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असम के दो जिलों कोकराझड़ और सोनितपुर में नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड के एक सोंबजीत गुट ने उस क्षेत्र के आदिवासियों पर अंधाधुंध गोलियां चला कर 80 से ज्यादा लोगों को भुन डाला। कहते हैं, एनडीएफबी के इस गुट ने गरीब आदिवासियों का यह कत्लेआम उनके खिलाफ पुलिस की कथित ज्यादतियों का बदला लेने के लिये किया। आज वह पूरा क्षेत्र अद्​र्ध-सैनिक बलों को सौंप दिया गया है। अब अद्​र्ध-सैनिक बलों की ज्यादतियों के नाम पर इस क्षेत्र में आगे और क्या गुल खिलेंगे, कहना मुश्किल है। सन् 1980 से ही असम से ‘विदेशी घुसपैठियों’ को भगाने के नाम पर भारत के इस अपेक्षाकृत शांत क्षेत्र में खुली हिंसा की राजनीति का जो सिलसिला शुरू हुआ, उसने देखते ही देखते नाना रूपों में कैसे पूरे उत्तरपूर्वी क्षेत्र को अपनी जद में ले लिया, सचमुच यह एक गहरे अध्ययन का विषय है।

भारत के एक कोने में यदि कश्मीर हमारे गणतंत्र के शरीर पर नासूर बना हुआ है तो दूसरे कोने पर असम, मेघालय, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, मणिपुर और नागालैंड, सात बहनों का यह उत्तरपूर्वी क्षेत्र कम बुरी स्थिति में नहीं है। राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार आज पूरे भारत में तकरीबन 800 से ज्यादा आतंकवादी संगठन सक्रिय है जिनमें कोई जातीय पहचान के लिये लड़ रहा है, तो कोई धार्मिक उद्देश्यों के लिये, तो कोई शोषणमुक्त समाज के लिये जनमुक्ति के वामपंथी नारों की ओट में यही काम कर रहा है। और, गृह मंत्रालय तथा दूसरे अन्तरराष्ट्रीय सूत्रों के अनुसार मजे की बात यह है कि इन सबमें एक सामान्य सूत्र की तरह नशीली दवाओं, हथियारों का व्यापार, रंगदारी, और दूसरे तमाम गैर-कानूनी रास्तों से आने वाले धन का खुला प्रयोग हो रहा है। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक, गुजरात से लेकर पूर्वोत्तर भारत तक, शायद ही कोई राज्य होगा, जिसमें इस प्रकार की सामूहिक हिंसा की संगठित गतिविधियां न चल रही हो।

समाज के रंध्र-रंघ्र में फैल चुकी इस सामूहिक हिंसा और आतंकवादी संगठनों के जाल ने सन् 2002 के गुजरात में एक और चरम रूप लिया जब खुद राज्य भी प्रत्यक्ष रूप में इस प्रकार की हिंसक जन-हत्याकारी गतिविधियों में शामिल होगया। एक राज्य सरकार ने खून के प्यासे बहुसंख्यक समाज के उन्मादित जनसमूह को तीन दिनों के लिये खुली छूट दे दी कि वह अल्पसंख्यक समाज के सफाये के लिये इन तीन दिनों में जो कर सकता है, करें। यह भारत में एक हिंसक समाज की कोख से पनपने वाले जन-हत्याकारी हिंसक राज्य के निर्माण की लोमहर्षक कहानी है जिसका चरम रूप यूरोप में हिटलर और उसके नाजी शासन में दिखाई दिया था।

भारत की चारों दिशाओं में फैले इन तमाम हिंसक और आतंकवादी संगठनों की गतिविधियों, आये दिन होने वाली हिंसक वारदातों और खुद राज-सत्ता का बढ़ता हुआ हिंसाचार, इन सबको यदि हम समग्रता से देखें तो भारत की आज की तस्वीर हमारे पड़ौसी देश पाकिस्तान, अफगानिस्तान से कोई बेहतर नहीं दिखाई देगी। फिर भी हम इतराते हैं कि ‘हम पाकिस्तान नहीं है’। पाकिस्तान को आतंक और अराजकता का प्रतीक मानते हैंं और भारत को शांति और सुशासन का !

संयुक्त राष्ट्र संघ ने द्वितीय विश्वयुद्ध के अनुभवों के आधार पर 9 दिसंबर 1948 के दिन कन्वेंशन ऑन द प्रिवेंशन एंड पनिसमेंट ऑफ द क्राइम ऑफ जिनोसाइड (सीपीपीसीजी) को अपनाया था, जिसमें कहा गया था कि किसी भी राष्ट्रीय, जातीय, नस्ली अथवा धार्मिक समूह को समूल नष्ट कर देने के उद्देश्य से उस समूह के सदस्यों की हत्या, उन्हें शारीरिक अथवा मानसिक हानि पहुंचाना, सुनियोजित ढंग से किसी समुदाय के भौतिक अस्तित्व को आंशिक रूप से या पूरी तरह से खत्म कर देने की जीवन की परिस्थितियां तैयार करना, उस समूह में बच्चों के जन्म को रोकना और जबर्दस्ती एक समूह के बच्चों को दूसरे समूह में ले जाना – ये सब काम जनसंहार के अपराध की कोटि में आते हैं।

संयुक्त राष्ट्र द्वारा जनसंहार के अपराधों की इस परिभाषा पर थोड़ी सी बारीकी से भारतीय समाज की मौजूदा हिंसक परिस्थितियों के संदर्भ में सोचे तो यह बात आईने की तरह साफ दिखाई देने लगेगी कि किस तरह आज यहां समाज के बिल्कुल नीचे के स्तर से लेकर राज्य के सर्वोच्च स्तर तक इसी अपराधमूलक मानसिकता का विस्तार हो चुका है जो राष्ट्रसंघ के मानदंडों पर जनसंहारकारी अपराधों की श्रेणी में आती है।

कहना न होगा, भारत की हिंसा से भरी सामाजिक परिस्थितियां क्रमश: व्यापक जनसंहारकारी अभियानों के लिये तेजी से तैयार हो रही जमीन की ओर साफ संकेत करती है। जनसंहार की कार्रवाई कोई आकस्मिक उन्माद या विस्फोट की शक्ल में प्रकट होने वाली कार्रवाई ही नहीं होती। यह एक सु​िंचंतित संगठित र्कारवाई है। लगातार और लंबे अर्से तक चलने वाली कार्रवाई। समाज की रगों पर दीर्घ काल तक बने रहने वाला दबाव, और इस दबाव के तले पूरे समाज को एक विकृत रूप दे देने की कार्रवाई। इसकी हमेशा किसी व्यापक जन-हत्या की विस्फोटक घटना मात्र से व्याख्या नहीं की जा सकती है। जनहत्या दरअसल किसी भी समूह विशेष के खिलाफ बार-बार दोहराये जाने वाला, लगातार हमलों का एक लंबा सिलसिला होता है। हिटलर ने गैस-चैंबरों में डाल कर यहूदियों का सफाया करने का पैशचिक काम अचानक और रातो-रात नहीं कर दिया था। इसके लिये वह सालों तक तमाम प्रकार के झूठ और गंदी बातों को आधार बना कर यहूदी समाज के खिलाफ लगातार प्रचार और हमले चला रहा था। और इसी के चरम पर, जब उसने गैस चैंबरों में डाल कर एक झटके में लाखों यहूदियों की हत्या जैसा निर्दयता और निष्ठुरता का अकल्पनीय काम किया, पूरे यूरोप को एक व्यापक कसाईखाने में बदल दिया तब भी जर्मन राष्ट्र का बहुसंख्य तबका उसकी इन पैशाचिक हरकतों पर तालियां बजा रहा था। गुजरात में बाबू बजरंगी एक गर्भवती महिला के गर्भ तक को काट डालने की पैशाचिकता का पूरे उत्साह के साथ वर्णन करता है, फिर भी वह बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद जैसे संगठनों का एक चहेता नेता बना रहता है, यह आकस्मिक नहीं है। जनसंहारकारी समूहों की यही चारित्रिक विशेषता है। यह एक समुदाय विशेष के खिलाफ नफरत और हिंसा के लगातार और लंबे प्रचार के बीच से तैयार किये हुए समूह के बढ़ते सामाजिक प्रभुत्व के बाद ही संभव हो सकता है।

जो कोकड़ाझार आज बोडो उग्रवादियों की खुली हिंसा का क्षेत्र बना हुआ है, वहीं पर ‘80 के जमाने में विदेशी घुसपैठियों के खिलाफ चलाये गये आंदोलन के काल में बांग्लाभाषी मुसलमानों के खिलाफ सबसे जघन्य हिंसा का इतिहास रहा है। झारखंड, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा के लाल पट्टी वाले क्षेत्र की नक्सली हिंसा वहां हिंदू सांप्रदायिक हिंसक समूहों के लिये और एक प्रतिहिंसक राज्य के लिये जमीन तैयार कर रही है। इससे नागरिक अधिकारों के प्रति एक संवेदनहीन सामाजिक परिवेश तैयार होता है। नागरिक अधिकारों के प्रति संवेदनहीनता से ही प्रतिहिंसक राज्य कब एक समूह विशेष के समूल नाश के उद्देश्य से काम करने वाले जनसंहारक राज्य की दिशा में बढ़ सकता है, नाजीवाद और फासीवाद का इतिहास इसके सबसे बड़े गवाह है। इस दिशा में अगर सतर्कता न बरती गयी तो भारत में इस प्रकार के राज्य के उदय की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता। जनसंहार के सामाजिक-व्यवहारिक स्रोतों की ठोस पहचान के प्रति सामान्य जागरूकता पैदा करके ही इसका प्रक्रिया का प्रतिकार संभव है।