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संघ और तालिबान में कोई विशेस अंतर नहीं, इस्लाम के नाम पर आतंक के सहारे दिलों में जो ख़ौफ़ तालिबान ने डाली हुई है वहाँ के लोगों पर, वही डर संघ द्वारा भारत में भी हिंदुत्व के नाम पर पैदा किया जा रहा है, जिस प्रकार तालिबानी नौजवानों को ‘ब्रेन्वाश’ कर के उनसे आतंकी घटनाओं को आसानी से करवा लेते हैं

, उसी प्रकार ‘ब्रेन्वाश’ करके यहाँ दारा, बाबूबाजरंगी, असीमानंद,प्रगया, आदि से इसी राष्ट्रवाद के नाम पर बड़े बड़े कुकृत्यों की भी आसानी से करवाया जाता है, बस फ़र्क इतना है की तालिबानी कुकृत्यों को अंजाम देकर मुकरते नहीं….यहा बड़े बड़े कुकृत्यों को करवाकर उनसे संबंध तोड़ लिया जाता है, या संबंध ना होने का बहाना बना दिया जाता है बस…और कोई अंतर नहीं…….उनकी सोच की परिणति कसाब द्वारा बड़े हमले पर होती है…..इनकी परिणति असीमनंद द्वारा धमाकों पर हो जाती है…..उनके द्वारा भी निर्दोष ही मरतें हैं यहा भी निर्दोष ही मरतें हैं…..यहाँ दारा तो वहाँ तुफैल…..कोई अंतर नहीं जनाब…वहाँ ओसामा यहाँ असीमा(नंद) क्या अंतर है भाई…..

.इनके लिए तो पूरे देश की मीडिया और जो भी इनकी सच्चाई जनता है सब इनके दुश्मन हो जाते हैं, इनकी नीति बुरी है क्यूंकी इनकी नियत बुरी है, ये लोग अपने अनगिनत कुकर्मो को छुपाने के लिए असंख्य कुतरकों का सहारा लेते हैं तब भी अपने घिनौने चेहरे को नहीं छुपा पाते…..इन्हे लगता है की देश बेवकूफ़ है अरे भाई अच्छे कर्म करोगे तो लोग पागल थोड़े ही हैं जो तुमहरे उपर व्यर्थ आरोप लगाएँगे, मदर टेरेसा ने थोड़े वक़्त में मानवता के लिए कितना महान काम किया क्या देश ने उन्हें सम्मान नहीं दिया, आप बदनाम हैं तो क्यूँ कभी सोचा हैं……

पूरी ईमानदारी से थोड़ा अपने आज़ादी से अब तक के कुकर्मो के लंबे इतिहास का अवलोकन अगर संघ करले लो उसे स्वयं ही खुद से घृणा होने लगेगी संघ द्वारा बार-बार कश्मीरी ब्राह्मणों के राग अलाप से उसकी मानसिकता का पता चल जाता है………

क्या संघ ने कभी गोहाना,मिर्चपुर,खैरलांजी,झज्जर के पीड़ितों की सुध ली है क्या उनके लिए एक भी घड़ियाली आँसू बहाए है,नहीं क्यूंकी वे दलित जो ठहरे….

क्या संघ ने कभी खाप पंछयातों के विरुढ़ कोई व्यापक आंदोलन छेड़ा, नहीं क्यूंकी ये हमारी महान संस्कृति का हिस्सा जो ठहरी….

क्या संघ ने कभी विधवा विवाह को प्रोत्साहित कर नारकिय जीवन जी रही लाखों विधवाओं का दुख दूर करने का प्रयास किया, नहीं क्यूंकी शास्त्रों के विरुढ़ नहीं जा सकते…..

क्या संघ ने कभी सरकारी ज़मीन पर कुकुरमुत्तों तरह की उग आए लाखों करोड़ों मंदिरों को ध्वस्त करने के लिए कुछ किया, नहीं क्यूंकी ये तो धार्मिक स्थल है….

क्या संघ ने कभी उन करोड़ो बेघरों को बसाने के लिए कुछ किया जिनकी पीडिया नालों और फुटपातों पर गुजर गई या गुजर रहीं हैं, नहीं क्यूंकी ये तो अपने पिछले जन्म के पाप काट रहें है….

.क्या संघ ने कभी उन खरबों रुपयों की देश की संपत्ति को निर्धानों को देने की माँग की जो लाखों मंदिरों में चढ़ावे के रूप में ‘भगवान’ को भोग लगने के बाद सड़ रहे हैं, नहीं क्यूंकी वो आस्था का मामला है…..??????

क्या संघ ने कभी अपनी 6 करोड़ राष्ट्रवादियों की फौज होते हुए भी राष्ट्र की मूलभूत समस्याओं के निदान के लिए कुछ किया, नहीं क्यूंकी ये राष्ट्रवाद तो ब्राह्माणवाद को स्थापित करने का ढोंग है……

.इनका वास्तविक ध्येय देश या राष्ट्र की उन्नति से तो कतई नहीं है, इनका अंतिम लक्ष्य है राष्ट्रवाद की आड़ में ब्राह्माणवाद की स्थापना, देश में समानता पर आधारित संविधान को स्थगित कर असमानता पर आधारित मनुस्मृति को एक बार फिर से देश का खून चूसने के लिए लागू करना संघ के महान राष्ट्रवाद का नमूना देश सत्तर सालों से देख रहा है…… ,

संघ की राष्ट्रवाद के नाम पर राष्ट्र को खंडित करने की मानसिकता के अनुरूप ही संघ अपने पापों को ढकने के लिए समय समय पर ‘अभिनव भारत’ ‘राम सेना’ आदि नामों से अपने लोगों के द्वारा देश की एकता और अखंडता को छिन्न-भिन्न करने का षड्यंत्र प्रायोजित करवाता है और फिर जब इन लोगों के कुकर्म सामने आ जाते हैं तो बड़ी ही बेशर्मी से इन लोगों का संघ से दिखावे के लिए संबंध ना होने का ढोंग किया जाता है और अप्रत्यक्ष रूप से बड़े-बड़े वकील नियुक्त किए जाते हैं इन को निर्दोष साबित करने के लिए,

कौन नहीं जानता की गोडसे,बाबूबाजरंगी,दारा सिंह,असीमनंद, श्रीकांत पुरोहित,प्रगया ठाकुर, जैसों का जन्म दाता कौन है, आर एस एस ही इन जैसे हज़ारों को पैदा करके उनके दिमाग़ को राष्ट्रवाद के नाम पर ब्राह्माणवाद की अफ़ीम द्वारा पागल कर उन्हें राष्ट्र को लाहुलुहन करने की ट्रेनिंग देकर विहिप,बजरंगदल,जैसे ना जाने कितने ही छद्म हिंदुत्वादी घेराबंदियों द्वारा महान से महान कुकृत्यों को आसानी से अंजाम दिया जाता है,

इतिहास इनके द्वारा राष्ट्र को दिए गये घाओं से लाहुलुहन है, गुजरात, कंधमाल के घाव अभी भी हरे हैं संघ अगर वास्तव में राष्ट्रवाद का समर्थक होता तब वो अवश्य सार्वजनिक तौर पर जातिवाद का विरोध करता परंतु यहा तो हाँथी के दाँत खाने के और दिखाने के और हो जाते हैं, संघ को राष्ट्र की चिंता होती तब ना वो जाती को जड़ से समाप्त करने के लिए धर्मशास्त्रों की मान्यता को निरस्त करने का प्रयास करता, उसे तो राष्ट्रवाद की आड़ में ब्राह्माणवाद की स्थापना करनी है,

भारत में जाती प्रथा का क्या कारण है या था, दलित उत्पीड़न की घटनायें क्यूँ होती हैं महिलाओं की दुर्दशा क्यूँ हैं, इन सब के लिए क्या संघ ने 85 वर्षो में कुछ किया,

गाँधी की हत्या से लेकर गुजरात,कंधमाल में हमने संघ के झूठे राष्ट्रवादी चेहरे के पीछे छुपे असली डरावने चेहरे के कुकर्मो को देखा और सहा है, अरे एकता और अखंडता के नाम पर देश को खंड-खंड करने पर तुले हो और बात करते हो राष्ट्रवाद की…..याद रखो की कुकर्म अधिक दिन च्छुपते नही, सत्तर साल बहुत होते हैं देश संघ की असलियत को जान चुका है…..अभी भी समय है अपने पापों का प्रायश्चित करने का शायद देश माफ़ भी कर दे………. कहीं ऐसा न हो वीरुध मे कोई और हिटलर पैदा हो जाए और तुम्हारा ही सत्यानाश हो जाए जो शाश्वत है !!!!!!!!!