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पाकिस्तान के पेशावर में सैनिक स्कूल के सवा सौ से अधिक मासूम बच्चों को गोलियों से भूनने वाले दहशतगर्द दीन के लिए लडऩे वाले जेहादी नहीं हो सकते। यह लोग मानवता के दुश्मन हैं। दहशतगर्दों ने अपने आपको इस्लाम के चेहरे के रूप में पेश करते हुए कुछ समय से जिस तरह की करतूतों को अंजाम देना शुरू किया है उसकी यह भयानक परिणति अब सहने की चरमसीमा है। दुनिया भर के मुस्लिम दानिशमंदों को इनकी कड़ी मजम्मत करने और इस्लाम के असल उसूल क्या हैं यह बताने के लिए आगे आना होगा वरना इतिहास में वे भी आगे चलकर खलनायक के तौर पर दर्ज किए जाएंगे।

इस्लाम पर्याय है अमन का। पैगंबर साहब ने नए मजहब के लिए जानबूझकर यह नाम चुना था जिससे समझा जा सकता है कि वे दीन के जरिए कैसी दुनिया स्थापित करने का सपना संजोए हुए थे। उन्होंने धर्म को फैलाने के लिए कभी तलवार नहीं उठाई। शुरू में तो वे उन लोगों के साथ भी सहअस्तित्व के लिए तैयार थे जो मजहबी दुनिया में दूसरे ध्रुव पर खड़े थे लेकिन जब उन्होंने पैगंबर साहब की जिंदगी दुश्वार कर दी उन्हें मक्का छोड़कर मदीना जाना पड़ा। उसके बाद उन्होंने आत्मरक्षा के लिए लड़ाइयां लड़ीं लेकिन धर्मयुद्ध की गरिमा के अनुरूप उन्होंने लड़ाइयों में दुश्मनों की महिलाओं और बच्चों पर ज्यादतियां न होने देने का ख्याल रखा। मुसलमानों पर जेहाद आयद करते हुए उन्होंने कभी ये नहीं कहा कि अपने मजहब को दूसरे पर थोपने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाए। जेहाद से उनका मतलब था अपने अंदर के शैतान से संघर्ष करते हुए उन कामों को किसी भी कीमत पर करने के लिए तैयार न होना जिन्हें हराम कहा गया है। जेहाद में यह था कि पहले तो दीन के खिलाफ कही गई बात का समर्थ हो तो इस हद तक विरोध करो कि सामने वाले को उसे रोकना पड़े। अगर वह बराबरी का हो तब भी उससे दीन के उसूलों के लिए टक्कर लेने में न हिचको और अगर वह इतना ताकतवर है कि उससे लडऩा मुमकिन न हो तो मन से कभी उसको साथ न हो। एक प्रतिबद्ध इंसान बनाने के लिए जेहाद के उसूल से बेहतर उसूल कोई नहीं हो सकते थे। मोहम्मद साहब के न रहने के बाद मौलवियों और मौलानाओं से इसे इस्लाम के विस्तार से जोड़ दिया। फिर भी यह साफ किया गया कि जेहाद का ऐलान स्टेट द्वारा किया जाएगा किसी व्यक्ति या गैर सरकारी तंजीम द्वारा नहीं। इस तरह देखें तो तालिबान से लेकर अल कायदा तक ने जो जेहाद छेड़ा है उसके लिए वे कतई अधिकृत नहीं हैं।

इस्लाम अन्य धर्मों से इस बात पर जुदा है कि इसमें यतिवृत्ति को हतोत्साहित किया गया है। दुनिया छोडऩा, सन्यासी होना यह इस्लामी उसूलों के मुताबिक ठीक नहीं है। दुनिया को नेक बनाना यह इस्लाम का लक्ष्य है। इसके तहत गृहस्थी और परिवार में रहते हुए ही वह अल्लाह की याद पांच वक्त की नमाज के साथ करते हुए यह काम कर सकता है। इसमें बहुत ही विशिष्ट तौर पर चिह्निïत किया गया है कि नेकी के काम क्या हैं। उदाहरण के तौर पर इस्लाम के अलावा किसी ने भी यह नहीं सोचा था कि कारोबार को भी नैतिक बनाया जाना चाहिए और इसके लिए जरूरी है कि ब्याजखोरी पर पूरी लगाम लगाई जाए। ब्याज को हराम घोषित करना बहुत ही क्रांतिकारी अवधारणा थी और इस पर अमल करना बहुत बड़े त्याग के बराबर था पर अमल के मामले में इस्लाम बहुत कठोर रहा इसीलिए कहते हैं कि तीसरे खलीफा हजरत उमर ने जब दुनिया के तमाम दौलतमंद मुल्क अपने कब्जे में कर लिए थे तब भी वे इतनी सादगी से रहते थे कि उनका पूरा सामान एक ऊंट पर आ जाता था जिसमें लकड़ी के बर्तन होते थे। खजूर, आटा और थोड़ा-बहुत और सामान। इस्लाम ने विलासिता की भावना को सबसे ज्यादा शैतानी माना। तमाम बंदिशें विलासिता की इच्छाओं से बहकने से इंसान को रोकने के लिए बनाई गईं। शुरूआत में इस्लाम दार्शनिक उलझनों से मुक्त था लेकिन एक समय ऐसा भी आया जब इस्लाम का दार्शनिक स्तर पर अभूतपूर्व विकास हुआ। सूफियों की परंपरा का जिक्र इस सिलसिले में किया जा सकता है। मोतजली संप्रदाय के अलगजाला ने इस्लाम की मूलभूत अवधारणाओं को तर्क की कसौटी पर कसा तो वे नास्तिकता की ओर बढ़ गए लेकिन बाद में उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि तर्क वहां तक कारगर हैं जहां तक ज्ञान बोधगम्य है लेकिन ज्ञान का क्षितिज इससे भी आगे है। जब साधना की पराकाष्ठा पर साधक पहुंच जाता है तब इस ज्ञान की उसे अनुभूति होती है यानी उसे इलहाम होता है। उन्होंने कहा कि सहज ज्ञान तर्कों से बंधा हुआ नहीं है और वह इस कारण कभी गलत नहीं होता। इस्लाम के दार्शनिक विकास की ही अवस्था थी जब हार्रून रशीद खलीफा हुए जिन्होंने बगदाद से अपने छात्रों को गणित और ज्योतिष के अध्ययन के लिए हिंदुस्तान भेजा। अपने चिकित्सा शास्त्र के विकास के लिए उन्होंने हिंदुस्तान के वैद्यों को अपने दरबार में स्थान दिया। इस्लाम को उन्होंने ज्ञान-विज्ञान की चकाचौंध से भरकर नए आयाम प्रदान किए।

आज इस्लाम के इस गौरवमय अतीत को याद करने की जरूरत है। अफगानिस्तान से लेकर पाकिस्तान की उत्तरी बजीरिस्तान सीमा तक जनजाति कबीलों को शासन है। महापंडित राहुल सांक्रत्यायन ने वोल्गा से गंगा तक में सभ्यता के विकास का इतिहास लिखा है। वोल्गा तट उनकी किताब में सभ्यता का प्रस्थान बिंदु है जिसमें भूख बढऩे पर मां तक अपने बेटे को खाकर क्षुधा शांत करने में हिचक महसूस नहीं करती थी। सभ्यता गंगा तक पहुंचते-पहुंचते मानवीय आदर्श कितने ऊंचे हो गए। मां द्वारा बेटे को किसी भी आपात स्थिति में खा लेने की कल्पना तो दूर गैर के बेटे तक के खाने का उसका कलेजा नहीं बचा। सुकुमार भावनाएं, कोमल संवेदनाएं मानव सभ्यता की उज्ज्वल धरोहर बन गए। अनुमान लगाया जा सकता है कि ऐसे में जहां सभ्यता आज तक ठहरी हुई है उन समाजों में बर्बरता का कितना खतरा रहता है। यद्यपि अफगानी आज से कुछ दशक पहले बहुत ही मासूम थे। रविंद्र नाथ टैगोर ने काबुली वाला के नाम से जो कहानी लिखी है वह उनकी मासूमियत का विह्वल कर देने वाला दस्तावेज है। सरहदी गांधी की याद आती है। यह पखतून नेता आखिर तक गांधी जी के उसूलों को पाकिस्तान में रहकर जीता रहा। अफगानिस्तान के कबीलाई समाज में जहर घोलने का काम अमेरिका ने किया। जब सोवियत संघ ने वहां वामपंथी क्रांति को निर्यात किया था। जब नजीबुल्ला अमेरिका के राष्ट्रपति बने थे तो सभ्यता के सकारात्मक विकास की एक बहुत बड़ी पहल अफगानी समाज में हुई थी। अमेरिका को यह रास न आया। उसने जेहाद की गलत व्याख्या के साथ बिना पढ़े-लिखे जाहिल मौलवियों की देखरेख में जगह-जगह वहां मदरसे स्थापित करा दिए गए। उनके छात्रों यानी तालिबानों का अपने लिए इस्तेमाल किया। जेहाद के नाम पर उन्हें हिंसा की ऐसी घुट्टी पिलाई कि आज वे न केवल खुद युद्धोन्माद की ऐसी गिरफ्त में हैं जिस तंद्रा से मरकर ही बाहर हो पाएंगे बल्कि उन्होंने मारकाट करने का नशा पूरी इस्लामिक दुनिया में तारी कर दिया है। जब से अमेरिका पोषित जेहाद छिड़ा है तब से इस्लाम के दार्शनिक विकास की राह बंद हो गई है। उदार इस्लामिक व्याख्याओं की कोई गुंजाइश नहीं बची है। इस्लाम के स्वर्णकाल की तुलना में यह उसका कैसा अंधेरा युग है। सबसे बड़ी बात यह है कि इन भस्मासुर जेहादियों ने सारी दुनिया में इस्लाम को कायम करने के नाम पर मुसलमान कौम के ही सफाए का ठेका ले लिया है।

जो लोग इस्लाम को उसकी सादगी में अटूट निष्ठा की वजह से अपना सबसे ज्यादा शत्रु समझते हैं उनके लिए इससे ज्यादा बेहतर समय क्या होगा। इस्लाम की शिक्षाओं को बारीकी से देखें तो साफ जाहिर हो जाएगा कि इस्लाम के लिए उपभोक्ता वाद वर्ग शत्रुओं की संस्कृति है। इस कारण अगर वर्ग शत्रु सचेत हैं तो उन्हें इस्लाम को अपने रास्ते से हटाने के लिए हर जतन करना ही पड़ेगा और वे यही कर रहे हैं।तथाकथित जेहाद की असलियत को इस परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत है तभी सारी दुनिया को नेक बनाने का पैगंबर साहब के संकल्प को बचाया जा सकेगा। क्या पेशावर के मासूम बच्चों की शहादत मुसलमानों को इस कोण से झकझोरते हुए सार्थक इस्लामिक या दीन क्रांति के लिए प्रेरित कर पाएगी। अगर ऐसा हुआ तो यह उन जन्नतनशीन बच्चों के लिए सबसे सही खिराजे अकीदत पेश करना होगा।