religion-and-politics

फ़ज़ल इमाम मल्लिक

पिछले कई दिनों से एक अजब तरह का सन्नाटा भीतर पसरा है। ऐसा सन्नाटा पिछले महीने भी पसरा था। तब बिहार में था। अब दिल्ली में हूं तो यह सन्नाटा और भीतर तक उतर आया है। लेकिन भीतर पसरे इस सन्नाटे में कई तरह की आवाज़ें भी गूंजती हैं। कई सवाल सर उठाते हैं। कई लोगों के चेहरे घुलमिल जाते हैं। इन चेहरों में कई जाने-पहचाने हैं तो कई अनजाने। लेकिन हर चेहरे पर एक ही इबारत लिखी है जो अपनी कहानी ख़ुद बयां करती है। उन चेहरों पर लिखी इबारतें भीतर पसरे सन्नाटे में चीख़ बन कर कौंधती है और उस दोराहे पर ला खड़ा करती है जहां धर्म के नाम पर लोग एक-दूसरे का गला काटते हैं, घर उजाड़ते हैं, मासूमों का ख़ून बहा कर अपने इंसान होने पर गर्व महसूस करते हैं। सन्नाटों में पसरे उन आवाज़ों में से ही बार-बार यह आवाज़ भी गूंजती है कि क्या सचमुच हम इंसान हैं। कुछ महीने पहले बिहार में नवादा और बेतिया में हुए दंगों के दौरान सन्नाटों से ऐसी ही सदा गूंजती रही थी और फिर मुज़फ़्फ़रनगर में जले मकानाता, मासूमों और मज़लूमों की चीख़ें, आंसू और आहें फिर एक बार शर्मिंदा कर रही हैं। राहत शिवरों में रहने को मजबूर लोगों के आंसू, ठंड से मरते बच्चों की ख़बरें, सफÞई महोत्सव में मस्त सरकार और झूमते मुख्यमंत्री, उनकी देखभाल में जुटे मुसाहिबों की पलटन, सरकारी ख़र्च पर विदेशों के दौरे पर गए मंत्री, नुमाइंदे, बाबू-संतरी और फिर इन सब पर होती सियासत। यह सब देखते हुए बार-बार अपने आदमी होने पर र्शम महसूस होती रही थी। जिस धर्म ने हमें दुनिया का सबसे बेहतरीन मख़लूक़ होने की बात कही थी, उसी धर्म के नाम पर हम अपनों का गला काट देते हैं, उनके घर उजाड़ देते हैं, मासूम और ख़ूबसूरत आंखों में आंसू भर देते हैं और ऐसा करते हुए एक पल को भी शर्मिंदा नहीं होते। पहले नवादा, बेतिया फिर मुज़फ्Þफ़रनगर। साथ-साथ रहने वाले अचानक वहशी बने और फिर सब कुछ भूल गए। याद रहा तो सिर्फÞ एक-दूसरे को मारना। सच है यह कि ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। आजÞादी के बाद से ही मज़हब के नाम पर एक-दूसरे को मारने का सिलसिला जारी है। सिर्फÞ शहर बदले हैं, मारने वाले और मरने वाले चेहरे नहीं। सियासतदानों का चरित्र नहीं बदला, दंगाइयों के नाम बदले, जगह बदले बाक़ी कुछ भी नही। ऐसा ही इस बार हुआ पहले बिहार में और अब उत्तरप्रदेश में। कुछ महीने पहले बिहार में था। वजह राजनीतिक भी थी और निजी भी। नए राजनीतिक दल राष्ट्रीय लोक समता पार्टी का गठन मार्च में किया गया था और पार्टी के कार्यकर्ता सम्मेलन की शुरुआत होनी थी। एक दूसरी वजह भी घर जाने की थी। ईद का त्योहार था और कम से कम ईद और बक़रीद दो ऐसे मौक़े होते हैं, जब मैं गांव ज़रूर जाता हूं। अरसे से यह मामूल बना हुआ है। लेकिन इस बार वजह राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के सम्मेलन भी थे। इसलिए थोड़ा पहले जाना हुआ। ईद से पहले हाजीपुर, मुज्Þज़फ़रपुर, सीतामढ़ी, मधुबनी और उजियारपुर में सभाएं थीं। फिर आरा, बक्सर, जहानाबाद, गया, नवादा और पूर्णिया में सभाएं होनी थीं। सियासत से मेरा रिश्ता यों तो बहुत पुराना है। लेकिन कभी सियासत को ओढ़ना-बिछौना नहीं बनाया था। हां, सियासी लोगों से मुलाक़ातें थीं। सियासी लोगों से मिलना-जुलना अख़बारों की वजह से ही नहीं थीं, बल्कि सियासत को तो बचपन से ही देखता-सुनता रहा था। वालिद मोहतरम हसन इमाम का सियासत में दख़ल था। कांग्रेस पार्टी से उनका सरोकार रहा। अब भी है। कहां ज्यÞादा दिन हुए चंद साल पहले ही कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी शेख़पुरा आर्इं थीं तो पिता ने ही अगवानी की थी। हेलिकाप्टर से वे आर्इं थीं और पिताजी ने हेलीपैड पर उनका स्वागत किया था और मंच पर लेकर आए थे। हाल ही में उन्होंने सोनिया गांधी के साथ उस मौक़े की तसवीरें दिखार्इं तो मैं हैरत में था। उनसे कहा भी था कि ये तसवीरें दिखा कर तो दिल्ली में लोग अच्छी-ख़ासी कमाई कर सकते हैं। पिता तब ठठा कर हंसे थे। कांग्रेस का ज़िक्र करने पर अक्सर वे एक ही जुमला दोहराते हैं, अब कांग्रेस पहले वाली नहीं रही जो हमारे ज़माने में हुआ करती थी।

इलाक़े में उनका रसूख़ था और हमारे यहां नेताओं का आना-जाना लगा रहता था। चुनाव के वक्Þत यह सिलसिला बढ़ जाता था। लेकिन आम दिनों में भी सियासी लोगों की पंचायत जुटती थी। जोड़तोड़ की राजनीति तब भी थी लेकिन राजनीति का जो चेहरा अब दिखाई देता है, तब यह चेहरा इतना गंदा और मटमैला नहीं था। तब आदर्श थे, मूल्य थे और एक-दूसरे को समझने और समझाने की कला लोग जानते थे। विरोध होते थे लेकिन मतभेद मनभेद में नहीं बदलते थे। बाद में राजनीति के रंग और गहरे हुए। मंझले चचा अहमद इमाम कम्युनिस्ट आंदोलन से प्रभावित हुए और घर में कांग्रेस व कम्युनिस्ट की रेखा खिंच गई। यह रेखा आम दिनों में तो दिखाई नहीं देती थी लेकिन हर चुनाव में यह रेखा शिद्दत से उभर आती थी।

राजनीति की इन गलियों से गुज़रते हुए जब थोड़ी अक्Þल आई और कालेज के शुरुआती दिनों में था तो जेपी के संपूर्ण क्रांति ने प्रभावित किया। गांव में रहते हुए इस आंदोलन के साथ शिद्दत से जुड़ा लेकिन पिताजी का ख़ौफ़ ऐसा था कि कई बार बहुत कुछ खुल कर कह नहीं पाता था। बिहार में छात्र आंदोलन के दौरान परीक्षा छोड़छाड़ दी। आपातकाल लगा तो भी आंदोलन का जनून उतरा नहीं, बल्कि यह और बढ़ा। हालांकि तब मुझे रांची से गांव बुला लिया गया था लेकिन आंदोलन का चस्का यहां भी जÞोर मारता रहा। फिर आपातकाल ख़्तम हुआ और चुनाव की डुगडुगी बजी तो जनता पार्टी का झंडा उठा लिया। लेकिन पिता का डर भी था। गांव में उनका दबदबा। कोई अपने मकान या दुकान पर झंडा तक लगाने को तैयार नहीं। झंडा-पताका था भी नहीं, किसी तरह अंटी से पैसे निकाल कर झंडे बनवाए और कुछ दुकानों पर लगा डाला। इसकी ख़बर पिताजी को चली तो जो होना था हुआ। ख़ूब पिटाई हुई लेकिन इस पिटाई के बावजूद पार्टी से मेरा मोह भंग नहीं हुआ बल्कि और बढ़ ही गया। इस बीच लोकसभा चुनाव की घोषणा हो गई। जनता पार्टी ने बेगुसराय संसदीय सीट से श्यामनंदन मिश्र को उतारा था और तारकेश्वरी सिन्हा कांग्रेस की उम्मीदवार थीं। यूं जनता पार्टी के किसी नेता से मेरी न तो जान-पहचान थी और न ही उस दौरान कभी कोशिश भी की। लेकिन श्यामनंदन मिश्र को टिकट मिलने के बाद उनका झंडा अपने आप ही इलाके में उठा लिया था। पिता परेशान थे। क्या करें, घर में ही विद्रोह। उन्होंने उपाय निकाला। कांग्रेस के चुनाव प्रचार में साथ ले जाने लगे। पिता के आदेश का पालन करना ही था। मैं उनके साथ जाने लगा लेकिन वहां भी राह ढूंढ ली। साथ उनके जाता लेकिन ज्यों ही मौक़ा मिलता जनता पार्टी का प्रचार करने लगता। श्यामनंदन मिश्र जनता पार्टी के लहर पर सवार होकर सांसद और फिर मंत्री बन गए। अपना काम ख़त्म हो गया तो फिर जीवन को पटरी पर लाने के लिए पढ़ाई और परीक्षाओं पर ध्यान देने लगा। यह बात अलग है कि छात्र आंदोलन के उस दौर में ही लेखन की शुरुआत हुई। राजनीति तो छूट गई लेकिन लिखने पढ़ने का सिलसिला जो चला तो आज तक क़ायम है।

तो राजनीति मेरे लिए कोई नई चीज़ नहीं थी, लेकिन सियासत में जाने का इरादा कभी रहा नहीं। लेकिन राष्ट्रीय लोक समता पार्टी का गठन हुआ तो शंकर आज़ाद ने पार्टी से जुड़ने की ज़िद की (शंकर के कहने पर पहले भी नीतीश कुमार और उनकी नीतियों के ख़िलाफÞ एस-फ़ोर से जुड़ा, बाद में हमने सर्वजन समाज पार्टी बनाई थी और लोकसभा व विधानसभा चुनाव भी लड़वाया था)। पार्टी के गठन से पहले बिहार नव निर्माण मंच के ज़रिए भी अलख जगाने की कोशिश उपेंद्र कुशवाहा, डा. अरुण कुमार, शंकर आज़ाद, लुतफुर रहमान और संजय वर्मा कर रहे थे। उनके कार्यक्रमों से जुड़ा भी रहा था। बाद में पार्टी के गठन का फैसला किया गया तो उस फ़ैसले में भी शामिल रहा। इसलिए शंकर की ज़िद और कुछ नया करने की एक चिंगारी जो भीतर कहीं सुलग रही थी उसे देखते हुए मैंने हामी भर ली। इसलिए ईद के आसपास घर जाने का कार्यक्रम बना तो कुछ समय पार्टी के लिए भी निकालना ज़रूरी लगा। पार्टी कार्यक्रमों से फ़ुर्सत पाकर ईद में अपने गांव में था। विदेश से छोटा भाई मोहम्मद और चचेरे भाइयों के रहने की वजह से घर में रौनक़ थी। घर भरा-पुरा लग रहा था। वर्ना आम दिनों में तो एक अजब तरह का सन्नाटा गांव में भी पसरा रहता है और घर में भी। दादा अब्बा जब हयात थे तो घर के दरो-दीवार हंसते-मुस्कराते, बोलते-बतियाते थे। अब वे नहीं हैं तो दरो-दीवार भी ख़ामोश हम सभों की हंसी में ही अपने पुराने दिनों को याद करते हैं।

ईद की गहमागहमी के बीच ही नवादा में सांप्रदायिक दंगे की ख़बर मिली तो ईद का रंग फीका पड़ गया। नवादा में पहले भी सांप्रदायिक दंगा हो चुका है और वहां लोग छोटी-छोटी बात पर म्यान से तलवारें खींच लेते हैं। लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि जानें तो मासूमों की ही जाती हैं और मज़हब किसी मासूम का ख़ून बहाने की इजाज़त नहीं देता। लेकिन जो लोग धर्म और मज़हब के नाम पर तलवारें निकालते हैं उनके लिए मज़हब कोई माने भी नहीं रखता वे तो अपने सियासी नफ़े-नुक़सान के लिए लोगों का गला काटते हैं और सत्ता के शिखर पर बैठने का सपना पालते हैं। इस तरह के मामलों में सरकारों का जो रवैया होता है, वैसा ही रवैया बिहार सरकार का भी रहा। नीतीश कुमार की सरकार ने भी इस मामले में फ़ौरन किसी तरह की पहल नहीं की। नवादा में कई महीनों से तानव था। कुछ महीने पहले भी वहां इसी तरह के झगड़े में दो लोगों की जान जा चुकी थी। लेकिन सरकार को इससे क्या लेना-देना। नीतीश कुमार रथों पर सवार यात्राओं में मशग़ूल रहे और नवादा में आग सुलगती रही। दंगे की आग भड़की तो वहां बेहतर काम कर रहे डीएम का सरकार ने झटपट तबादला कर दिया। जबकि उनकी वजह से कई लोगों के घर बचे और जानें भी। लेकिन सरकार को तो यह दिखाना था कि उसने कार्रवाई की इसलिए गाज बेचारे डीएम पर गिरी। लेकिन उनके जाते ही दंगा भड़का और दुकानों-मकानों में आग लगाई जाने लगी। कई दिनों तक यह सिलसिला जारी रहा। अर्द्धसैनिक बलों के आने के बाद ही दंगों पर क़ाबू पाया जा सका। नवादा में दंगों के लिए हिंदू और मुसलमान दोनों ही ज़िम्मेदार हैं। छोटी सी बात ने दंगे की शक्ल ले ली। उस दौरान नवादा से जिस तरह की ख़बरें मिलती रहीं उसने बेतरह परेशान किया। सियासत किस तरह हमें एक-दूसरे के सामने ला खड़ा करती है, नवादा इसकी मिसाल थी।

नवादा की आग बुझी भी नहीं थी कि बेतिया से भी इसी तरह की ख़बर मिली। मन और परेशान हुआ। सरकार की नाकामी पर ग़ुस्सा भी आया। मुसलमानों में आम धारणा पहले से ही पनपी थी कि दंगों के पीछे भारतीय जनता पार्टी का हाथ होता है, नवादा और बेतिया को लेकर भी इसी तरह की बातें की जाती रहीं। लोगों के अपने तर्क थे। लोग तर्क ढूंढ भी लेते हैं। कइयों ने कहा नवादा और बेतिया के सांसद भाजपा से जुड़े हैं इसलिए इन दंगों के पीछे भाजपा का हाथ है। हो सकता है उनके तर्क सही हों। दंगों के इतिहास पर नज़र डालें तो लोगों का सोचना ग़लत भी नहीं था। देश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को सियासी हथियार की तरह भारतीय जनता पार्टी हमेशा इस्तेमाल करती रही है और धर्मरिपेक्षता का राग अलापने वाली कांग्रेस सहित दूसरी पार्टियां भाजपा के इस हथियार को मुसलमानों के ख़िलाफ़ इस्तेमाल कर सियासी फÞायदा उठाती रहीं हैं। कभी-कभी तो लगता है कि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में समाजवादी पार्टी ने भाजपा के विस्तार में कितनी बड़ी भूमिका अदा की है। भाजपा का उभार कांग्रेस से ज्Þयादा समाजवादी पार्टी की वजह से ही तो हुआ है। मुज़फ्Þफ़रनगर इसकी ताज़ा मिसाल है। दंगे की पृष्ठभूमि सियासी दल तैयार करते रहे और सरकार सोती रही। समाजवाद के नारे पर सवार अखिलेश यादव और उनकी पार्टी को सुध तब आई जब पानी सर से ऊपर निकल गया था। हैरत तो इस बात पर है कि मुज़फ्Þफ़रनगर के दंगों ने सभी पार्टियों के चेहरे से धर्मनिरपेक्षता के उस झीने परदे को उतार फेंका है जिसे ओढ़ कर राजनीतिक दल धर्मनिरपेक्षता-धर्मनिरपेक्षता का खेल बरसों से खेल रहे हैं। क्या समाजवादी पार्टी, क्या किसान यूनियन, क्या कांग्रेस, क्या बसपा और क्या भाजपा सबने मुज़फ्Þफ़रनगर को अपनी-अपनी सियासत के लिए इस्तेमाल किया। भाजपा तो इस खेल की अगुआई करती ही रही है, लेकिन इस बार दूसरे दलों ने भी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के ज़रिए अपनी सियासी दुकान को चमकाने की ख़ूब कोशिश की। यह सही है कि भारतीय जनता पार्टी के ‘स्वयंसेवकों’ ने एक फ़जीर्Þ वीडियों जारी कर दंगों को हवा दिया लेकिन जÞमीन तो तैयार की थी दूसरे दलों ने। हैरत इस बात पर है कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सत्ता में वापसी के बाद सांप्रदायिक दंगे लगातार हुए। लेकिन न वामपंथियों को सुध आई, न समाजवादियों ने और न ही कांग्रेस ने इस मसले पर मुलायम सिंह यादव और उनकी पार्टी को घेरने की कोशिश की। गुजरात दंगों में जिस तरह सत्ता और प्रशासन का दख़ल रहा, कुछ उसी तरह का खेल पहले नवादा में देखने को मिला और फिर मुज़फ्Þफ़रनगर में लेकिन इन दंगों के ‘दाग़’ दूसरे दलों के लिए ‘अच्छे’ हैं क्योंकि ये दंगे भाजपा शासित राज्यों में नहीं हुए इसलिए सरकार पर न तो वामपंथी मित्रों ने हमला बोला और न ही कांग्रेस को मुसलमानों की सुध आई। उन्हें नरेंद्र मोदी से ही फ़ुर्सत नहीं मिल रही थी इसलिए उन्हें मुलायम सिंह यादव और नीतीश कुमार नज़र नहीं आरहे थे। धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिकता का पैमाना भी राजनीतिक दलों के लिए अलग-अलग होता है। जो भाजपा के साथ वह सांप्रदायिक जो उससे अलग धर्मनिरपेक्ष। इस देश में राजनीति किस तरह लोगों का मज़ाक़ उड़ाती है, यह इसका सबूत है। कल तक नीतीश बहुतों के लिए अछूत थे क्योंकि वे भाजपा के साथ थे लेकिन आज वामपंथियों से लेकर समाजवादियों तक में उनकी पैठ है और वे हर उस मोर्चे में सबसे अगली क़तार में दिखाई दे रहे हैं जो धर्मनिरपेक्षता की लड़ाई लड़ रहा है। राजनीति के इस दोगलेपन को क्या कहा जा सकता है जहां एक तरफ़ मुलायम सिंह यादव खड़े हैं और दूसरी तरफ़ नीतीश कुमार जो सत्रह सालों तक भाजपा की पालकी ढोते रहे और अब आख़री वक्Þत में मुसलमां हो कर ख़ुद को मुसलमानों का सबसे बड़ा मसीहा मानने की ख़ुशफ़हमी पाले बैठे हैं। लेकिन कांग्रेस ही नहीं मुलायम, लालू और अब नीतीश के लिए तो मुसलमान महज़ वोट से ज्Þयादा कुछ नहीं है, रहा भी नहीं है। किसी दल ने उनकी आर्थिक और सामाजिक बदहाली को गंभीरता से दूर करने की कभी कोशिश नहीं की बल्कि वक्Þत-बेवक्Þत कुछ ऐसा कह या कर डाला जिससे मुसलमानों का भला तो नहीं हुआ, नुक़सान जÞरूर हुआ। भारतीय जनता पार्टी को अगर आज देश में स्पेस मिला है तो उसकी बड़ी वजह समाजवादी चोले पहने मुलायम, नीतीश और लालू जैसे नेता ही हैं। जिन्होंने समाजवाद की आड़ में सांप्रदायिक ताक़तों को ख़ूब खेलने और फलने-फूलने का मौक़ा दिया। नरेंद्र मोदी आज समय के रथ पर सवार जिस तरह ऐंठ-अकड़ रहे हैं वह इन समाजवादियों की बदौलत ही मुमकिन हो पाया है। गुजरात में सत्ता और प्रशासन की शह पर दंगाइयों ने मुसलमानों का गला काटा और पूरा देश इस तमाशे का गवाह बना रहा। तब नीतीश उनके साथ थे और मायावती भी, जार्ज फर्नांडीज भी और रामविलास पासवान भी, ममता बनर्जी भी और नवीन पटनायक और चंद्रबाबू नायडू भी। और भी कई नाम हैं जो केंद्र में उसी भाजपा के साथ गलबहियां कर रहे थे जिसके मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के गुजरात में मुसलमानों का क़त्लेआम हो रहा था। लेकिन तब इनमें से कितनों ने भारतीय जनता पार्टी का साथ छोड़ा था। बहुत बाद में रामविलास पासवान ज़रूर अलग हुए थे, लेकिन इसकी वजह गुजरात दंगे नहीं थे। वाजपेयी सरकार से अलग होने के लिए उन्होंने ज़रूर गुजरात के दंगों को आधार बनाया लेकिन सियासत को जानने-समझने वाले जानते हैं कि पासवान ने बेहतर मंत्रालय न मिलने की वजह से ही राजग से नाता तोड़ा था। वर्ना गुजरात में दंगे तो फ़रवरी में हुए थे और उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा अप्रैल के अंत में दिया था। गुजरात में लोगों का गला काटा जाता रहा और पार्टियां विधवा-राग अलापती रहीं। सरकार से बाहर आने की हिम्मत किसने और कितनों ने जुटार्इं, समय लिखेगा उनका भी इतिहास। धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिकता के हमाम ने सभी राजनीतिक दलों को नंगा कर दिया था। अब वही दल और वही नेता नरेंद्र मोदी की मुख़ालफ़त कर रहे हैं तो हंसी आती है। उन सबके बीच ही मुज़फ्Þफ़रनगर होता है नवादा होता है और धर्मनिरपेक्षता कहीं दूर खड़ा बसूर रहा होता है। कहीं मुसलमान मारे जाते हैं कहीं हिंदू मारे जाते हैं। मज़हब के नाम पर एक-दूसरे का गला काटा जाता है और नेता उन लाशों पर खड़े होकर अपना क़द नाप रहे होते हैं। उन्हें पुरस्कृत और सम्मानित किया जाता है लेकिन ऐसा करते हुए वे भूल जाते हैं कि मारा तो बहरहाल इंसान ही जाता है।

गुजरात दंगों में सरकार और प्रशासन ने जिस तरह की भूमिका निभाई उसके बाद मुसलमानों की धारणा और पुख़्ता हुई थी कि इस देश में वह महज़ वोट से ज्Þयादा कुछ नहीं है। वोट के लिए उसका इस्तेमाल किया जाता है और भाजपा का डर दिखा कर उनके वोट लिए जाते हैं और फिर अगले पांच साल के लिए उन्हें फिर उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है। यह अलग बात है कि कांग्रेस के शासनकाल में भी कम दंगे नहीं हुए हैं। उन दंगों के पीछे भी राजनीति होती रही है। कभी मंदिर बनाने के नाम पर तो कभी मंदिर गिराने के नाम पर। यात्राएं निकालीं गर्इं। लोगों को धमकाया गया। उनके घर जलाए गए। औरतों और बच्चों को भी नहीं बख़्शा गया। एक महान देश की सांस्कृतिक विरासत की गाथा गाते हुए हमें अपने कलंक याद नहीं आते। सत्रह साल तक भारतीय जनता पार्टी के साथ गलबहियां करते हुए नीतीश कुमार को अचानक इलहाम होता है कि भारतीय जनता पार्टी सांप्रदायिक पार्टी है। दूसरे खांटी समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव को मुज़फ्Þफ़रनगर जाने तक की सुध नहीं होती। सफैई में वे नाच-गानों में मसरूफ़ नज़र आते हैं लेकिन मुज़फ़्फरनगर के पीड़ित उन्हें नज़र नहीं आते। उन्हें कैंपों में रहने वाले साज़िश करने वाले नज़र आते हैं। उनके सबसे बड़े सिपहसालार और अपनी लच्छेदार उर्दू से अपने को मुसलमानों का मसीहा मानने वाले आज़म ख़ान विदेशी दौरे पर ही व्यस्त रहे। न तो मुज़फ्Þफ़रनगर पर वे बोले न ही गÞज़ियाबाद और फ़ैज़ाबाद की घटनाओं पर। लेकिन इन सबके बावजूद उनसे बड़ा मुसलमानों का मसीहा कोई नहीं है। अपनी भैंसों के गुम होने पर पूरे प्रशासन को सत्ता के सामने लाचार बनाने वाले आज़म ख़ान ने मुज़फ्Þफ़रनगर में मारे गए मज़लूमों के लिए इतनी तत्परता दिखाई होती तो इंसानियत न तो शर्मसार हुई होती और न ही समाजवादियोंके चेहरे पर दंगों के दाग़ लगे होते। लेकिन सियासत तो वही कराती है जो उसके फ़ायदे के लिए होता है। नरेंद्र मोदी ने गुजरात को प्रयोगशाला बनाया और मुलायम-नीतीश सरीखे समाजवादियों ने मुसलमानों को भाजपा का डर दिखा कर उनके मसीहा बनने की कोशिश की। ऐसी ही कोशिश लालू यादव ने भी की थी और कर रहे हैं।
इन तमाम हमदर्दियों के बावजूद मुसलमान आज हाशिए पर खड़ा है। सियासी दलों ने उन्हें अपने फ़ायदे के लिए इस्तेमाल किया। कभी डरा कर कभी पुचकार कर। लेकिन मुसलमानों को जो मिलना चाहिए था वह न तो कांग्रेस ने दिया, न समाजवादियों ने, न ही कांग्रेस से अलग हुए शरद पवार और न ही ममता बनर्जी ने। मोदी पर आरोप लगाने वाले पवार भूल गए जब 1993 में मुंबई में लोग मारे जारहे थे तब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री वे ही तो थे। तब उन्होंने सतर्कता क्यों नहीं बरती थी। महाराष्ट्र की सत्ता में करीब पंद्रह साल से क़ाबिज़ उनकी पार्टी ने एकबार भी उस श्रीकृष्ण रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की वकालत नहीं की, जो बहुत पहले सार्वजनिक हो जानी चाहिए था। सियासत जो खेल न दिखाए। टोपी और रंग बदलते ही नेताओं का चरित्र भी बदल जाता है, चेहरा भी और चाल भी। सांप्रदायिकता और र्धमनिरपेक्षता को पार्टियां अपनी-अपनी सहूलियत से परिभाषित करतीं रहीं हैं और आगे भी करती रहेंगीं। लेकिन सच तो यह है कि सियासत मज़हब को मज़हब के ख़िलाफÞ, धर्म को धर्म के ख़िलाफ़, जाति को जाति के ख़िलाफ़ और आदमी को आदमी के ख़िलाफ़ खड़ा करती रही है। जबकि होना तो यह चाहिए था कि मज़हब मज़हब के साथ खड़ा होता, जाति जाति के साथ खड़ी होती और आदमी आदमी के साथ खड़ा होता तो इस मुल्क की तस्वीर कुछ और होती लेकिन सियासत ऐसा होने कहां देती है। वह तो लोगों को, मज़हब को, जातियों को, समुदायों को यहां तक कि कभी-कभी परिवार को भी मंडी में खड़ा कर नफ़ा-नुक़सान के तराज़ू में तौलने लगती है। सियासत के इस रंग को देख कर अक्सर यह पंक्ति याद आ जाती है

सर इसलिए ऊंचा है कि क़द उसका बड़ा है
क़द इसलिए ऊंचा है कि वह लाशों पर खड़ा है
मुल्क की मौजूदा सियासत का अक्स इसमें पूरी शिद्दत के साथ दिखाई देता है। क्या नहीं ?

 

फ़ज़ल इमाम मल्लिक
जनसत्ता
नयी दिल्ली
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