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(यह लेख वरिष्ठ लेखक शंकर शरण ने 2011 में जनसत्ता अखबार में लिखा था वही से साभार )

इधर आर एस एस प्रमुख मोहन भागवत ने यह कह कर चौकाया की भारत और पाकिस्तान के एकीकरण के प्रयास होने चाहिए इससे पहले अभिनेता देवानंद ने ये बात उठाई थी लेकिन इस पर चर्चा नहीं होती . जबकि 1947 में विभाजन के समय श्री अरविन्द महात्मा ग़ांधी और राम मनोहर लोहिया जैसे मनीषियों नेताओ का यह विश्वास था की भारत पुनः एक होगा . वल्ल्भ भाई पटेल मानते थे की विभाजन कत्रिम हे सो स्वंय ख़त्म हो जाएगा . शायद इसलिए उन्होंने जिन्ना और आंबेडकर के इस प्रस्ताव को ठुकराया की विभाजन होने पर दोनों और से हिन्दू मुस्लिम आबादी की की अदला बदली भी अवशय हो तभी स्थायी समाधान हो गा . जिन्ना के अनुसार तो यह आवश्यक था क्योकि पाकिस्तान भारत के सभी मुसलमानो के लिए बना था . मगर आज ग़ांधी के अनुयायियों ने ही नहीं लोहिया के चलो ने भी यह सब सिरे से भुला दिया हे . हालांकि भारत पाक बांग्ला महासंघ बन सके तो अनेक समस्याए सुलझ जायेगी . विराट सुरक्षा खर्च सीमाओ पर अनावश्यक तैनाती आदि कमरतोड़ आर्थिक बोझ खत्म होगा कश्मीर उत्तरपूर्वजैसे क्षेत्रो के अलगाववाद का भी अनायास समाधान हो जाएगा . जो विभाजन कत्रिम था कुछ नेताओ की निजी महत्वकांक्षाओं या भर्मो से उपजा माना गया और जिससे उस किसी समस्या का समाधान नहीं किया गया जिसके लिए वह किया गया था उसे खत्म करना अव्यवहारिक कैसे हो सकता हे ? जो भारतीय 1947 के विभाजन को गलत मानते हे उन्हें उसके खात्मे की बात करनी ही चाहिए . अन्यथा इस्तिति बड़ी बेढब हो जाती हे विभाजन खत्म करने की बात सिद्धांत रूप में भी न रखना यही बताएगा की दिराष्ट्र सिद्धांत सही था यानी मुसलमान और हिन्दू दो अलग राष्ट्र हे . तब फिर कश्मीर या आगे भारत के किसी भी मुस्लिम बहुल क्षेत्र को अलग होने से किस नाम पर रोक जा सकता हे ? यह कोई काल्पनिक खतरा नहीं असम बिहार के सीमावर्ती क्षेत्र , यहाँ तक की केरल में भी खतरे की घंटिया बजती रहती हे . इस्लामी अलगावाद को हराने के लिए जरुरी हे की दिराष्ट्र सिद्धांत को हराया जाए राष्ट्रिय अखंडता की रक्षा के लिए सैन्य बल निश्चय ही चाहिए पर नैतिक बल भी अपरिहार्य हे . अगर हम दिराष्ट्र सिद्धांत को अमान्य करते हे , तो भविष्य में एकीकरत भारत की बात दुहराना अपरिहार्य हे . जैसे चीन ताइवान के लिए करता हे . तभी वर्तमान भारत की भी अखंडता चाहने वालो का आत्मबल बढ़ेगा और अलगावादियों का घटेगा . यह तर्क ज़्यादा दूर नहीं चलेगा की की 1947 में दिराष्ट्र सिद्धांत ठीक था , मगर आज गलत हे . इससे केवल यह झलकेगा की भारत को फिर से तोड़ने वालो के हाथ में जब पर्याप्त होगी , तब वे फिर से डाइरेक्ट एक्शन कर विभाजन के ‘ अधूरे कार्य ‘ को पूरा कर लेंगे . और उसे गलत माने वाले उसी तरह देखते रह जाएंगे जैसे 1947 में रह गए थे स्मरण रहे की 1940-46 के बीच मुसलमानो को जिन्ना और मुस्लिम लीग के पीछे जाने से न रोक पाने में गांधी नेहरू पटेल समेत कांग्रेस नेतर्तव का वैचारिक गड्डमड्डपन भी जिम्मेदार था . गांधी ने खिलाफत आंदोलन को समर्थन और नेतर्त्व देकर सबसे घातक भूल की क्योकि वह देश प्रेम के विपरीत विश्व इस्लाम की राज़नीति को स्वीकार्ति थी इसलिए जब जिन्ना ने दावा किया की मुस्लमान और हिन्दू अलग अलग दो राष्ट्र हे वे कभी साथ नहीं रह सकते और कांग्रेस मुसलमानो का प्रतिनिधित्व नहीं करती , तो गांधी के पास कोई उत्तर नहीं था . गांधी नेहरू निराधार रटते रह गए की की वहीं मुसलमानो के नेता भी हे इस सैद्धांतिक शून्य के कारण ही उनके पास मुसलमानो को जिन्ना के पीछे जाने से रोकने का कोई तर्क न था . अगर कांग्रेस श्री अरविन्द का सिद्धांत भी स्वीकार करके चलती की भारत का सनातन धर्म ही हमारा राष्ट्रवाद हे तो वह उतनी निहत्थी न रहती . श्री अरविन्द का सिद्धांत हिन्दू मुस्लमान दोनों के लिए सुसंगत था क्योकि वह कोई मज़हबी विश्वास नहीं बल्कि सहज दर्शन था मगर कांग्रेस ने वह न माना न राष्ट्रवाद का कोई वैकल्पिक विचार दिया . क्या आज कांग्रेस की इस्तिति कोई भिन्न हे बिलकुल नहीं वह आज भी उस प्रशन वैसे ही निहत्थी खडी हे . जब दुनिया भर के इमाम आयतुल्ला अमीर और शेख भारतीयमुसलमानो को विश्व उम्मत की जागीर समझ कर दूर देशो की सही गलत इस्लामी मांगो के पक्ष में भड़काते हे , तो हमारे नेता चुप क्यों रह जाते हे ? क्योकि वह आज भी उसी वैचारिक शून्यता के शिकार हे . कांग्रेस ” इस्लाम एक राष्ट्र ” की काट नहीं कर पाई हे यह चुप्पी विश्व उम्मत का दावा करने वाली इस्लामी शक्तियों को प्रकारांतर से बल पहुचाती हे . चाहे आतंकी हो या उग्रवादी उन्हें लगता हे की सिद्धांततः उनकी इस्लामी मोर्चेबंदी उचित हे क्योकि उसकी आलोचना कोई नहीं करता इसलिए केवल कुछ शक्ति संचय और प्रदर्शन की आवश्यकता हे और मामला फतह होगा

दूसरी तरफ कुछ हिन्दू भारत पाक महासंघ की सम्भावना से डरते हे .उन्हें लगता हे की अगर ये सारे मुस्लमान इकट्ठा हो गए तब तो अपनी संगठित शक्ति की बदौलत फिर पूरे भारत पर शासन करेंगे . भय निराधार नहीं पर इसके पीछे पुरानी हिंदी नीतिहीनता बोलती हे . वाही भीरुता जो सदियों शासित प्रताड़ित होने और पर धर्मो को ठीक से समझ न पाने के के कारण उपयुक्त नीति बनाने में बार बार विफल रहने से बनी . हिन्दू उच्च वर्ग स्वय को इतना निर्बल निस्तेज महसूस करता हे की एक के अनुपात में पांच होकर भी न 1947 में विभाजन रोक सका न डाइरेक्ट एक्शन की काट सोच पाया . अगर वह भीरुता यथावत हे तब तो वर्तमान भारत में भी इस्लामी वर्चस्व बढ़ने से नहीं रुक सकेगा . 1906 में लखनऊ पेक्ट से शरू हुई पर्किर्या एक तरह से फिर से अपने को दुहराने लगी हे . मुसलमानो के लिए तरह तरह के विशेषाधिकारी मांगे उठाना और उन्हें ” राष्ट्रिय आंदोलन ” में लाने की दुराशा में एक एक करके स्वीकार करते जाना . आज वही चीज़ मुसलमानो को ” राष्ट्रिय धारा ” में लाने के नाम पर हो रही हे परिणाम आज भी उलट ही हो रहे हे . तो क्या हमने इतिहास से कुछ भी नहीं सीखा ?इसलिए हम मुसलमानो से डरते , सशंकित रहते हे और इस्लाम को झूठे सच्चे श्रद्धा सुमन चढ़ाते रहते हे . जबकि होना उलट चाहिए . विभाजन मुसलमानो के कारण नहीं इस्लामी अंधविश्वासों के बल पर हुआ . जैसे कम्युनिस्ट विचारधारा की झख के कारण कोरिया जर्मनी आदि के टुकड़े किये गए थे उसी तरह इस्लामी विचारधारा की जिद से भारत से काट कर पाकिस्तान बना था . इसलिए जैसे कम्युनिस्ट विचारधारा के पराभव के साथ दोनों जर्मनी का अलगाव स्वतः खत्म हो गया वैसे ही इस्लामी विचारधारा में किसी बुनियादी सुधार के साथ भारत पाकिस्तान का विभाजन भी निरथर्क हो जायेगा . झूठी चापलूसी मौन भीरुता या तुष्टिकरण उलटे परिणाम देगा . अभी समय हे की इसे अच्छी तरह समझ लिया जाए . इसलिए संघर्ष उन इस्लामी विश्वासो से होना चाहिए जो मुसलमानो को देशभक्ति नैतिकता , सामाजिक – आर्थिक विकास आदि बिन्दुओ पर भर्मित करते हे . जैसे मुस्लिम नेता इस्लाम को सामने रख कर बात करते हे उसी तरह हिन्दू उच्च वर्ग भी हिन्दू या सनातन विश्वासो को सामने रख कर बात करे तो लड़ाई सहज और बराबरी की रहेगी .ऐतिहासिक अनुभव और सामान्य मानवीय विवेक बुद्धि दोनों ही आधारो पर यह समझना समझाना सरल हो जाएगा की गलती कहा हुई , और आज भी हो रही हे फिर चाहे विभाजन खत्म करना हो या भारत पाक बांगला महासंघ या आगे विभाजन रोकना सब कुछ संभव हो जायेगा

दूसरी तरफ कुछ हिन्दू भारत पाक महासंघ की सम्भावना से डरते हे .उन्हें लगता हे की अगर ये सारे मुस्लमान इकट्ठा हो गए तब तो अपनी संगठित शक्ति की बदौलत फिर पूरे भारत पर शासन करेंगे . भय निराधार नहीं पर इसके पीछे पुरानी हिंदी नीतिहीनता बोलती हे . वाही भीरुता जो सदियों शासित प्रताड़ित होने और पर धर्मो को ठीक से समझ न पाने के के कारण उपयुक्त नीति बनाने में बार बार विफल रहने से बनी . हिन्दू उच्च वर्ग स्वय को इतना निर्बल निस्तेज महसूस करता हे की एक के अनुपात में पांच होकर भी न १९४७ में विभाजन रोक सका न डाइरेक्ट एक्शन की काट सोच पाया . अगर वह भीरुता यथावत हे तब तो वर्तमान भारत में भी इस्लामी वर्चस्व बढ़ने से नहीं रुक सकेगा . 1906 में लखनऊ पेक्ट से शरू हुई पर्किर्या एक तरह से फिर से अपने को दुहराने लगी हे . मुसलमानो के लिए तरह तरह के विशेषाधिकारी मांगे उठाना और उन्हें ” राष्ट्रिय आंदोलन ” में लाने की दुराशा में एक एक करके स्वीकार करते जाना . आज वही चीज़ मुसलमानो को ” राष्ट्रिय धारा ” में लाने के नाम पर हो रही हे परिणाम आज भी उलट ही हो रहे हे . तो क्या हमने इतिहास से कुछ भी नहीं सीखा ?इसलिए हम मुसलमानो से डरते , सशंकित रहते हे और इस्लाम को झूठे सच्चे श्रद्धा सुमन चढ़ाते रहते हे . जबकि होना उलट चाहिए . विभाजन मुसलमानो के कारण नहीं इस्लामी अंधविश्वासों के बल पर हुआ . जैसे कम्युनिस्ट विचारधारा की झख के कारण कोरिया जर्मनी आदि के टुकड़े किये गए थे उसी तरह इस्लामी विचारधारा की जिद से भारत से काट कर पाकिस्तान बना था . इसलिए जैसे कम्युनिस्ट विचारधारा के पराभव के साथ दोनों जर्मनी का अलगाव स्वतः खत्म हो गया वैसे ही इस्लामी विचारधारा में किसी बुनियादी सुधार के साथ भारत पाकिस्तान का विभाजन भी निरथर्क हो जायेगा . झूठी चापलूसी मौन भीरुता या तुष्टिकरण उलटे परिणाम देगा . अभी समय हे की इसे अच्छी तरह समझ लिया जाए . इसलिए संघर्ष उन इस्लामी विश्वासो से होना चाहिए जो मुसलमानो को देशभक्ति नैतिकता , सामाजिक – आर्थिक विकास आदि बिन्दुओ पर भर्मित करते हे . जैसे मुस्लिम नेता इस्लाम को सामने रख कर बात करते हे उसी तरह हिन्दू उच्च वर्ग भी हिन्दू या सनातन विश्वासो को सामने रख कर बात करे तो लड़ाई सहज और बराबरी की रहेगी .ऐतिहासिक अनुभव और सामान्य मानवीय विवेक बुद्धि दोनों ही आधारो पर यह समझना समझाना सरल हो जाएगा की गलती कहा हुई , और आज भी हो रही हे फिर चाहे विभाजन खत्म करना हो या भारत पाक बांगला महासंघ या आगे विभाजन रोकना सब कुछ संभव हो जायेगा

दुनिया में एकीकरण और विखंडन दोनों पर्किर्याय चलती रहती हे पहले से कुछ भी तय कर पाना मुश्किल हे . 1991 में सोवियत संघ के विघटन के छह महीने पहले तक दुनिया के बड़े से बड़े सोवियतवेत्ता ने सपने में भी नहीं सोचा था की विश्व की सबसे बड़ी महाशक्ति ताश के महल की तरह ढह जायेगी . इसी तरह पाश्चामी जर्मनी और पूर्व जर्मनी के एकीकरण से एक वर्ष पहले तक भी उसकी कल्पना असंभव थी . भारत और पाकिस्तान के साथ भी वही बात हे . दोनों में इतिहास, भूगोल , भाषा संस्कर्ति आदि अनेक बातो में जितनी समानता हे वह पूर्वी और पश्चमी जर्मनी जैसी ही हे . भारत और पाकिस्तान के विभाजन की कत्रिमता के बारे में पाकिस्तानी शासक और नीतिकार हमसे ज़्यादा सचेत हे . इसलिए वे भारत के साथ सांस्कर्तिक आर्थिक सम्बन्ध बढ़ाने से घबराते हे . ठीक उसी तरह जैसे कम्युनिस्ट देशो के सत्ताधीश बुर्जुआ देशो के साथ अपनी जनता के मेल मिलाप से बचते थे पाकिस्तानी शासको को अंदाज़ा हे की आपसी सहयोग सचमुच बढ़ना आरम्भ होते ही लोगो को भारी लाभ दिखाई देगा . झूठे परचारो की कलाई खुलेगी . विशालकाय सैन्य खर्चो की बेवकूफी भी दिखाई देगी . पश्चमी शक्तियों के स्वार्थ भी दिखेंगे जो दोनों को उलझे रख अपनी भूमंडलीय रणनीति साधते हे . इस तरह दोनों तरफ जनता के बीच संबंध बढ़ते ही बात आगे बढ़ेगी और बरबस पर्शन उठेगा की विभाजन हुआ ही क्यों था जैसे पाकिस्तानी शायर इब्ने इंशा ने अपनी एक कविता में हलके से सवाल भी उठाया भी हे ‘ तब पाकिस्तान बनाया ही क्यों था ? इस डरावने सवाल को पाकिस्तानी और इस्लामी रहनुमा अधिक से अधिक दूर रखना चाहते हे . क्योकि यह अकाट्य सचाई हे की इस्लामी राज़ के आलावा पाकिस्तान को भारत से अलग करने वाली कोई चीज़ नहीं बचती हे . इसलिए अकारण नहीं हे की पाकिस्तानी सत्ता हर हाल में भारत विरोध का झंडा उठाय रहती हे . चाहे कोई मुद्दा हो या न हो जब पाकिस्तान अमेरिका यूरोप या तालिबान से जलील हो रहा होता हे , तब भी उसकी बयानबाज़ी भारत के विरुद्ध . यह उसकी अस्तित्ववादी विडम्बना हे . यह समझते हुए हमें भी अपनी सही टेक बनाना आवशयक हे . तभी पाकिस्तान में आत्मसंशय और गहरा होगा और वे निरर्थक नीतियों पर पुनर्विचार को मज़बूर होंगे . हर हाल में यह भार मुस्लिम प्रवक्ताओ पर डालना चाहिए की वे सभी मनुष्यो की समानता और सहज मानवीय विवेक -न की इस्लाम के नाम पर – अपने तर्कों मांगो दावों को खड़े करने के उपाय करे . धमकी हिंसा छल , दोहरापन और मज़हबी विशेषाधिकारों की वैचारिकता को किसी भी इस्तिति में स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए . इसी भूल से भारत विभाजन हुआ था उसे खारिज कराना ही भारत पाक समस्या के समाधान का मार्ग प्रशस्त करेगा