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( वरिष्ठ लेखक और अर्थशास्त्री गिरीश मिश्र जी का ये लेख कुछ साल पहले जनसत्ता में छपा था अब जब की भारत में कहा जा रहा हे की रिचिस्तान के वासियो ने अपने पसंदीदा व्यक्ति को बहुमत से सत्ता तक दिलवा दी हे ऐसे में ये लेख और अधिक प्रसांगिक हो गया हे जनसत्ता से साभार )

आप हिंदुस्तान पाकिस्तान उजबेकिस्तान तजाकिस्तान के आदि से परिचित हे आपने कभी खालिस्तान को लेकर चले आंदोलन को देखा था मगर आपमें से शायद ही बहुत लोगो ने रीचिस्तान का नाम सुना होगा . जैसे स्पेनवासी कोलम्बस ने अमेरिका को ढूढ़ निकाला था वैसे ही वाल स्ट्रीट जनरल के आर्थिक विशेषज्ञ रोबर्ट फ्रैंक ने रीचिस्तान को खोज निकाला हे . इस साल पांच जून को उन्होंने इसी नाम से प्रकाशित पुस्तक से उजागर किया . कोलम्बस ने जिस भूभाग को ढूढ़ निकाला था उसका अस्तित्व पहले से ही था वहा वे लोग थे जिनकी अपनी सभ्यता थी इसके विपरीत रीचिस्तान का उदय अभी अभी हुआ हे उसे न आप एटलस पर देख सकते हे और न ही वहा पुराने ज़माने से कोई बाशिंदे रह रहे हे और न वहा कोई पुरानी सभ्यता संस्कर्ति हे यह नया देश अमूर्त हे जिसे महसूस किया जा सकता हे . इस अमूर्त नवोदित देश का सबसे अधिक दबदबा अमेरिका में हे फ्रैंक के अनुसार वह अमेरिका के मर्मस्थल पर अंकित हे और करोड़पति ही उसके बाशिंदे हे जिन्होंने पिछले बीस वर्षो से अपनी यह हैसियत बनाई हे ध्यान से देखे तो हमारे अपने देश में भी रीचिस्तान की नीव पड़ चुकी हे और आने वाले दशको में उसका वर्चस्व काफी हद तक स्थापित हो जाएगा . फ्रैंक ने 277 पृष्ठ की अपनी पुस्तक में कतिपय प्रश्न उठा कर उनके उत्तर ढूढ़ने की कोशिश की हे उदहारण के लिए इस नए देश में रहने वाले कौन हे ? उन्होंने अकूत धन कैसे अर्जित किया हे ? धन सम्पदा के कारण उनके जीवन में क्या परिवर्तन आये हे और शेष अमेरिकी जनसँख्या को वो कैसे प्रभावित कर रहे हे ? एक प्रतिशत सबसे समृद्ध अमेरिकी साल में जितना कमाते हे वह फ़्रांस इटली और कनाडा की कुल वार्षिक राष्ट्रीय आय से कही अधिक हे अमेरिका के करोड़ पतियों ने अपनी एक अलग दुनिया बसा ली हे जिसकी अपनी स्वास्थ्य सेवाय आवागमन और सुरक्षा की सुविधाए , पर्थक अर्थवयवस्था और परस्पर सवांद की विशेष भाषा हे . फ्रैंक के शब्दों में सम्रद्ध मात्र सम्रद्धतर नहीं हो रहे , बल्कि वित्तीय दर्ष्टि से विदेशी बनते जा रहे हे . उन्होंने एक देश के अंदर ही अपना अलग देश समाज के अंदर ही अलग समाज और अर्थवयवस्था के भीतर अपनी अलग अर्थवयवस्था बना ली हे . अगर आप दिल्ली जैसे महानगर में नज़र दौड़ाय तो कुछ ऐसा ही नजारा उभरता हुआ दिखेगा . दक्षिणी दिल्ली के धनाढ्यों की अपनी सुरेक्षा वयवस्था , परिवहन सुविधाए बिज़ली के जेनरेटर मैक्स फोर्टिस जैसे अस्पताल पर्थक निजी स्कूल वयवस्था क्लुब अमेरिकी शैली के रेस्तरां निजी सुरक्षा गार्ड और सिनेमा हाल आदि हे .

आज के अमेरिकी धनाढ्य हो या भारतीय वो पुराने धनाढ्यों से अलग हे पुराने धनाढ्यों का आधार वस्तुओ और सेवाओ का उत्पादन रहा . फोर्ड ने गाड़िया बनाई तो टाटा ने इस्पात . आज के अधिकतर धनाढ्य वित्तीय जगत से सट्टेबाज़ी के आधार पर उभरे हे . इसी कारण पुराने और नए धनाढ्यों के चरित्र और जीवन मूल्यों के बीच अंतर लाज़मी हे . राजनीती के पार्टी उनका दर्ष्टिकोण देशभक्ति के बजाय पैसा बनाने के उद्धशेय से अधिक प्रेरित हे उधारणसावरूप कोलोरोडो राज्य के चार धनाढ्यों को ले जिन्होंने डेमोक्रेटिक पार्टी पर कब्ज़ा जमकर राज्य की नीतियों को अपने स्वार्थ साधना के लिए इस्तेमाल किया . ऐसा कुछ कुछ अपने यहाँ भी शरू हो गया हे अर्थशास्त्री जान केननथ गालब्रेथ ने कभी कहा था की हम धनाढयो को सबसे अधिक देखते हे . मगर उन्हें नज़दीक से जाने और उनका अध्ययन करने की कोई कोशिश नहीं करते . यह बहुत साल पहले की उपेक्षाआज कही अधिक सही हे . फ्रैंक ने इसी कमी को पूरा करने का प्रयास किया हे . उन्होंने अमेरिका के विषय में जो तथ्य उजागर किये हे उनसे हमें अपने धनाढयो को समझने जानने में काफी मदद मिलेगी .

1980 के दशक केअंतिम वर्षो में धनाढयो के अपने छोटे शांत मोहल्ले थे वहा तड़क भड़क नहीं थी . वहा खानदान और पृष्ठभूमि का काफी महत्व था वस्तु उत्पादन ही उनके धन का स्रोत था . एकाएक धनी हुए लोगो की इज़्ज़त काम थी उन्हें सुसंस्कृत नहीं माना जाता था . 1980 के दशक के अंतिम वर्षो के दौरान यह सब तेज़ी से बदला . अर्थवयवस्था के वित्तीयकरण ने सट्टेबाज़ों की एक नयी जमात को जन्म दिया . जिन्होंने शेयर बाजार और
कम्पनियो की खरीद बिक्री के जरिये भारी धन कमाया . इस जमात के साथ प्रोद्योगिकी के क्षेत्र के अग्रदूत भी आ मिले और इस तरह रिचिस्तान बना 1982 में अमेरिकी अरबपतियों की संख्या मात्र तेरह थी जो 89 में सड़सठ और 2000 में अस्सी लाख हो गयी इन नव धनाढ्यों में से शायद ही किसी को बाप दादाओ से धन मिला हे यही नहीं पुराने धनाढयो की तुलना में नव धनाढ्य काफी काम उम्र के हे .

अमेरिका में हमेशा ही तीन शक्तियों के सयोंग से ही धनाढयो की संख्या में उछाल आया हे ये हे नई प्रोधोगिकी , वित्तीय सट्टेबाज़ी में बढ़ोतरी और मुक्त बाजार और धनवानों को सरकार का पुरजोर समर्थन . 1980 के दशक के अंतिम वर्षो से धनाढयो की संख्या में तेज़ वर्द्धि सुचना प्रोधोगिकी के क्षेत्र में क्रन्तिकारी परिवर्तनों , पूंजी बाजार में उछाल और विनियमन के कारण हुई हे विनियमन सिर्फ
अमेरिका में ही नहीं , बल्कि वाशिंगटन आम राय के तहत सारी दुनिया में हुआ हे . मुक्त बाजार निजीकरण और बेरोकटोक व्यापर और निवेश ने अपना कमल दिखाया हे . सरकार का अर्थवयवस्था में हस्तक्षेप न्यूनतम हो गया हे करो की दरें कम की गयी हे . इस प्रकार धन कमाने के अवसर बढे हे पहले की तरह रीचिस्तानी धीरे धीरे लखपति करोड़पति या अरबपति नहीं बने हे बल्कि उनके यहाँ धन की वर्षा एकाएक हुई हे अनेकने धन बटोरने के लिए जाल फरेब और घोटालो का भी सहारा लिया हे जैसा की एनरॉन वर्लडकॉम एडेल्फ़िया कम्युनिकेशंस और टायको के सिलसिले में उजागर हुआ हे . फ्रैंक के अनुसार धन की विश्वव्यापी नदी नई प्रोधोगिकी , भूमंडलीकरण और बाजार हितेषी सरकारों के सयोंग से धनाढयो की नई पीढ़ी का जन्म हुआ . धनाढ्यों की पिछले किसी भी पीढ़ी की तुलना में उन्होंने कही अधिक शिग्रता से भारी धन अनेक स्रोतोंसे बटोरा .

रिचिस्तान ने अवकाशभोगी वर्ग की पुरानी परिभाषा को भी बदल दिया हे वह थोसटरीन वेबलें दुआरा 1899 में अपनी पुस्तक द थ्योरी ऑफ़ द लेजर क्लास में निठल्ले रूप में अवकाशभोगी वर्ग को पेश करने को अब सही नहीं मानता हे नया अवकाश भोगी वर्ग कार्य के नशे में धुत रहता हे वह अपना समय पोलो जैसे खेलो में नहीं लगाता . चूँकि आज अर्थवयवस्था प्रतिद्वन्दता और अभिनवीकरणपर टिकी हे इसलिए वह निठल्ला नहीं बैठ सकता वह हमेशा उन्हें लेकर चिंतित और प्रयासरत रहता हे उनके लिए क्रीड़ा और कार्य एक दूसरे के पर्याय बन गए हे नौकाविहार हो या हवाईयात्रा , वह निरंतर लेपटोप पर कार्य करता रहता हे ———- वे पैसे के जरिये दानवीर और कला विज्ञान और शिक्षा के संरक्षक बनना चाहते हे पुराने धनाढ्य फिजूलखर्ची और धोंस ज़माने के खिलाफ रहे हे जबकि नवधनाढ़य अपने धन को तरह तरह से उपभोग ( जैसे शानदार पार्टिया ) के जरिये प्रदर्शन कर लोगो को चुंधिया देना चाहते हे धन की प्रचुरता होने से उन्होंने उपभोग को नए स्तर पर ला दिए हे लाखो करोड़पति उच्च सामाजिक दर्जे के लिए आपस में होड़ कर रहे हे अपने प्रतिद्वंदियों के मुकाबले ज़्यादा आलीशान मकानो गाड़ियों निजी जलयानों और हवाईजहाज़ कपड़ो आभूषणो घड़ियों आदि के लिए होड़ हे वेबलें की प्रदर्शन उपभोग की अवधारणा में नए आयाम जुड़ रहे हे .

रीचिस्तान मुद्रास्फीति की बढ़ती दर से परेशान नहीं होते तेल की कीमतों में वर्द्धि उन्हें अच्छी ही लगती हे क्योकि वे तो बड़ी और खर्चीली गाड़ियों का इस्तेमाल कर सकेंगे दूसरे नहीं इस प्रकार उनमे और दूसरे लोगो में अंतर बढ़ने से उनकी महत्ता रेखांकित होगी रीचिस्तान कलाकर्तियो और पुरानी वस्तुओ में निवेश करके दिखाना चाहते हे की उनकी रूचि सुसंस्कृत हे साथ ही दुर्दिन में उन्हें बेच कर आसानी से अपने इस निवेश का फल पाया जा सकता हे वे पिकासो आदि के चित्र अपने घरो में सजा कर अपने मेहमानो पर धोंस जमाना चाहते हे साथ ही वे उच्च कोटि की साहित्यिक कर्तियो को करीने से सजा कर रखते हे जिससे आगंतुक उन्हें पढ़ा लिखा माने इन चीज़ो पर व्यय को फ्रैंक ने प्रतिष्ठात्मक व्यय कहा हे

सिटीग्रुप से जुड़े अर्थशास्त्री अजय कपूर के एक शोध का हवाला देकर फ्रैंक ने बताया हे की रीचिस्तान के उदय के साथ ही एक नए पर्कार की अर्थवयवस्था प्लूटोनोमी ( कुबेरतंत्रीय अर्थवयवस्था ) का जन्म हुआ हे जिसकी राष्ट्रिय सम्पदा व्यय मुनाफे और आर्थिक संवृद्धि में भागीदारी काफी बढ़ी तो हे ही , लगातार तेज़ी से बढ़ती जा रही हे कपूर के अनुसार सबसे अधिक कमाई करने वाले बीस प्रतिशत लोगो का अमेरिकी उपभोग में सत्तर प्रतिशत हिस्सा हे . कपूर ने रेखांकित किया हे की जहा भी कुबेरतंत्रीय अर्थवयवस्था होगी वहा बाजार आम लोगो की आय और खरीदारी को लेकर उस तरह चिंतित नहीं होगा जैसा 1970 के दशक से पहले हुआ होता था क्योकि उनकी मांग की कुल मात्र में हिस्सा कम हो ता जा रहा हे . कहना न होग़ा की रीचिस्तानियो की जीवन शैली को देख कर उनके नीचे के वर्ग में उनकी नक़ल करने और उन तक पहुचने की भरी ललक पैदा होती हे कई लोग ऋणकर्तम घृत पिबेत के साथ ही अपराध और भरषटाचार की राह पकड़ते हे क्या कारण हे की अमेरिका जैसे अतिसमृद्ध देश में अपराध और भरषटाचार काफी अधिक हे हमारे देश में अमेरिका का अनुसरण करने का बुखार काफी तेज़ी से फेल रहा हे हमें फ्रैंक की पुस्तक के संदर्भ में इसके नतीज़ों पर विचार करना चाहिए