सिकंदर हयात

‘ रश्दी- तस्लीमा का रास्ता गलत इसलिए हे !

Category: सामाजिक, सिकंदर हयात 2176 views 18

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पाठको हिंदी नेट के बड़े ही विद्वान लेखक और पत्रकार संजय तिवारी जी ने एक बहस में हमसे सवाल किया हे की तस्लीमा और रुश्दी का रास्ता गलत कैसे है? हम अपना जवाब यहाँ दाखिल कर रहे हे – देखिये जितना हम जानते हे तस्लीमा रश्दी गैर पारिवारिक अराजक जीवन जीने वाले शराबी कवाबी लोग हे ठीक हे अब इन्हे इस्लाम पसंद नहीं हे तो फिर में कोई जाकिर नाइक साहब नहीं हु जो इस्लाम छोड़ने की सजा मौत बताऊ नहीं तुम्हारी मर्जी क्योकि जितना हमने समझा हे की इस्लाम में सब कुछ नीयत पर हे की आपकी नीयत क्या हे ? नीयत सही तो बस सही अगर आप एक एक एक सिर्फ एक निराकार अल्लाह -ईश्वर को मानते हे तो ठीक हे नहीं मानते तो बस बात खत्म अगर तस्लीमा रश्दी को इस्लाम पसंद नहीं था तो फिर इस्लाम त्याग कर ये कोई और धर्म – विचार अपनाते एक आदर्श या ठीक ठाक पारिवारिक जीवन जीते ( क्योकि बात आम आदमी को ही समझानी हे आम आदमी यानी एक सामान्य बीवी बच्चो परिवार वाला आदमी ) फिर अपनी कलम से बिना किसी की दिलाजारी के ये बताते की इस्लाम में हमें ये ये ये बात सही नहीं लगी थी और तब तो हमारा जीवन ऐसा ऐसा ऐसा था और अब देखो हम कितना बेहतर इंसानियत वाला जीवन जी रहे हे ? ऐसा करते तब भी एक बात थी लेकिन नहीं जाहिर हे की आप भी जानते होंगे की ये गैर पारिवारिक अराजक लोग हे यानी लब्बो लुआब ये हुआ की न धर्म फेथ को ही मानते हे न कोई ज़रा भी आदर्श पारिवारिक सामाजिक जीवन जीते हे तो हम इन्हे इनके रास्ते को आम लोगो को कैसे कोई आदर्श या कुछ सही ही बता दे ? बता ही नहीं सकते हे भई . और फ़र्ज़ करे किसी के लिए ये आदर्श हो भी तो खास लोगो या अमीर लोगो के या गैर पारिवारिक लोगो के हो भी सकते हे ? उनकी बात उनका जीवन अलग होता ही हे मगर हमारे लिए आम बिलकुल आम आदमी ही महत्वपूर्ण हे हम तो उसे ही अपनी बात समझाना चाहते हे उसी की समस्याएं उसी की बेहतरी के लिए सुलझाना चाहते हे इसलिए तो हम कहते हे की तसलीमा हो रश्दी हो या अब हमारे ये ताबिश भाई हो ये थोड़े ही न कटटरपन्तियो को कोई कमजोर कर पाएंगे नहीं बल्कि इनसे तो उल्टा कटटरपन्ति मज़बूत ही होंगे क्यों ?

देखिये पुराना जमाना अलग था मगर अब आधुनिक जीवन में काफी सालो से ये हो रहा हे की बहुत ही ज़्यादा महत्वपूर्ण होती हे फंडिंग फंडिंग पैसा पैसा कितना किसे कहा से किसलिए कब कितना आ रहा हे आज हर सांस जीने को पैसा लगता हे अब देखे की उपमहादीप में सारा तालिबान कटट्रपंथ उलजुलूल धर्मप्रचारकों भारत में बाबाओ की फ़ौज़ पाकिस्तान कश्मीर पंजाब में आतंकवाद पैदा होने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका पेसो की रही हे ऐसे ही अगर अरब देशो में तेल न निकला होता तो ना इज़राइल बनाया जाता न कभी बेमतलब इराक पर हमला होता न तालिबान ना मुस्लिम कटटरपन्तियो की फ़ौज़ पैदा होती ( इसीलिए मेने ये बात भी रखी की बहुत जरुरत होते हुए भी एक शुद्ध सेकुलर भारतीय मुस्लिम वर्ग सबसे कमजोर रहा हे क्योकि उसे कही से भी फंडिंग या सपोर्ट के कोई आसार ही नहीं दीखते आये हे ) अब तस्लीमा रश्दी और ताबिश साहब के लेखन से क्या होगा ? ऐसे लेखो को तो दिखा दिखा कर पेट्रो डॉलर के ढेर ( ढेर – भविष्य में भी अभी कई साल ) पर बैठे अरब शेखो से और ज़्यादा फंड लिया जा सकता हे ये कहकर की ”देखो देखो इस्लाम पर कैसे हमले हो रहे हे कैसे ताबिश साहब जैसे मुस्लिम नौजवानो का ईमान डांवाडोल हो रहा हे हमें इनसे टक्कर लेनी हे इस्लाम खतरे में हे लाओ लाओ हमें और फंड दो हम अपनी गतिविधिया और तेज़ करेंगे ” पैसे के बाद चाहिए होती हे मेंन पावर ( लोग ) उसमे भी सोने पर सुहागा की अगर तमाम मुश्किलें झेल रहे लोग हो तो .

आबादी जिसकी की इस एशिया और दक्षिण एशिया में जरा भी कमी हे भी नहीं हे ना फ़िलहाल भविष्य में ही दिख रही हे और बात ये हे की तस्लीमा रश्दी हो या कोई और ये नास्तिक लोग हे ईश्वर को नहीं मानते ठीक हे मत मानो हमें भी इनपर समय नहीं खराब करना हे लेकिन हम इनके रास्ते को सही भला कैसे बता सकते हे ? अगर ये इस्लाम को नहीं मानते ईश्वर को नहीं मानते तो ईश्वर नहीं हे तो बस तो फिर तो यही दुनिया सब कुछ हे सब कुछ यही हे जब सब कुछ यही हे तो फिर बस यही हे की बस भोगो और भागो क्योकि बस यही दुनिया हे फिर सब खत्म हे भोग सको तो भोग अब जब ऐश आराम विलास भोगना ही हे तो केसा परिवार ? केसा समाज ? कैसी जिम्मेदारिया ? कैसे बुजुर्ग क्यों भला उनकी सेवा में समय खराब ? कैसे पुरखे कैसे उनकी यादे उनकी कब्र उनकी बात उनकी याद उनका श्राद्ध सब बेमतलब सब बेमानी तो मतलब फिर तो अराजकता हे भोगो भागो यही जीवन तो हुआ फिर . तो हम भला कैसे इस रास्ते को सही और आदर्श बता सकते हे कभी भी नहीं बता सकते हे इसलिए हम तो अल्लाह ईश्वर पर पूर्ण आस्था रखते हे कठमुल्लशाही कटरपंथ साम्प्रदायिकता जंग लड़ाई दंगे पंगे के हम भी सख्त खिलाफ हे मगर कठमुल्लशाही कटरपंथ साम्प्रदायिकता की खरपतवार को काटते काटते हम ये नहीं करेंगे की आस्था के सुन्दर शीतल छाया देने वाले वर्क्ष पर या उसकी जड़ो पर ही कुल्हाड़ी चलाना शुरू कर दे नहीं हम ये नहीं होने देंगे पेड़ का भी पूरा ध्यान रखेंगे और खरपतवार भी काटेंगे हो सकता हे की आप कहे की जैसा मेने ही ऊपर कहा हे की वेस्ट या श्वेत समाज में हर जगह फेथ की जड़े कुछ हिला सी दी गयी हे फिर भी वहा तो अराजकता नहीं हे सही हे लेकिन पहली बात तो फेथ की जड़े हिलने से वहा भी परिवार और समाज की जड़े हिली ही हे व्यक्तिवाद बेहद बढ़ा हे टूटे बिखरे परिवार शराबखोरी आदि की समस्या का कोई समाधान क़िसी को नहीं सूझ रहा हे लेकिन वहा इतना बुरा हाल इसलिए नहीं हे की एक तो पैसा बहुत हे फिर वहा आबादी कम हे तो इस कारण उनका तो काम चल रहा हे आबादी काम होने से उन्हें फायदा हे वो लोगो का काफी ध्यान रख सकते हे आबादी कई देशो की जमुना पार की दिल्ली से भी कम हे तो उनका तो ये हे लेकिन अगर वही हमने किया तो तो यहाँ तो पैसा भी कम हे आबादी बहुत ज़्यादा हे यहाँ तो अराजकता आ जायेगी कम्युनिसम का प्रयोग भी इसीलिए असफल हुआ की इस्लामिक कटटरपन्तियो की हिंसा से कई गुना अधिक हिंसा के बाद जब दुनिया में कम्युनिस्ट समाज तो अस्तित्व में आया जिसमे कुछ बराबरी भी थी शोषण भी कम था मगर ये प्रयोग फेल हो गया क्यों की ना तो जनता को आर्थिक विकास का भोग मिला ना ही आध्यात्मिक विकास पूजा पद्धति की शांति और आनद मिला नतीजा कम्युनिसम भी उखड गया तो इन्ही सब बातो को देखते हुए हम मुस्लिम समाज के लिए रश्दी तस्लीमा के विचारो को ख़ारिज करते हे एक ऐसा समाज बनाने की चाहत रखते हे जिसमे फेथ भी हो लॉजिक भी हो विकास भी हो जितनी बिना हिंसा के अधिकतम हो सके बराबरी भी हो ईश्वर पर आस्था भी हो भोग विलास के लिए पागलपन भी ना हो यानी आद्यात्मिक विकास भी हो जीवन का आनंद भी आख़िरत की तैयारी भी हो यही चाहते हे आमीन

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18 thoughts on “‘ रश्दी- तस्लीमा का रास्ता गलत इसलिए हे !

  1. wahab chishti

    वहाब साहब

    आप के इस लेख ने आप की छवि सुधरने में जरूर मदद करे गई नहीं तो ऐसा लगता था के आप और अफज़ल साहब सिर्फ इस्लाम और मुसल्मान्न के खिलाफ लिखते है . अच्छा लेख है और अच्छी कोशिश है .

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    1. सिकंदर हयात

      क्या बात हे हमने कुछ लिखा और वहाब साहब से जूते भी नहीं खाय आज तो जीवन सफल हो गया

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  2. rajk.hyd

    बहुत से कवि आदि भि नशा करके सहेी बात कह देते है तस्लेीमा जेी और रुश्देी जेी ने क्या बात गल्त कहेी वह भेी आप्को बतलानेी चहिये थेी ! निरर्थक अलोचना से कोइ लाभ नहेी !

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  3. Narinder Tiwari

    I have not read any book of these writer and not sure , why the Muslim clerics issued the Fatva against them. Can you one , please enlighten me on this topic

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    1. सिकंदर हयात

      मेने ये लेख रश्दीतस्लीमा से अधिक बल्कि ताबिश साहब और संजय तिवारीसाहब के लिए लिखा था और जैसा की वहा बहस में मेने बताया भी था वैसा ही हुआ हमारे लेखन से तड़प उठने वाले कटटरपन्तियो ने ताबिश साहब को कुछ भी तो नहीं कहा एक भी कॉमेंट नहीं लिखा गया मतलब साफ़ हे उन्हें ऐसे ” धर्मविरोधी ” लेखो से नहीं बल्कि हमारे ”सेकुलर ” लेखो से ज़्यादा खतरा महसूस होता हे http://visfot.com/index.php/current-affairs/11698-sambhal-jao-e-musalmano.html

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  4. सिकंदर हयात

    इस हमले की फ़्रांस के भी कई मुस्लिम संघटनो की निंदा की हे में भी निंदा करते हुए ही कहूँगा की हमें अराजक नहीं समझदार होना चाहिए कटट्रपंथ से लड़िये बगदादी का कार्टून बनाइये अरबो देशो के निरंकुश शासको के कार्टून बनाइये कठमुल्लाओं के बनाइये मुस्लिम नेताओ के बनाइये मगर पैगम्बर हज़रत मोहम्मद साहब हो या हज़रत ईसामसीह हो इनका अपमान करने की क्या तुक हे भला ? ये ना कीजिये कभी भी नहीं प्लीज़ इस कार्टून पत्रिका में ननो को हस्तमैथुन करते पोप को कंडोम के साथ दिखाया जाता था ये अराजकता क्यों ? आप क्या चाहते हे नने न हो चर्च न हो ? पोर्नस्टार हो स्ट्रिप क्लुब हो मगर नने न हो क्या भाई ? धर्म के नाम पर कुछ गलत हो रहा हे तो उसका ये मतलब नहीं हे की धर्म पर अराजक हमले हो अराजकता किसी समस्या का हल नहीं हे आपके लिए धर्म समस्या हे वैसे ही देखे की बाबा ओशो कहते थे की सेक्स बहुत बड़ी समस्या और दुःख का मूल हे इसीलिए उन्होंने अराजक फ्री सेक्स की सुविधा और प्रचार दिया तो क्या इस अराजकता से समस्या हल हो गयी नहीं ना और बढ़ गयी अब ओशो के चेले चेलिया आश्रम में बलात्कार गर्भपात तेरी मेरी का स्यापा करते हुए किताबे लिख रहे हे समस्या का हल अराजकता से नहीं जिम्मेदारियों का बोझ सर पर लेने से होगा हमने शुरुआत भी की हे हरिप्रकाश जी लिखते हे ” . मुस्लिम समाज में यह काम आपलोग कर रहे हैं । बहुत ही गहरी जानकारी , समझ और विवेक के साथ ।सतही पोस्टें तो हजारों देखी है पर प्रभावित आप ही लोगों ने किया है ।आपलोगों के कुछ विचारों से मतभिन्नता के बावजूद आपलोगों की सकारात्मकता की सराहना करता हूँ और शुभकामना देता हूँ कि आप लोगों का दायरा बढे और आपलोगों के विचार मुस्लिम समाज के अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचे ।अपना यह काम जारी रखें । इसी में मुस्लिम समाज और देश का भला है ।
    हरि प्रकाश लाटा ”

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    1. सिकंदर हयात

      sikander hayat
      January 09,2015 at 03:26 AM CST
      अमित भाई ने लिखा ”इस्लाम में पैगंबर मुहम्मद साहब को किसी चिन्ह, तस्वीर या मूर्ति के जरिए दिखाने की मनाही है। यह मेरे लिए इस धर्म से जुड़ा थंब रूल है। इसके पीछे क्या लॉजिक है न मुझे पता है और न जानने की इच्छा है। मेरा तार्किक दिमाग मुझसे यही कहता है कि इससे किसी खास धर्म से जुड़े लोगों की भावनाएं आहत होती हैं।” इसलिये है भाई की पेगेम्बर हज़रत मोहम्मद साहब ताईद करके गये है की भाइयो मेरे साथ वो ना करना जो हज़रत ईसा के साथ किया गया की हज़रत ईसा को ही ईश्वर सा बना दिया अगर पेगेम्बर हज़रत मोहम्मद साहब की तस्वीर बनाने की इज़ाज़त होती तो इंसान का सवभाव ही आएसा है की लोग उन्ही का चित्र बनाकर उन्ही की पूजा शुरू कर देते इसलिये य मनाही है तो इस बात को पॉजिटिव ही लेना चाहिये वेद परताप वेदिक जी जेसे लोग लेते भी है जो मायवतो जी के अपनी ही मूर्तिया लगवाने पर अरबो का खर्च पर लिखते है की ”मायावती पेगेम्बरमोहम्मद और इमामहुसेन से सीख लो जिनकी एक भी मूर्ति या चित्र नही है फिर भी वो अपने चाहने वालो के दिल मे हमेशा रहते है ”

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  5. amit

    आपने कहा की नास्तिक होने से ख़तरा यह है की वो परलोक मे विश्वास नही करता, और सिर्फ़ इस धरती को भोगना चाहता है, ऐश, आराम, भोग विलास, कोई परिवार नही, कोई समाज नही. तसलीमा और रुश्दी के लिए ये आपने ज़िक्र किया, लेकिन मुझे बताइए की क्या तसलीमा, अपने परिवार के साथ नही रहना चाहती थी? या नही रह रही थी? उसे खदेड़ा गया, और उसके जीवन को हरने की कोशिश की वजह से वो संगीनो के साए मे एकाकी जीवन जी रही है.
    अगर नास्तिकवाद, समाज से सहानुभूति और संवेदना को समाप्त कर देता तो सोवियत रूस मे ग़रीबो को लेके न्याय की चेतना नही जागती. आपको पता हो तो साम्यवाद की लहर ने धार्मिक अस्थाओ को हिलाया था, आज भी रूस मे 50% से अधिक और चीन मे 60% से अधिक लोग नास्तिक है. नास्तिकता अपने मे पूर्ण नही है, लेकिन मानवता को हासिल करने मे अवरोधक भी नही.
    हरिशंकर परसाई जो नास्तिक थे, ने अपनी कलम मे ग़रीब और नारी की आज़ादी के लिए धर्म पे व्यंग्य किए, वो घोषित नास्तिक थे. एक और घोषित नास्तिक, जावेद अख़्तर, अपने लेखो और विचारो मे वंचित लोगो के लिए हमदर्दी जताते आए हैं.
    एश और आराम से क्यूँ चीड़, ईश्वर ने हमे ये खूबसूरत दुनिया और इसके सुख दिए हैं, इन्हे क्यूँ ना भोगे, जवानी मे मदमाती कम वासना और उसे पूर्ण करने के लिए जवान साथी दिए हैं, इसमे कोई अपराध तो नही, जब तक की हम किसी को ठेस नही पहुँचा रहे.
    और फिर क्या श्री कृष्ण और मुहम्मद ने अनेक कमसिन उम्र की लड़कियो को नही भोगा. एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति द्वारा कमसिन लड़कियो को अपने हरम और रनिवसो मे पर्दे मे रखकर उनको भोग कर उन्हे चारदीवारी मे धर्म के नाम पे क़ैद करना क्या भोग विलास नही है.
    धर्म, भोग विलास को स्त्री की आज़ादी दबा के इजाज़त देता है. क्या चीन की नास्तिक सरकार के क़ानून, उनकी जो भी समझ हो, लेकिन क्या समाज के विकास को ध्यान मे रख कर नही बनाए गये हैं?
    अगर आप तसलीमा, रुश्दी या जावेद अख़्तर जैसे लोगो के निजी जीवन के प्रति उनके रवैये मे खामी ढूँढ के, उनकी लोगो की आज़ादी के प्रति जज़्बे को नज़रअंदाज कर, कुछ तथाकथित धार्मिक चरित्रो के द्वारा भोग विलास को मेनुपीलेट करोगे तो आप भी पूर्वाग्रही हुए.
    कुछ बाबा या मौलवियो को धर्म की दुकान कहोगे, लेकिन इनके स्रोतो को दूध का धुला मानोगे, उनपे उठी हर उंगली को धर्म पे मारा गया पत्थर और बदतमीज़ी कहोगे तो कैसे चलेगा.

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  6. सिकंदर हयात

    आपका इस साइट पर बहुत बहुत स्वागत हे अमित भाई थोड़ा टाइम दे में जवाब लिखता हु

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  7. सिकंदर हयात

    भालचंद्र नेमाडे जी ने इन सलमान रश्दीयो— नायपालो की सही पोल खोली हे ये बिलकुल मामूली लेखक और उससे भी मामूली इंसान हे वास्तव में अगर फतवा ना जारी किया जाता तो रश्दी कब के इतिहास के कूड़ेदान में होते मगर फतवे की मेहरबानी से वो अब तक—- खेर भालचंद्र जी लिखते हे ” रुश्दी यह दावा तो करते हैं कि वह कश्मीरी हैं, लेकिन लिखते अंग्रेज़ी में हैं. उधर के लोगों को ख़ुश करने के लिए अपने लोगों का मज़ाक़ उड़ाते हैं.”
    भारतीय मूल के अंग्रेज़ी लेखकों के बारे में उनके विचार पर रुश्दी की तीखी प्रतिक्रिया के बारे में पूछे जाने पर नेमाड़े ने रुश्दी पर अपना वार और तेज़ किया.
    उन्होंने कहा, “उसने वही किया जो उसकी संस्कृति है. उसको यही शोभा देता है. हमें शोभा नहीं देता. हमारी संस्कृति अलग है. हम ऐसा नहीं कर सकते. एक लेखक दूसरे लेखक के बारे में क्या कहेगा, इसकी एक संस्कृति है.”
    रुश्दी के इस आरोप के बारे में कि उन्होंने उनका लेख शायद पढ़ा ही नहीं है, नेमाड़े ने पहले तो ठहाके लगाए और फिर कहा, “उसे पता नहीं है कि मैंने उसकी किताबों को पढ़ाया है. ‘मिडनाइट चिल्ड्रन’ से लेकर ‘द इनविज़िबल आइलैंड’ तक उसकी हर किताबे मैंने पढ़ी है.”

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    1. सिकंदर हयात

      मराठी साहित्य के इस मशहूर साहित्यकार ने भारतीय मूल के दूसरे बड़े लेखक वी एस नायपॉल को भी नहीं बख़्शा.
      वी एस नायपॉल
      “एक आदमी आता है, कहता है कि भारत एक ‘एरिया ऑफ़ डार्कनेस’ (अंधेरा इलाक़ा) है. फिर 15 साल बाद आता है और कहता है कि यह ‘वूंडेड सिविलाइज़ेशन’ (घायल सभ्यता) है. लिखता है कि मुसलामानों ने इसे घायल किया. अंग्रेज़ों का नाम नहीं लेता क्योंकि वहां उसे तकलीफ़ होगी. और 15 साल बाद फिर वापस आता है तो उसे ‘मिलियन म्युटिनीज़’ (करोड़ों बग़ावत) दिखाई देती हैं. पहले जब आया था उस समय बग़ावत नहीं चल रही थी क्या?”

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  8. सिकंदर हयात

    Shamshad Elahee Shams14 October at 12:18 · ‘बस ऐवैई’ का यूं ठुस हो जाना स्वाभाविक था, तुम इस काबिल नहीं थे कि इस झिलझिली सोच के साथ तुम नास्तिक सम्मलेन कर लोगो, बिना यह समझे कि इर्द गिर्द वातावरण में एक भी चीज ऐसी नहीं जो अराजनैतिक हो फिर बिना राजनीति किये तुम अपना नास्तिक झंडा भला कैसे बुलंद कर सकते हो?बावजूद इसके कि बालेन्दु साहब से मेरे गहरे वैचारिक मतभेद थे जिसके चलते मैंने उनसे दूरी बना ली लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उन्हें उनके मानवीय अधिकारों से वंचित कर दिया जाए, मैं संविधान की बात नहीं कर रहा. उन्हें और उनके तमाम मित्रों को देश-दुनिया में कही भी जब चाहे एकत्र होने का, मौज मस्ती करने का अधिकार है. लेकिन भारत जैसे सऊदी अरब को समझने के लिए जिस राजनीतिक समझ की जरुरत है वह और उनके मित्रगण इस ठोस वास्तविकता से आज खुद रु ब रु हो गए.खालिस नास्तिकता जहनी बंजरपन है, मैं न उसका वकील हूँ न अनुयाई, छोड़ दीजिये स्वामी शब्द, जय सियाराम, आश्रम, उजड़ी खुजडी भंगडी साधू कट दाढी या पहनावा जो सभी दोयम दर्जे वाले घटिया अतीत के २१वी सदी में परोसे जा रहे प्रतीक हैं, मैं उन्हें सिरे से ख़ारिज करता हू. साथ में सिर्फ नास्तिक होने का ढोल पीटकर समाज को अराजनीतिक करने की मंशा किसी तवज्जो के काबिल भी नहीं लेकिन फिर भी वृन्दावन में नास्तिक सम्मलेन के विरोध में हरे- भगवे सामाजिक कीड़े मकौड़े सभी एक घाट पर आ कर जिस तरह हू हू किये हैं, वह देखने योग्य है.भारतीय राज्य के मर्म में हिन्दू राज्य है जिसका फासीवादी चरित्र दिन ब दिन स्पष्ट हो रहा है इस खतरे को समझने की कोशिश पहले हो, तब ही इसके विरुद्ध कोई संघर्ष संभव है. जाहिर है नास्तिक तबके के बस का यह कार्यभार नहीं. यदि इस काण्ड में कोई जान चली गयी होती तो उसके नतीजे में जयसियाराम-आश्रम दुकान तत्काल भंग कर दी गयी होती. तुम बिना प्रतिक्रिया समझे क्रिया करोगे तो सवाल पैदा ही होंगे? क्या वास्तविक मंशा क्रिया की थी या सिर्फ प्रतिक्रिया देखने की?अगर कुछ अभी भी करने का मद्दा या कूव्वत बाक़ी है तो ऐसा समाज-राज्य बनाने के लिए संघर्ष करो जिसमे नास्तिक सहित सभी सम्मान से रह सके. और भोले बंधुओं- यह काम समाज, राज्य के ढाँचे को पलटे बिना संभव नहीं. डाकिंस-सैम हैरिस और भगत सिंह में बुनियादी फर्क है, मैं दूसरे का पक्षधर हूँ.

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  9. सिकंदर हयात

    अच्छा कमाल ये हे की खुद जीरो स्प्रिचुअल नीड का होते हुए भी दुसरो की और अच्छे इंसानो की भी आध्यात्मिक आवश्यकताओं और उसके पॉजिटिव पक्षो , नतीज़ों को देखते हुए ही हमने ये लेख लिखा था खुद मुझे किसी भी धार्मिक गतिविधि में रूचि नहीं हे वजह ये भी हो सकती हे की जीवन में बहुत ज़्यादा मुसीबतो का सामना कर करके में तो फिजिकली मेंटली बहुत टफ हो चुका हे मगर दुसरो के लिए स्प्रिचुअल एक्टिविटीज़ जरुरी हो सकती हे इसलिए में दुसरो की आस्था का में संम्मान अहतराम करता हु अब खेर जिस तिवारी ने जो की अब बीमारी में तब्दील हो गए हे जिन्होंने हमें ये लेख लिखने पर मज़बूर किया था खुद उन पर मुसीबतो के इतने पहाड़ टूटे की अब वो रात दिन आध्यतामिकता की हिंदुत्व की माला जपने लगे हे जिससे हमें ऐतराज़ नहीं हे मगर उनकी या किसी की भी साम्प्रदायिकता का हम हर हाल में विरोध करेंगे ही

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  10. सिकंदर हयात

    Sarfraz Katihari
    21 October at 22:12 ·
    ये ग्राफिकल आंकड़ा 1901 से 2000 तक के नोबल विजेताओं का है। इस आंकड़े में खास बात ये है कि ये उन विजेताओं के धर्म, ईश्वर पे विश्वास और अविश्वास को आधार बना कर तैयार किया गया है। इस आंकड़े मे आप देखेंगे कि ज़्यादातर नोबल विजेता जिनका ईश्वर पर विश्वास नही है, उन्हें साहित्य में नोबल लगभग 35%मिला है उसके बाद जितनी कैटेगरी है उसमें सभी का प्रतिशत 10 से कम है। तातपर्य यह है कि 90% विज्ञान कैटेगरी नोबल विजेता धर्मिक और ईश्वर पे विश्वास करने वाले हैं। यानी 90% वैज्ञानिक सोच के बुद्धिजीवी जिन्होंने विज्ञान की जटिलताओं, ब्रह्माण्ड की गुत्थियों को समझा है वो ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकारते हैं चाहे उसका कोई भी वैज्ञानिक नाम उन्होंने रखा हो।
    सबसे आश्चर्यजनक तो ये है कि शांति का नोबल पाने 96.4% व्यक्ति आस्तिक समुदाय यानी ईश्वरीय सत्ता के मानने वाले हैं। धर्म पर दुनिया की शांति भंग करने का आरोप लगाया जाता है, लेकिन ये उत्साहवर्धक है कि शांति फैलाने वाले भी धर्मिक परिवृति के ही लोग हैं।
    इससे अंदाज़ा लगाइये वैज्ञानिक वैचारिक पद्धति और तर्क की दुहाई देने वाले ये साहित्यकार खुद कितने अवैज्ञानिक हैं। जीवन की उत्पत्ति और उसकी जटिलताओं भरी रचना को केवल एक घटना समझने वाली साहित्यकार बुद्धिजीवी वर्ग ने बिना वैज्ञानिक ज्ञान के केवल धर्मिक लोगों के कर्म को देख कर परिकल्पनाओं के आधार पर नास्तिकता का आवरण चढ़ाया हुआ है और अपने साहित्य के बल पर युवा वर्ग और ज़्यादातर सामाजिक विज्ञान से संबंधित वर्ग को अभिभूत कर रखा है, जो वैज्ञानिक शोध की कसौटी पर एक भ्रम के अतिरिक्त कुछ भी नही है।
    .
    – ( ये पोस्ट Rumman Faridi के वाल से लिया गया है )
    नोट: सोर्स मतलब reference मेरा है
    https://books.google.com.br/books…Sarfraz Katihari

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  11. सिकंदर हयात

    Vineet Kumar
    3 hrs ·
    एक लेखक के तौर पर समाज को तार्किक, सोच के स्तर पर प्रगतिशील बनाने की जिम्मेदारी अगर आपके उपर है तो संवेदनशील और भावनाओं का सम्मान करने की कला विकसित करना भी आपका ही काम है. लोगों को प्रोग्रेसिव बनाने के नाम पर लोगों की भावना तार-तार कर देने का काम आपका नहीं है.
    आप उनकी जड़ता पर, अज्ञानता पर जरूर चोट कीजिए लेकिन साथ ही भावनात्मक स्तर पर समृद्ध भी बनाइए. ये चोट ऐसी हो जैसे एक कुम्हार उपर से तो घडे को पीटता है लेकिन भीतर से एक हाथ लगाए रखता है जिससे कि अंदाजा मिलता रहे कि कितनी जोर से चोट करनी है कि घडा सह पाएगा.
    आप समाज को समझे बिना सिर्फ चोट करते हैं तो वो समाज तार्किक होने के नाम पर फूहड़ और बर्बर हो जाएगा. ऐसे समाज में तर्क के बचे रहने के बावजूद मनुष्यता नहीं बचेगी. लेखक का मूल काम मनुष्यता बचाने का है.Vineet Kumar
    Yesterday at 20:27 ·
    उतना ही क्रांतिकारी और प्रतिरोधी स्वर लेखन में रखना चाहिए जितना कि हम असल जिंदगी में भी एफोर्ड कर सकते हैं. क्रांति की हाइ पिच पर जाकर लिखने और लो पिच पर जीने से लिखा हुआ झूठ लगने लगता है. अभी हम पाठक उस स्टेज तक नहीं पहुंचे हैं कि लिखी हुई चीज को लेखक के जीवन से पूरी तरह अलग करके देख सकें. कहें कि भईया ये लेखक के सांस्कृतिक उत्पाद हैं, विचार नहीं..लिहाजा उसे लेखक के जीवन से जोडकर देखना सही नहीं होगा.
    आप लिखते हैं और आपको कोई लेस्स क्रांतिकारी करार देता है तो सुन लीजिए क्योंकि आप उन लेखकों से फिर भी बेहतर है जो बेहतर लिखकर भी मोहभंग की स्थिति पैदा कर देते हैं. ऐसा कि हमारा पढने से ही भरोसा उठ जाए.

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  12. सिकंदर हयात

    https://www.youtube.com/watch?v=FpL_kSEHOco जावेद अख्तर ने जो कहा , गुरुुओ अंधविश्वासों कटटरपंथ कम्युनलिज्म के हम भी जानी दुश्मन हे जावेद अख्तर जो बाते कर रहे हे वो हम भी कर सकते हे बाए हाथ से कर सकते हे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ेगा मगर मुझे नहीं लगता हे की उससे हि में कोई बेहतर इंसान बन पाऊंगा अपने तमाम तर्कों के बाद भी मुझे जावेद भी कोई बहुत अच्छे इंसान नहीं मालूम होते हे बहुत बाते हे जीवन के अनुभवों और अपनी सीमित प्रतिभा के आधार पर आगे और लिखने की कोशिश रहेगी

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  13. सिकंदर हयात

    Devanshu Jha
    23 hrs ·
    जावेद अख्तर साहब मजहब का परचम लहराने आए थे
    कितना फर्क होता है उर्दू के कथित बड़े शायर, पटकथा लेखक और हिन्दी के कवि, समालोचक में । साहित्य आजतक के मंच पर जावेद अख्तर भी थे और अशोक वाजपेयी, मैनेजर पांडेय, अनामिका जैसी हस्तियां भी । जावेद अख्तर पूरे समय सिर्फ यह जताने में जुटे रहे कि अकबर महान था, टीपू महान था, ताजमहल दुनिया की अनमोल कलाकृति है । पूरी बहस के दौरान उन्होंने मुगलिया इतिहासकार की भूमिका निभाई । ऐसा लगा जैसे अकबर की रूह से सीधे संवाद कर आए हों । बाकी सैकड़ों सालों से लिखे पढ़े जा रहे इतिहास, दूसरी धारा के विचार, काउंटर नैरेटिव को हम जैसे धर्मांधों के हिस्से में डाल डिया । इतने दुराग्रही और प्रतिक्रियावादी विचार अपेक्षित नहीं थे । ये अलग बात है कि उनसे प्रतिप्रश्न भी नहीं किए गए ।
    पीछे जो जनता खड़ी थी वो उनकी कथित महान शायरी की मुरीद थी और अख्तर साहब उन्हें अपनी नज्म सुनाते रहे । यही स्थिति सबसे घातक होती है क्योंकि मुसलमानों का जो कथित पढ़ा-लिखा तबका है वो कभी आत्मावलोकन नहीं करता है बल्कि वह उन कट्टर घोर मजहबी लोगों के विचारों पर अपना संस्कारी ठप्पा लगाता है ताकि ताजमहल पर सैकड़ों सालों से उठाए जा रहे प्रश्नों या अकबर-टीपू के काले इतिहासों पर सवाल उठाने वालों का अस्तित्व ही ना रहे । ऐसा करते हुए वो न सिर्फ अपने मजहब के प्रति बेईमान ईमानदारी निबाहते हैं बल्कि सेक्यूलरिज्म का झंडा भी बुलंद किये रहते हैं । जबकि हिन्दी के कवि लेखक ऐसी कोई बात नहीं करते ।
    आजतक के मंच पर अशोक वाजपेयी ने स्थल और दूसरी सीमाओं का ध्यान रखते हुए भी हिन्दी कविता और लेखन की मौजूदा परिस्थितियों को रेखांकित किया । पागलपन की हदें तोड़ने वाले, मूढ़, आत्मरत कवि-लेखकों और दो कौड़ी के गीतकारों का संकट बताया । पुराने साहित्यकारों की चर्चा की..। यही फर्क है दोनों के वैचारिक धरातल का । सेक्यूलर तो अशोक जी भी हैं लेकिन उनकी दृष्टि इन कथित शायरों और गीतकारों से कितनी वृहद है, उनका अध्ययन कितना व्यापक है । और एक जावेद अख्तर हैं जो साहित्य के मंच पर अकबर और टीपू के तराने गाते हैं ।

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  14. सिकंदर हयात

    Sanjay Shraman Jothe
    1 hr ·
    एक बार एक सुशिक्षित मित्र से चर्चा हो रही थी. बात दलितों द्वारा बौद्ध धर्म में धर्मांतरण की निकली. मैंने पूछा कि दलितों के बौद्ध बन जाने पर आपका क्या विचार है? वे तपाक से बोले कि ये राजनीति है धर्म नहीं. मैंने प्रतिप्रश्न किया कि अगर ये राजनीति है तो शोषक धर्म में उन्हें रोके रखना और धर्मांतरण पर प्रतिबन्ध लगाना क्या राजनीति नहीं है? वे सीधे सीधे कुछ न बोल सके और कहने लगे लगे कि असली धर्म तो एक ही है और धर्म आतंरिक जगत का मुद्दा है उसका राजनीति से क्या संबंध, ये भी कहा उन्होंने कि धर्म बदलने से एक गड्ढे से निकलकर दुसरे गड्ढे में गिरता है आदमी.
    ये बहुत सामान्य से तर्क हैं जो धर्म परिवर्तन के खिलाफ अक्सर दिए जाते हैं. और बहुत हद तक ये बात भी सही है कि धर्म परिवर्तन से बहुत कुछ हल नहीं हो जाने वाला है. लेकिन ऐसे तर्क देने वाले लोग ये नहीं समझते कि दलितों को धर्म परिवर्तन से जो नयी पहचान और नया आत्मविश्वास मिलता है वो एक बहुत ताकतवर चीज होती है और उसमे बहुत बड़ी संभावनाएं छुपी होती है. इस बात का अनुभव गैर दलित या गैर शोषित लोग नहीं कर सकते.
    शोषक धर्म से आजाद होते ही दलितों ओबीसी और आदिवासियों की व्यक्तिगत चेतना में एक अनिवार्य अंतराल पैदा होता है. इस अंतराल में अगर वे अंबेडकर और बुद्ध को ठीक से अपने साथ बनाये रखें तो वे अपने पारिवारिक और सामाजिक अतीत के हजारों सालों से एक ही दशक या पीढ़ी में आजाद हो सकते हैं. ये हकीकत में हो भी रहा है और इसकी सफलता के लाखों प्रमाण मिल रहे हैं.
    जो लोग इन सफलताओं से घबराते हैं और दलितों के दुश्मन हैं वे इन केस स्टडीज को सामने नहीं आने देते. नवबौद्धों पर जितनी रिसर्च हुई है उसमे साबित होता है कि उनके सोशियो इकोनोमिक इंडीकेटर्स सुधरे हैं. इससे से भी कहीं आगे बढ़कर उनके सोचने के ढंग में व्यापक बदलाव आया है. पहली पीढी के नवबौद्धों के बाद उन्ही के घर में जो दुसरी तीसरी पीढी आ रही है उसके मन में मानसिक गुलामी और हीन भावना सहित पूजा पाठ, कर्मकांड और अंधविश्वास बहुत तेजी से खत्म हो रहा है. ये लोग इंग्लिश मीडियम स्कूलों में शिक्षित हो रहे हैं और आत्मविश्वास से भरे हैं.
    ये एक बड़ा बदलाव है. जो लोग धर्मांतरण की निंदा करते हैं या आलोचना करते हैं वे नास्तिक होने का सुझाव देते हैं. ये सैद्धांतिक रूप से भी सही नहीं है, व्यवहार में तो एकदम गलत ही है. ऐसे मित्रों को एक प्रयोग करके देखना चाहिए.
    नास्तिकता या सभी धर्मों को छोड़ देने का सुझाव देने वाले मित्र एक काम करें, अपने मूर्तिपूजक और कर्मकांडी परिवार या रिश्तेदारों या मित्रों में से कम से कम दस लोगों को चुनकर उन लोगों को अगले छः महीने या एक साल में नास्तिक बनाने का प्रयास करें. एक डायरी बनाकर अपने अनुभव लिखते जाएँ और साल भर बाद उसे पढ़ें. आपको पता चल जाएगा कि हकीकत क्या है.
    अक्सर नास्तिकता की या सभी धर्मों से बाहर निकलने की सलाह देने वाले मित्र नैतिक रूप से इमानदार या गंभीर नहीं होते. वे गरीब और अशिक्षित दलित आदिवासी या ओबीसी समाज की वास्तविकताओं से परिचित नहीं होते.
    किसी भी समाज को एकदम से नास्तिक नहीं बनाया जा सकता. बौद्ध धर्म नास्तिकता की दिशा में एक अनिवार्य और सबसे सुरक्षित पड़ाव है क्योंकि बौद्ध धर्म आत्मा परमात्मा पुनर्जन्म को मानता ही नहीं है. यही तो नास्तिकता है, नास्तिकता और क्या होती है? बौद्ध धर्म में जो ब्राह्मणी कर्मकांड घुस आये हैं उन्हें बड़ी आसानी से बुहारकर दूर फेंका जा सकता है. उसके लिए नयी पीढ़ी तैयार हो चुकी है.
    इसलिए सभी मुक्तिकामियों और दलित, आदिवासी ओबीसी मित्रों को भारत में विराट धर्मान्तरण आन्दोलन की आवश्यकता है. ये ऐसा ठोस और पक्का काम है कि अगले बीस से पचास सालोंमें भारत के समाज से शोषण और अपमान को पूरी तरह से मिटाया जा सकता है.
    जो दलित आदिवासी ओबीसी मित्र इन बातों से सहमत हो पा रहे हैं उनसे निवेदन है कि वे अंबेडकर की 22 प्रतिज्ञाओं और बौद्ध धर्म को जल्द से जल्द जीवन में उतार लें. आधिकारिक धर्मांतरण की कोई आवश्यकता नहीं, विचार और व्यवहार में तुरंत बौद्ध बन जाइए और दूसरों की भी मदद कीजिये. आपको किसी बिकाऊ दलित राजनेता या पार्टी की कोई जरूरत नहीं है. आपके अंबेडकर और बुद्ध पर्याप्त हैं.Sanjay Shraman Jothe

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