Malnutrition

अश्वनी कुमार

कुपोषण एक ऐसा चक्र है जिसकी चपेट में कोई भी बच्चा अपनी माँ के गर्भ से ही आ जाता है. और उन बच्चो के जीवन की नियति इस दुनिया में अपना कदम रखने से पहले ही आरम्भ हो जाती है. यह नियति उन देशों में और उन लोगों सबसे अधिक देखी जा सकती है जहां गरीबी और भुखमरी ने सभी को अपने अंतर्गत ले रखा हो जहां पोषण के नाम पर केवल वादें ही किये जाते रहे हों. कुपोषण का रंग स्याह उदास है, जिसमें कहीं तक भी कोई रंग दिखाई नहीं देता, बल्कि यह जीवन के रस को भी अपनी उदासी के चंगुल में लेकर उसे भी काली छाया के आगोश धकेल देता है. कुपोषण केवल शारीरिक विकास को ही प्रभावित नहीं करता प्रत्युत यह तो मानसिक तौर पर किसी बच्चे को अपांग बना देता है. कुपोषण के ऐसा भयानक टाइम बम है जिसका समय माँ के गर्भ से ही आरम्भ हो जाता है और यह जब फटता है तो किसी के जीवन में अँधेरा कर देता है. यह लापरवाही भी है खानपान में. और साफ़ तौर पर खाद्य असुरक्षा का परिणाम है. हमें यहाँ यह देखना जरुरी है कि आखिर यह खाद्य असुरक्षा और लापरवाही जन्मी कहाँ से, कौन है इसका जिम्मेदार? किसके हाथों में है इसकी बागडौर और क्यों लोग जूझ रहे हैं इस समस्या से. जहां आज हमें विश्व स्वास्थ्य संगठन कि ओर से पोलियो मुक्त भारत के मानद उपाधि हासिल कर ली है वहीँ कुपोषण को लेकर हम अपनी हमसे गरीब देशों बांग्लादेश और नेपाल से बभी पीछे हैं. माना कि यहाँ आंकड़ा पाकिस्तान में हमसे अधिक है पर हम तो मंगाल जैसे अभियान में कामयाबी हासिल कर चुकें हैं. पाकिस्तान ने तो नहीं कि वहीँ अगर नेपाल और बांग्लादेश कि बात करें तो विकास के नाम पर वह दोनों ही देश अभी हमसे काफी पीछे हैं. फिर भी वहां कुपोषण कम है. क्यों?

कुपोषण को ख़त्म करने का दायित्त्व हमारी सरकार है. कुपोषण फैला कैसे इसने इतना भयावह रूप कैसे लिया? ये कई बड़े सवाल हैं जिनके घेरे में हमारी सरकार हैं. जब सरकार के यह काम है कि देश से गरीबी का उन्मूलन हो. सभी को भोजन मिले (तथाकथित पोषण युक्त भोजन) जो केवल एक सपना बनकर रह गया है. रोजगार के अवसर सभी को समान रूप से उपलब्ध हों. ताकि जनता अपनी खाद्य की आपूर्ति अपनी खुद के जिम्मे पूरी कर सके. पर सरकार है कि नेताओं और उनके परिवारों के पोषण के लिए एक चौथाई जनता के कुपोषण को जन्म दे रही है. उसकी नींव तैयार कर रही है. जिसपर पिछले 60 सालों में बड़ी इमारते खड़ी कि जा चुकी हैं. जिन्हें गिराना और उन लोगों के पोषण युक्त भोजन का इंतज़ाम करना लगभग नामुमकिन सा हो गया है.

हम अगर कुपोषण के बढ़ने पर गौर करें तो 6 माह से 3 वर्ष के बच्चों में यह तीन गुणा तीव्रता से बढ़ता है. और शरीर के सभी भागों पर गंभीरता से असर करता है. आज भारत में 500 से अधि परिवार ऐसे हैं जो गरीबी के सबसे निचले स्तर पर अपना जीवन यापन कर रहे हैं. इसका सीधा सा अर्थ है कि हमारी आधी से ज्यादा आबादी को दो वक़्त की रोटी भी नहीं मिल पाती. जबकि यह प्रमाणित हो चुका है कि पर्याप्त भोजन नहीं मिलने पर शरीर रोगों से लड़ने की अपनी क्षमता खो देता है और बीमारियाँ शीघ्र ही उसे अपनी चपेट में ले लेती हैं. सरकार भी इस बात भली भाँती विदित है, पर फिर भी यह स्थिति सच्चाई बयान कर देती है कि सरकार क्या कर रही है, और किस प्रकार कर रही है?
कुछ समय पहले राष्ट्रीय पोषण संस्थान ने एक अध्ययन किया था. जिसके अनुसार भारत का मध्य प्रदेश कुपोषण से सबसे ज्यादा ग्रसित है. यहाँ के बच्चों और वयस्कों से लेकर बुजुर्गों तक की रोग प्रतिरोषण क्षमता क्षीण हो चुकी है. न तो सरकार कि कोई योजना यहाँ कारगर है और ही सरकार ने यहाँ की सुध लेने का अपना मन बनाया है. ऐसा ही कुछ हाल पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदे�्योनी उनमें उतनी क्षमता नहीं है कि वह उस पीड़ा को सहन कर सकें, वह सब कुपोषण की शिकार हैं. अब ज़रा अंदाजा लगाइए जिस देश का बचपन ही कुपोषित है तो उस उसकी जवानी कैसे स्वस्थ हो सकती है.

इस भयंकर रोग के कारण बच्चों ने अनेक तरह कि बीमारियाँ अपना घर बना लेती हैं, जो बेहतर ट्रीटमेंट के अभाव में घटने के बजाये बढती चली जाती है. और इतनी बढ़ जाती है कि जान से हाथ धोने के अलावा कुछ नहीं बचता. कुपोषण के चंगुल में फंस जाने पर बच्चे दस्त, खसरा, कुकरखांसी, टीबी और निमोनिया जैसे संक्रामक रोगों की चपेट आ जाते हैं.

कुपोषण के कारण बढ़ रही म्रत्युदर की आंकड़े भी चोंकाने वाले हैं, 5 वर्ष तक के बच्चों में म्रत्युदर प्रति हजार बच्चों पर देखें तो बांग्लादेश में 77, ब्राज़ील में 36, चीन में 9, मिस्र में 41, भारत में 93, इंडोनेशिया में 45, मैक्सिको में 29 और पाकिस्तान में 109 बच्चे कुपोषण के कारण अपनी जान गँवा देते हैं.