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रस्ते निहारती रहीं माएं तमाम रात स्कूल से बच्चे सभी जन्नत चले गये..

संजय तिवारी घटना की आलोचना करते हुए लिखा कि पाकिस्तान के तालिबानों में पांच तरह के तालिबान हैं. पहला वो जो धार्मिक तालिबान हैं. ये शिया सुन्नी की जंग लड़ते हैं. दूसरा वो जो भारत विरोधी तालिबान हैं. इनकी लड़ाई भारत के खिलाफ रहती है. तीसरा अफगानी तालिबान हैं जो मुख्यरूप से अफगानिस्तान में सक्रिय रहता है. चौथा अलकायदा वाला तालिबान. जो अफगानिस्तान के अलावा जवाहिरी के वर्ल्ड आपरेशन में अपना योगदान देता है. और पांचवा वो जो पाकिस्तानी तालिबान जिसने कल पेशावर में पाशविकता की सारी हदें पार कर दी. यह पांचवा तालिबान पाकिस्तानी हुक्मरानों के खिलाफ जंग लड़ने में ज्यादा यकीन रखता है. पाकिस्तानी हुक्मरान भी जब तालिबान के खिलाफ जंग का ऐलान करता है तो बाकी चार को छोड़ देते हैं और सिर्फ इन्हें ही निशाना बनाते है. इसके कारण बहुतेरे हैं. अब मियां नवाज शरीफ सचमुच पाकिस्तान से आतंकवाद मिटाना चाहते हैं तो उन्हें पांचवें नहीं बल्कि पांचों तरह के तालिबान को नेस्तनाबूत करना होगा. नहीं तो नतीजा कुछ खास न निकलेगा.

शहरोज के मन में मित्र शहनाज़ की बात गूंजी जो सवाल कर गयी की धर्म, धर्म
के लिए या धर्म आदमी के लिए ?. यह धर्म की खेती कितने मासूमों, जवानों की
मुस्कुराती फसल काटती रहेगी.प्रिय साथियो ! शहरोज मानते हैं कि आतंकवाद
से हर देश और हर व्यक्ति प्रभावित है. इसको नष्ट करने के लिए सभी के
ईमानदार साथ की ज़रूरत है.

आगे लिखते हुए आपने कहा कि नवाज़ साहब! अब तो आप चेत जाएं। अगर अब भी न
जागे तो इन मासूमों की रूह कभी आपको माफ़ नहीं करेगी.महज़ राष्ट्रीय शोक
घोषित कर देने से काम नहीं चलेगा.कोई बहाना मत कीजियेगा. सभी जानते हैं
कि भारतीय उप महाद्वीप में लश्कर-ए-तय्यबा और तालीबानी ग्रुप आतंक को
अंजाम दे रहा है. पाक को अपने यहां के कैंप को ध्वस्त करना चाहिए.आतंकवाद
को मटियामेट करने के बाद ही हिन्द व पाक पड़ोसी बन सकते हैं.नहीं भूलना
चाहिए कि हमारी विरासत साझा है.

शहरोज ने अरब के शेखों अरब के शेख़ों को घटना से चेत जाने का मशविरा दिया
. संसार में इस्लाम के नाम पर जहाँ-जहाँ भी आपके कथित जिहादी खूंरेज़ी कर
रहे हैं, शेख साहब! अब अय्याशी छोड़िए .तेल के कुंए ज़्यादा दिन काम नहीं
आएंगे.बच्चों को पढ़ाइए हमारे बच्चों को भी पढ़ने दीजिये.इस्लाम की गलत
व्याख्या कर फ़िज़ूल ख्वाब मत दिखाईए.

अविनाश दास ने कहा कि दुनिया भर के मरे हुए लोगों को मारो.उनको तो न
मारो, जिन्होंअने अभी न अच्छानई का रास्ताम चुना, न बुराई का. विचारहीन
हिंसा के इस दौर में दुनिया भर की वे बगावतें याद आती हैं, जब जनता ने
अलग अलग वक्तु में हैवान शासकों के खिलाफ हथियार उठाये थे. पेशावर में जो
हुआ, उसका दुख सार्वजनिक हुए वक्तेव्यों , प्रदर्शनों से ज्या दा बड़ा
है. एक ही शहर में, एक ही समय में आयोजित अलग अलग शोकसभाओं में जाकर इस
दुख की मौलिकता और सच्चाहई जाहिर कर पाना संभव नहीं.अविनाश ने कहा कि अगर
हर मुल्की के अलग-अलग शहरों से पेशावर तक एक वैश्विक मानव शृंखला बने, तो
उसमें शामिल हर अजनबी हाथ में पूरी अपनाइयत के साथ अपना हाथ देने के लिए
तैयार रहेंगे.

कल कुछ हत्या एं हुईं.कल भी कुछ हत्याकएं होंगी.युद्ध एक अनवरत नियति
है.हमारे पास शोक की कविताएं हैं.संयुक्ते राष्र््यसंघ के निंदा
प्रस्ताअव की तरह.बंदूकें जब किसी भी मुल्के से ज्यावदा ताकतवर हो जाती
हैं, तो हर नागरिक-छवियों में आतंकवाद का भविष्यक नजर आने लगता है.इस
वक्त पूरी दुनिया को मिल कर ओजोन की परत में छेद से जुड़ी पर्यावरणीय
चिंता को छोड़ कर मानवता की चिंता करने की ज्या दा जरूरत महसूस हो रही.

अनिनाश मिश्रा के शब्दों में …कालापन पसरता जाता था, विकल्प सिमटते
जाते थे.सूचनाएं सुन्न कर देती थीं और कुछ वक्त तक कुछ समझ में नहीं आता
था.ऐसी सूचनाएं बहुत सारी थीं और काम सिर्फ एक था तुम्हारे पास — जाने और
लौट आने के बीच में — नजर रखना..जाने व लौट आने के बीच में बहस थी जो वो
फैलती चली गई.

प्रियंका ओम ने कहा कि कुछ यादें न दफनाने के लिए नहीं होती….
न तकिये के नीचे सिरहाने रखने के लिए..
कुछ यादों की गर्मी सजेह कर रखे जाते है सर्दी में गर्म कपड़ो के साथ ओढ़ने के लिए.

प्रशांत पांडे के ने कहा कि पेशावर में नन्हे मासूम बच्चों को निशाना
बनाया गया…पाकिस्तान अपने नाम के मायने मिटा चुका है..

रमेश उपाध्याय ने कहा कि पाकिस्तान में आतंकवादियों ने जो किया, उस पर
जितनी भी लानत भेजी जाए..कम होगी. हमारा भी दिल रो रहा है और हम भी मारे
गये बच्चों के दुख में खुद को शामिल महसूस कर रहे हैं. लेकिन टीवी और नेट
पर इस घटना के जो विश्लेषण सामने आए , उनसे लगा कि इसके लिए धर्म और
राजनीति को जिम्मेदार ठहराते हुए इसके जो कारण, परिणाम और उपाय बताये जा
रहे हैं, आतंकवाद के मूल कारण को भुलाकर बताये जा रहे हैं. कोई भी आज के
भूमंडलीय पूंजीवाद का नाम नहीं ले रहा. जो खुद दुनिया भर में धर्म के नाम
पर फासीवाद और आतंकवाद जन्म दे रहा. आतंकवाद की समस्या को जड़ों तक जाकर
ही समझा जा सकता है…तब तक समाधान के लिए इन्तजार करें.

वरिष्ठ कवि उदय प्रकाश ने उम्मीद कि काश कल सारे सार्क देश इस तारीख़ को
दक्षिण एशिया की काली तारीख घोषित करें और अपने अपने संसदों और
सांस्थानिक कार्यालयों को इस शोक में बंद रखना चाहिए.. वो तारीख़ इस पूरे
उप महाद्वीप में एक स्याह दर्दनाक तारीख़ हो गई.बच्चे तो इस शैतानी हिंसा
से बख़्श देने चाहिए…शब्द अब प्रार्थना में भी साथ छोड़ रहे हैं.

कल्पेश याग्निक ने लिखा …बच्चों केऐसे रक्तपात ने जिस तरह उन
पाकिस्तानी मां के कलेजे को जख्मी कर दिया. ऐसे सदमे, संकट और संदेह के
क्षणों में हर हिन्दुस्तानी मां उनके साथ दृढ़ता से खड़ी है.आज उन मासूम
चीखों, विस्फारित नेत्रों और नन्हें पवित्र शवों के सामने सारे भेदभाव
निरर्थक हैं.यह मानवता पर सबसे क्रूरतम आतंकी हमला है।

कुमार विश्वास ने साहिर लुधियानवी की नजम का हवाला देते हुए कुछ यूं
कहा..साहिर साहब की नज़्म पढ़ रहा हूँ. और सरहद के इस पार और उस पार
दोनों तरफ के जाहिलों के लिए ईश्वर से प्रार्थना कर रहा हूँ कि उन्हें
ईश्वर सदबुधि दे जिन्होंने किसी भी ज़हर के असर में इतने छोटे-छोटे
नौनिहालों के दुनिया छोड़ने पर धर्म-मज़हब का हवाला दे कर ख़ुशी ज़ाहिर
की है उनको मेरी दुआ है की ईश्वर उनके छोटे-छोटे बच्चे सदा सलामत रखे !

ख़ून अपना हो या पराया हो .
नस्ले-आदम का ख़ून है आख़िर
जंग मग़रिब में हो कि मशरिक में ,
अमने आलम का ख़ून है आख़िर !
बम घरों पर गिरें कि सरहद पर ,
रूहे-तामीर ज़ख़्म खाती है.
फ़तह का जश्न हो कि हार का शोक ,
जिंदगी मय्यतों पे रोती है..

गुलजार ने अपनी बात एक संवेदनशील कविता जरिए कही …
अपनी मर्जी से तो मजहब भी नहीं उसने चुना था

उसका मज़हब था जो माँ बाप से ही उसने
विरासत में लिया था

अपने माँ बाप चुने कोई ये मुमकिन ही कहाँ है
मुल्क में मर्ज़ी थी उसकी , न वतन उसकी रजा से

वो तो कुल नौ ही बरस का था उसे क्यों चुनकर,
फिरकादाराना फसादात ने कल क़त्ल किया ..

ज़ारा खान के शब्दों में यह घटना पूरी दुनिया पर छाई मनहूसियत इंसानियत के
जिंदा होने की गवाही दे रही है. हर वो आँख जो इस हादसे पर रोई है इस बात
पर प्रतिबद्ध दिखाई दे रही है कि इस घुप्प अँधेरे से रास्ता हम जरुर ढूंढ
निकालेंगे. नहीं हारेंगे हौसला. धुंधलाती नज़रों, लरजती आवाजों और कांपते
वजूदों के साथ खडें हैं हम एक दूसरे का हाथ थाम कर. एक दूसरे के लिए,
मनुष्यता के लिए, नई पीढ़ी के सपनों की ज़मीन बचाने के लिए.

ईश्वर को हमने देखा नहीं. वो है या नहीं इस पर बहस भी फ़िज़ूल है. हमने
देखी है मानवता. हम ने देखें है नन्हे नन्हे मासूम खिलौनों के लिए मचलते
हुए. सुना है उनकी किलकारियों को. छुआ है उनकी मुस्कुराहटों को. जिया है
उनके जरिये से कुदरत को. इस सब को बचाने के लिए हम डटें रहेंगे. नहीं
हारेंगे. नहीं टूटेंगे…कभी नहीं.

ज़ारा आगे कह रहीं कि जहन्नुम और कहीं नहीं पाकिस्तान में है.. जहां
बच्चों को घेर के मारा जाता है.. अक्सर उसमे भी फेल ही रहता है. जहाँ
अगली सांस की गारंटी नहीं. नहीं जहन्नुम और कहीं हो नहीं सकता ..वो यक़ीनन
पाकिस्तान में नजर आ रहा.

परवर दिगार दुनिया में तो इन बेकसूरों को आराम मिल नहीं सका…खुदावर
अपनी नेक दुनिया में इनको इज्जत अता फरमा..जन्नत अता फरमा.