफ से उस राज्य पर वार किया. (हिस्ट्री एंड कल्चर ऑफ इंडियन पीपुल, खंड-5, प्रस्तावना, पृष्ठ 14-16).

विंध्याचल के दक्षिणवर्ती क्षेत्र तक में मुस्लिम खतरे को इतना कम करके आंका गया कि दक्कन के शक्तिशाली यादव शासकों ने गुजरात के चालुक्यों पर दक्षिण से ठीक उस समय हमला बोल दिया जब वे उत्तर में आये मुस्लिम हमलावरों के साथ जीवन-मरण के संघर्ष में लगे थे (वही पृष्ठ 14).

हिंदू धार्मिक नेताओं के बीच सांप्रदायिक असहिष्णुता का स्पष्ट उदाहरण अयोध्या के मध्यकालीन इतिहास से लिया जा सकता है. जब तक औरंगजेब का शासन था, उसके लौह हस्त के नीच अयोध्या में सब कुछ शांत रहा. पर 1707 में उसकी मृत्यु के बाद हम वहां शैव संन्यासियों और वैष्णव वैरागियों के संगठित दलों के बीच खुला और हिंसक टकराव देखते हैं. इन दोनों के बीच विवाद का मुद्दा यह था कि धार्मिक स्थलों पर किसका कब्जा रहे और तीर्थयात्रियों को भेंट और उपहारों में प्राप्त होनेवाली आय किसके हाथ लगे. 1804-05 की एक पुस्तक से इन दोनों संप्रदायों के बीच होनेवाले हिंसक टकरावों के बारे में उद्धरण दिये जा सकते हैं : उस समय जब राम जन्म दिवस का अवसर आया, लोग बड़ी संख्या में कौसलपुर में एकत्र हुए. कौन उस जबर्दस्त भीड़ का वर्णन कर सकता है. उस स्थान पर हथियार लिये जटाजूटधारी और अंग-प्रत्यंग में भस्म रमाये असीमित(संख्या में) संन्यासी वेश में बलिष्ठ योद्धा उपस्थित थे. वह युद्ध के लिए मचलती सैनिकों की असीम सेना थी. वैरागियों के साथ लड़ाई छिड़ गयी. इस लड़ाई में (वैरागियों को) कुछ भी हाथ न लगा क्योंकि उनके पास रणनीति का अभाव था. उन्होंने वहां उनकी ओर बढ़ने की गलती की. वैरागी वेशभूषा दुर्गति का कारण बन गयी. वैरागी वेशभूषावाले सारे लोग भाग खड़े हुए उनसे बहुत दूर (यानी संन्यासियो से) उन्होंने अवधपुर का परित्याग कर दिया. जहां भी उन्हें (संन्यासियों को) वैरागी वेष में लोग नजर आते, वे उन्हे भयावह रूप से आतंकित करते. उनके डर से हर कोई भयभीत था और जहां भी संभव हो सका लोगों ने गुप्त स्थानों में शरण ली और अपने को छिपा लिया. उन्होंने अपना बाना बदल डाला और अपने संप्रदाय संबंधी चिह्र छिपा दिये. कोई भी अपनी सही-सही पहचान नहीं प्रकट कर रहा था. (हैंसबेकर, अयोध्या, गोरनिंगनन, 1986, पृष्ठ 149 में श्रीमहाराजचरित रघुनाथ प्रसाद से उद्धृत)उक्त उद्धरण मध्यकालीन धार्मिक हिंदू नेताओं द्वारा सहिष्णुता बरतने के मिथक का भंडाफोड़ कर देता है. हम लक्षित कर सकते हैं कि सदियों के मतारोपण से एक समेकित हिंदू समुदाय का निर्माण नहीं हुआ. आज तक भी तथाकथित अनुसूचित जातियां पशुओं का मांस खाती हैं, जिनमें गायें भी शामिल हैं तथा कुछ मामलों में अपने मृतकों को दफनाती तक हैं.

उत्पीड़ित वर्गो की ठीक यही वह कोटि है, जिसे महात्मा गांधी ने हरिजन की संज्ञा दी थी और बिहार और अन्यत्र गांवों में जिनके मकानों को मुख्यत: आर्थिक कारणों से जला कर राख कर दिया जाता है और जिनके परिवार के सदस्यों को भून डाला जाता है. एकदम हाल में जब बड़ी संख्या में अनुसूचित जाति के लोगों ने दक्षिण में ईसाई धर्म अपनाने का फैसला किया तो इससे हिंदुत्व के तथाकथित संरक्षकों के बीच बड़ा कोहराम मच गया.

इसी तरह, पुराणपंथियों के हिंसक प्रचार के बावजूद, मुसलमानों को समेकित समुदाय नहीं माना जा सकता. भारत में और अन्यत्र शियाओं और सुन्नियों के बीच खूनी टकराव सर्वविदित है. ईरान और इराक के बीच लंबे समय तक चले खूनी टकराव की तो चर्चा ही क्या. भारत में बहुत से ऊंचे दर्जे के और संपन्न मुस्लिम परिवार, हिंदुओं के उच्चतर तबकों और संपन्न परिवारों की तरह ही जुलाहों, पंसारियों और मुसलमानों के अन्य तथाकथित निम्न समुदायों को नीची नजर से देखते हैं. दंगा जांच आयोग की रिपोर्टो से पता चलता है कि दंगों के दौरान हिंदू और मुसलिम दोनों संप्रदायों के निम्न तबकों के लोग ही बड़ी संख्या में उत्पीड़न और खून-खराबों के शिकार बनते हैं. रमेशचंद्र मजूमदार मुसलमानों को हिंदुओं के साथ अनवरत रूप से वैरभाव में लिप्त एक समेकित धार्मिक समुदाय मानते हैं. महमूद गज़नी और तैमूर का भूत ऐतिहासिक रूप से उन्हें संत्रस्त किये रहता है. जैसाकि वह कहते है- 400 वर्ष पहले सुलतान महमूद के समय से भारत में कभी भी हिंदुओं के सोचे-समझे तौर पर किये गये ऐसे नृशंस हत्याकांड नहीं देखे गये (जैसेकि तैमूर के समय में). उसके धर्मोन्मादी सैनिकों ने अनियंत्रित हिंसा और बेरोक बर्बरता बरपा करने में कल्पना के सारे बांध तोड़ दिये और उसकी चरम सीमा वह थी, जब दिल्ली के मैदानों के बाहर एक लाख हिंदू कैदियों का नृशंस नरमेध रचाया गया. एक ऐसी घटना, जिसकी दुनिया के इतिहास में कोई मिसाल नहीं (हिस्ट्री एंड कल्चर ऑफ द इंडियन पीपुल, प्रस्तावना, पृष्ठ-24).

ऐसे वक्तव्य महमूद गजनी, मोहम्मद गौरी और समरकंद के तॅमूर द्वारा मुस्लिम जन समुदाय और मध्य एशिया के शासकों पर ढहाये गये कहर को पूरी तरह नजरअंदाज कर देते हैं. उनका मुख्य उद्देश्य था दूसरे देशों की लूटपाट करना, अपना खजाना भरना तथा अपनी संपदा में वृद्धि करना. जब महमूद गजनी और मोहम्मद गौरी ने भारत पर चढ़ाई की, तब उसके आक्रमण के शिकार क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी वस्तुत: अस्तित्वहीन थी. लेकिन 10वीं-11वीं शताब्दियों तक लगभग पूरा मध्य एशिया इस्लाम धर्म में परिवर्तित हो चुका था और फिर भी अपने इन सहधर्मियों को इन आक्रांताओ ने नही बख्शा. मध्य एशिया के मुसलमानों की उन्होंने जो लूटमार मचायी वह उत्तर भारत के हिंदुओं की उनके द्वारा की गयी लूटमार से व्यापकता और बर्बरता में कहीं कम नहीं थी.

इतिहास में लूटपाट करनेवाले आमतौर कब्जे में आयी लूटपाट के मामले में अपने सभी उत्पीड़ितों से एक जैसा ही व्यवहार करते हैं. इसी तरह तैमूर ने मध्य एशिया में मुस्लिम आबादी पर उससे कहीं अधिक विध्वंस बरपा किया, जितना उसने भारत में किया था. 1398-99 में भारत में काफी मुस्लिम आबादी थी पर तब भी गैर मुस्लिम आबादी उससे ज्यादा ही थी. इस तरह हालांकि तैमूर के हमले प्रथमत: मुसलमान शासकों के खिलाफ लक्षित थे पर जो प्रजा उसके हमलों की शिकार बनी, उसमें स्वभावत: ही हिंदू भी थे. ऐसे अनेकानेक उदाहरण दिये जा सकते हैं कि जब सत्ता और लूट के माल का मामला होता था तो हिंदू और मुस्लिम दोनों ही शासक वर्गों के सदस्य समान रूप से क्रूर सिद्ध होते थे. इसके विपरीत ऐसे बहुत से उदाहरण भी मिलते हैं, जिनमें हिंदु और मुस्लिम दोनों समुदायों के आम लोगों के बीच मौजूद सहिष्णुता की बात तो जाने दीजिए, हिंदु और मुस्लिम शासकों, दोनों ने सहिष्णुता दर्शायी. इसलिए मुस्लिम शासकों को क्रूर और हिंदू शासकों को दयालु व सहिष्णु शासकों के रूप में चित्रित करना गलत होगा. पर दुर्भाग्य से हिंदू संप्रदायवादी ऐसी ही छवि चित्रित कर रहे है तथा मुस्लिम कट्टरपंथी भी कोशिश में है कि इस मामले में उनसे पीछे न रहें.

सांप्रदायिक प्रचार का एक महत्वपूर्ण नमूना बाबरी मसजिद की दीवारों पर अंकित एकदम हाल के 30 भित्ति चित्र हैं. इस मसजिद में राम की प्रतिमा को जबर्दस्ती बिठाया गया है. जिस जिला न्यायाधीश के फैसले की वजह से संप्रदायवादी बाबरी मसजिद को कब्जे में ले सके, उसकी प्रतिमा बड़े ही उत्साहपूर्वक मसजिद के प्रवेश द्वार पर स्थापित की गयी है. उस के बाद से तो लगता है कि संप्रदायवादी राम की पूजा करने से अधिक उस न्यायाधीश की छवि को महिमा मंडित करने में संलग्न रहे हैं. दरअसल राम को अपने निकृष्टतम राजनीतिक दुराग्रहों को छुपाने के लिए आड़ बना लिया गया है. एक भित्ति चित्र में यह दर्शाया गया है कि किस तरह बाबर के सैनिक राम के इस कल्पित मंदिर को ध्वस्त कर रहे हैं और हिंदुओं का कत्लेआम कर रहे हैं. इस भित्ति चित्र के नीचे लिखा है कि बाबर के सिपाहियों ने अयोध्या में राम मंदिर पर हमला करते समय 75000 हिंदुओं को मौत के घाट उतार दिया और उनके रक्त को गारे की तरह इस्तेमाल कर बाबरी मसजिद खड़ी की. आग लगानेवाली ऐसी झूठी बातें सांप्रदायिक भावनाओं को हवा देने के लिए प्रस्तुत की जाती हैं. यह प्रचार उतना ही झूठा है जितना यह विचार कि बाबर ने राम मंदिर को ध्वस्त किया और उसकी जगह पर बाबरी मसजिद बनवायी.

उत्तर प्रदेश के पुरातत्व विभाग के भूतपूर्व निदेशक, रामचंद्र सिंह ने अयोध्या में 17 स्थानों की खुदाई करवायी और ऋणमोचन घाट व गुप्तारघाट नाम के दो स्थलों का भी उत्खनन करवाया. उनके अनुसार वहां अधिकतर स्थानों पर ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी से पहले आबादी होने के चिह्र नहीं मिलते. केवल मणिपर्वत और सुग्रीवपर्वत नाम के दो स्थानों को मौर्य काल का कहा जा सकता है. भारत सरकार के पुरात्तत्व विभाग के भूतपूर्व महानिदेशक ब्रजवासी लाल ने कई बार अयोध्या के कई स्थलों का उत्खनन करवाया और इस उत्खनन से पता चला कि ईसा पूर्व सातवीं सदी भी कुछ पहले ही जान पड़ता है क्योंकि उत्तरी छापवाले पोलिशदार बर्तनों की तिथि को आसानी से उक्त काल का नहीं ठहराया जा सकता.

यह बात याद रखनी होगी कि अयोध्या में बस्ती होने की सबसे पुरानी अवधि के लिए हमारे पास कोई कार्बन तिथि नहीं है. वहां प्रारंभिक आबादी की अधिक विश्वसनीय तिथि कुछ मृण्मूर्तियों के अस्तित्व द्वारा मिलती है. इनमें से एक जैन आकृति है, जो मौर्य युग की अथवा ईसा पूर्व चौथी शताब्दी के अंत और ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी के के आरंभ की हैं. बहरहाल, मध्य गंगा क्षेत्र की कछारी भूमि में जितने स्थानों का उत्खनन किया गया, उनमें से अधिकतर स्थान ईसा पूर्व सातवीं-छठी शताब्दी तक पर्याप्त रूप से बसे हुए प्रतीत नहीं होते. जो लोग राम की ऐतिहासिकता में विश्वास करते हैं, वे उनकी तिथि ईसा पूर्व 2000 के आसपास तय करके चलते हैं. यह इस आधार पर किया जाता है कि राम दाशरथि महाभारत युद्ध से लगभग 65 पीढ़ियों पूर्व हुए थे. आम तौर पर यह स्वीकार किया जाता है कि महाभारत युद्ध ईसा पूर्व 1000 के आसपास हुआ था. इसलिए हमारे सामने पर्याप्त रूप से अयोध्या के बसने और अयोध्या में राम के युग के बीच 1000 वर्षों से अधिक का अंतर प्रकट होता है. इसी कठिनाई की वजह से कुछ विद्वान अयोध्या को अफगानिस्तान में बताने की कोशिश करते हैं.

ईसा पूर्व 1000-800 के ग्रंथ अथर्ववेद (10.2.31-33) में अयोध्या का सबसे पहला उल्लेख मिलता है और वह भी एक काल्पनिक नगर के रूप में. इसे देवताओं की नगरी के रूप में चित्रित किया गया है, जो आठ चक्रों से घिरी है और नौ प्रवेश द्वारों से सज्जित है, जो सभी ओर से प्रकाश में घिरे हैं. संयुत्त निकाय (नालंदा संस्करण, खंड-3, पृष्ठ-358, खंड-4,पृष्ठ-162) में, जो लगभग ईसा पूर्व 300 का पालि ग्रंथ है, अयोध्या को गंगा नदी के कि नारे बसा हुआ दरसाया गया है, जिसका फैजाबाद जिले में सरयु नदी के किनारे बसी अयोध्या से कुछ भी लेना-देना नही है. आरंभिक पालि ग्रंथ इस विचार का समर्थन नहीं करते कि गंगा शब्द का इस्तेमाल सरयू सहित सभी नदियों के लिए आम अर्थ में किया गया है. वे मही (गंडक ) और नेरजरा (फल्गू) नदियों सहित, जिनके किनारों पर बुद्ध ने पर्यटन किया था, बहुत-सी नदियों का विशेष रूप से उल्लेख करते हैं. इनमें सरभू अथवा सरयू का भी उल्लेख है, पर एक ऐसे संदर्भ में, जिसका अयोध्या से कुछ भी लेना-देना नहीं. वाल्मीकि रामायण के आधार पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अतिरिक्त महानिदेशक, मुनीशचंद्र जोशी ने अयोध्या को सरयू से कुछ दूरी पर ढूंढ़ निकाला. वाल्मीकि रामायण का उत्तरकांड ईसा की आरंभिक सदियों में रचा गया है. उसके अनुसार अयोध्या सरयू से अध्यर्घ योजना दूर है. यह सस्कृंत अभिव्यित बालकांड (22.11) में भी मिलती है और टीकाकारों के मुताबिक इसका अर्थ है 6 कोस अथवा 12 मील. वे इसका अर्थ डेढ़ योजन लगाते हैं. इससे पुन: उलझन उठ खड़ी होती है क्योंकि वर्तमान अयोध्या तो सरयू तट पर स्थित है. यह नदी पूर्व की ओर बहती है तथा बलिया और सारन जिलों में इसे पूर्वी बहाव को घाघरा कहते हैं. सारन जिले में जाकर यह गंगा में मिल जाती है. सरयू अपना मार्ग बदलती चलती है. जिसकी वजह से कुछ विद्वान बलिया जिले के खैराडीह इलाके को अयोध्या मानना चाहते हैं. सातवीं शताब्दी के चीनी यात्री ह्वेनसांग द्वारा अयोध्या की अवस्थिति के संबंध में प्रस्तुत साक्ष्य से भी कठिनाइयां उठ खड़ी होती हैं. उनके अनुसार अयोध्या कन्नौज के पूर्व दक्षिणपूर्व की ओर 600 ली (लगभग 192 किलोमीटर) दूर पड़ती थी और गंगा के दक्षिण की ओर लगभग डेढ़ किमी की दूरी पर स्थित थी. अयोध्या को लगभग गंगा पर स्थित बता कर चीनी यात्री संभवत: उसकी अवस्थिति के बारे में आरंभिक बौद्ध परंपरा की ही पुष्टि करते हैं.

ह्वेनसांग के अनुसार अयोध्या देश में 3000 बौद्ध भिक्षु थे और साधु-संन्यासियों व गैर बौद्धों की संख्या इससे कम थी. अयोध्या राज्य की राजधानी के विषय में बताते हुए वह एक पुराने मठ का जिक्र करते हैं, जो काफी समय से बौद्ध धर्म की शिक्षाओं का केंद्र बना हुआ था (सीयूकी, खंड-1,लंदन, 1906 पृष्ठ 224-25). इससे सातवीं शताब्दी में अयोध्या में बौद्ध धर्म के प्रभुत्व का संकेत मिलता है. फिर भी ह्वेनसांग का कहना है कि अयोध्या देश में 100 बिहार तथा 10 देव (ब्राह्मणों के अथवा अन्यों के ) मंदिर थे. इससे पहले ईसा की पांचवी शताब्दी में फाह्यान साकेत में बुद्ध की दातौन (दंत काष्ठ) का उल्लेख करता है, जो कि सात-एक हाथ ऊंची उगी हुई थी. हालांकि ब्राह्मणों ने इस पेड़ को नष्ट कर दिया था, फिर भी वह उसी जगह पर फिर से उग आया (जेम्स लेगी, ए रिकार्ड ऑफ बुद्धिस्ट किंगडम, आक्सफोर्ड, 1886, पृष्ठ 54-55). अयोध्या को परंपरागत रूप से कई जैन तीर्थंकरों अथवा धार्मिक उपदेशकों की जन्मस्थली भी माना जाता है और जैनी इसे तीर्थ मानते हैं. जैन परंपरा में इसे कोसल राज्य की राजधानी बताया गया है पर यह ठीक कहां स्थित है यह नहीं दरसाया गया. गुप्तकाल के बाद जाकर ही कहीं वर्तमान अयोध्या को राम की लोक विश्रुत अयोध्या के साथ जोड़ा जाने लगा. उस समय तक राम को विष्णु का अवतार माना जाने लगा था.

अब तक विशेष रूप से अयोध्या का उल्लेख करने वाली मुहरों या सिक्कों का यहां पता नहीं चला है. हमें विभिन्न प्रकार के सिक्के जरूर मिलते हैं, जिन्हें अयोध्या सिक्कों के नाम से जाना जाता है, जो ईपू दूसरी शताब्दी से लेकर पहली शताब्दी और दूसरी शताब्दी ईस्वी तक के हैं. पर उन पर अयोध्या का नाम अंकित नहीं है. उदाहरण के लिए उज्जयिनी, त्रिपुरी, एरणु, कौशांबी, कपिलवस्तु, वाराणसी, वैशाली, नालंदा आदि की पहचान या तो मुहरों या फिर सिक्कों के आधार पर स्थापित की गयी है. अयोध्या से प्राप्त पहली शताब्दी के एक शिलालेख में पुष्यमित्र शुंग के एक वंशज का उल्लेख है पर सिक्के और शिलालेख राम दाशरथिवाली अयोध्या की पहचान नहीं करा पाते. यह सचमुच निराशाजनक बात है कि पर्याप्त उत्खनन और अन्वेषण के बावजूद हम वर्तमान अयोध्या को गुप्तकाल से पूर्व कहीं भी राम के साथ विश्ववासपूर्वक नहीं जोड़ सकते.

रामकथा को हिंदी भाषा क्षेत्र में हालांकि रामचरितमानस ने लोकप्रिय बनाया, तथापि अवधी भाषा का यह महाकाव्य वाल्मीकि के संस्कृत महाकाव्य रामायण पर आधारित है. मूल राम महाकाव्य कोई समरूप रचना नहीं है. मूल रूप से इसमें 6,000 श्लोक थे, जिन्हें बाद से बढ़ा कर 12,000 और अंतत: 24,000 कर दिया गया. विषयवस्तु के आधार पर इस ग्रंथ के आलोचनात्मक अध्ययन से पता चलता है कि यह चार अवस्थाओं से होकर गुजरा था. इसकी अंतिम अवस्था 12वीं शताब्दी के आसपास की बतायी जाती है और सबसे आरंभिक अवस्था ईपू 400 के आसपास की हो सकती है. किंतु यह महाकाव्य इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह वर्ग विभक्त, पितृसतात्मक और राज्यसत्ता आधारित समाज के व्यवस्थित कार्यचालन के लिए कतिपय आदर्श निर्धारित करता है. यह शिक्षा देता है कि पूत्र को पिता की, छोटे भाई को बड़े भाई की और पत्नी को पति की आज्ञा का पालन करना चाहिए. यह इस बात पर बल देता है कि विभिन्न वर्णों के लिए जो कर्तव्य निर्धारित किये गये हैं, उन्हें उनका पालन अवश्य करना चाहिए और वर्ण-जाति संबंधी कर्तव्यों से भटक जानेवालों को जब भी जरूरी हो निर्मम दंड दिया जाना चाहिए और अंत में यह राजा सहित सभी को आदेशि करता है कि धर्म के जो आदर्श राज्य, वर्ण और परिवार के अस्तित्व को बनाये रखने के लिए निर्दिष्ट किये गये हैं, उन्हीं के अनुसार चलें. विभीषण अपने कुल, जो गोत्र आधारित समाज के सदस्यों को एक साथ बांधे रखने के लिए सर्वाधिक आवश्यक था, के प्रति निष्ठा की बलि देकर भी धर्म नाम की विचारधारा में शामिल हुआ. वाल्मीकि द्वारा निर्दिष्ट सामाजिक और सांस्कृतिक मानदंड जैन, बौद्ध और अन्य ब्राह्मण महाकाव्यों और लोक कथाओं में भी दृष्टिगोचर होते हैं, महाकाव्य और लोक कथाएं भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास में मानदंडों, अवस्थाओं और प्रक्रियाओं को समझने के लिए निश्चय ही महत्वपूर्ण हैं, पर उनमें उल्लिखित कुछ ही राजाओं व अन्य महान विभूतियों की ऐतिहासिकता को पुरातत्व, शिलालेखों, प्रतिमाओं और अन्य स्त्रोतों के आधार पर सत्यापित किया जा सकता है. दुर्भाग्य से हमारे पास इस तरह का कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है, जो ईसा पूर्व 2000 से ईसा पूर्व 1800 के बीच एक ऐसी अवधि, जिसे पुराणों की परंपरा पर काम करनेवाले कुछ विद्वानों ने राम का काल बताया है, अयोध्या में राम दशरथ की ऐतिहासिकता को सिद्ध कर सके.