Muslim-praying

प्रस्तुति –सिकंदर हयात

( लेखक पत्रकार सुहेल वहीद साहब का ये लेख 9 अगस्त 2007 को दैनिक हिन्दुस्तान में छपा था वही से साभार )

गैर मज़हबी का मतलब धर्म विरोध से नहीं हे एक ऐसा समाज जो तटस्थ होता हे लेकिन धर्म विरोधी नहीं होता , जो ईसाई यहूदी हिन्दू और बौद्ध धर्मो में खूब पाया जाता हे जो सामाजिक मसलो को समाज तक ही सीमीत रखता हे धर्म से नहीं जोड़ता . मसलन ईसाई यहूदी और बौद्ध धर्मो में तलाक की कोई अवधारणा ही नहीं हे लेकिन तलाक का प्रचलन इन सभी धर्मो में बढ़ता ही जा रहा हे इन सभी धर्मो के समाज ने देश के कानून के मुताबिक तलाक को सामाजिक मान्यता दे दी . यूरोप की आधी से अधिक इसे आबादी अपने नाम के साथ नो रिलीजन लिखती हे ऐसा नहीं हे की यहाँ चर्च हावी होने की कोशिश नहीं करता कभी कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट की शादी असंभव थी लेकिन लोगो ने धार्मिक संस्थाओ के खिलाफ विद्रोह किया समाज ने उसे स्वीकारा ऐसा नहीं हे की ” दा विन्ची कोड ” पर बवाल नहीं मचता लेकिन यह सब कुछ ईसाई समाज की प्राथमिक समस्या नहीं बनता . इसके विपरीत मुसलमानो में मज़हब और मज़हबी संस्थाओ का असर बढ़ता ही जा रहा हे . क्योकि धार्मिक कर्म कांडो के बढ़ते प्रभाव के समांतर गैर मज़हबी समाज नहीं पनप पा रहा हे मुसलमान की मन : स्थिति पर उसका मज़हब हावी हो ता जा रहा हे उसे बता दिया गया हे की उसका लक्ष्य जन्नत हे जो हमेशा के लिए हे यह जीवन तो टेम्परेरी फेज़ हे . शायद इसीलिए मुसलमान दुनिया को बड़े हीनभाव से देखता हे . दुनिया के लिए उसकी चिन्ताय सीमित हे दुनिया में वह अप्रवासी हे . क्योकि असल दुनिया तो उसकी’ आकबत ‘ हे जो उसे मरने के बाद नसीब होगी वह उसी’आकबत ‘ को सवारने लगा रहता हे . यह दुनिया तो फानी हे खत्म हो जानी हे उसे मगफिरत की फ़िक्र ज़्यादा हे यानि मौत के बाद होने वाला इम्तेहान जिसमे पास होने के बाद उसे जन्नत मिलेगी और फेल होने पर जहन्नुम की आग . मुसलमानो की दुनिया पर दीन इतना हावी हे की उससे दुनिया के तमाम मामलात उलझते ही जा रहे हे . इसलिए मुसलमानो में सामाजिक चेरिटी न के बराबर हे . समाजसुधार का कोई आंदोलन मुसलमानो में इसीलिए नहीं चल पाता . क्योकि मज़हब के बिना मुस्लिम कुछ सोच ही नहीं पाते इसलिलिये मुसलमान अभी भी अपनी दीनी या मज़हबी चीज़ो में हो गयी गलती या पनप चुके भ्र्ष्टाचार को छुपाते हे

. लाल मस्जिद कांड पर फतेहपुरी मस्जिद के इमाम समेत सबका कहना था की परवेज़ मुशर्रफ़ अमेरिकी दबाव में हे और उन्होंने झूठी गवाहियाँ गढ़ ली हे . दूसरे धर्मो में ऐसा नहीं हे .पिछले साल शंकराचार्य को जेल जाना पड़ा तो हिन्दू समाज उद्धेलित नहीं हुआ लेकिन लाल मस्जिद और और जामे हिफ्ज़ा में से उग्रवादियों को निकलने का पाकिस्तान में कितना हिंसक विरोध हो रहा हे . कितने पादरियों को जब तब जेल होती रही हे दूसरे धर्मो का समाज अपने भ्र्ष्ट धर्मगुरुओ को धिकारेने में कोताही नहीं करता हे . साथ ही वह अपने जिंदगी में वह धर्मगुरुओ के सीमित प्रवेश की ही इज़ाज़त देता हे इसकी सबसे उम्दा मिसाल भारत में राम मंदिर आंदोलन की विफलता हे इस विफलता की वजह मुस्लिम विरोध नहीं बल्कि हिन्दुओ को खतरा हो गया था की ये लोग एक दिन उसकी मज़हबी आज़ादी पर भी कब्ज़ा कर लेंगे . मुसलमानो के बीच जब जब इस तरह की आवाज़ उठती हे तो उसे कुफ्र बक रहा हे कहकर ख़ारिज कर दिया जाता हे पूरा मुस्लिम समाज उन्हें उपेक्षित कर देता हे . ऐसा नहीं हे की मुसलमानो में गैर मज़हबी ( जो मज़हब विरोधी नहीं हे ) लोगो का अकाल पड़ गया हे . अच्छी खासी तादाद में ऐसे लोग हर जगह मौजूद हे पर उनके साथ बाकी समाज का रवैया बहुत ख़राब हे . मिस्र और इराक में भी ऐसा समाज था .जिस पर मज़हब कम हावी था . और इराक की क्या बात करे और मिस्र में भी अब मौलवी ही हावी दिख रहे हे . सलमान रश्दी को ब्रिटेन की महारानी ने सर की उपाधि दी तो मिस्र की संसद में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ प्रस्ताव पारित कर दिया . मलेशिया की राज़धानी कुआलालम्पुर की सड़को पर भी इसी वजह से जोरदार प्रदर्शन हुए . मध्य एशिया के कुछ हिस्से और इंडोनेशिया में भी गैर मज़हबी मुस्लिम समाज हे पर अब वहा भी मज़हबी रुझान बढ़ने लगे हे तुर्की में भी इस्लामी समाज जोर मार रहा हे हालांकि वहा के सेकुलर समाज ने इसका जोरदार मुकाबला किया हे .

इसका यह मतलब ना लगाया जाए की सारी गलतिया इस्लाम ने की हे . सारे फसाद की जड़ इस्लाम हे सभी धर्म एक से हे लेकिन धर्म की अपनी जगह हे . तलाक का मामला तो एक उदहारण हे . गर्भपात पर पोप बेंडिक्ट से पहले के पोप भी केम्पेन चला चुके हे . लेकिन ईसाई समाज में गर्भपात कभी समस्या नहीं बना . कौन सा धर्म परिवार नियोजन या कंडोम की हिमायत में बोलता हे ? इस्लाम समेत सभी धर्म विरोध करते हे लेकिन सिर्फ मुसलमानो में इस पर बहस होती हे फतवेबाज़ी होती हे और जिन्हे मुसलमानो के वोट चाहिए वे इसे मुद्दा बना लेते हे दूसरे धर्मो के समाज का अध्ययन बताता हे की गैर मज़हबी समाज राज़नीतिक नेतृव के परवान चढ़ने की पहली सीढ़ी हे . हो सकता हे की वह मज़हबी रहनुमाओ के दिशानिर्देश का शिकार हो , जैसा की कुछ यूरोपीय देशो में देखा जा रहा हे . फिर भी कुशल और सफल राज़नीतिक नेतृतव गैर मज़हबी समाज में ही पनपता हे . मुसलमानो में अंतराष्ट्रीय स्तर पर राज़नीतिक नेतर्तव का अभाव हे , तो इसकी वजह मज़हबी एकाधिकार हे . जब पूरा समाज मज़हबी होगा तो नेतृतव भी मज़हबी होगा मुसलमानो पर हुए हर हमले का जवाब कोई मौलवी देता हे और मात खाता हे . राज़नीतिक रणनीति का जवाब किसी मज़हबी सोच से नहीं दिया जा सकता हे . यह बात समझे बिना वह सभी को अपना दुश्मन मान लेता हे . फिर पूरा मुस्लिम समाज इसी सोच में मुब्तिला हो जाता हे यह सोच हमेशा नकरातमक ही होती हे . अभी तक भारत के मुसलमानो पर अंतरष्ट्रीय आतंकवाद में शामिल होने का आरोप नहीं था हनीफ पर से आरोप वापस ले लिए गए , पर भारतीय पढ़े लिखे प्रोफेशनलस शक के दायरे में तो आ ही गए . मुल्को और मज़हबों से ज़्यादा प्रासंगिक होती जा रही बहुराष्ट्रीय कम्पनियो में जाने वाले शिक्षित भारतीय मुस्लिम नौजवानो से बड़ी उमीदे थी . कफ़ील सबील जैसे लोगो ने उन पर पानी फेरने की कोशिश जरूर की हे . लेकिन हमें इसकी पर्तिकिर्या में भी मुसलमानो में गैर मज़हबी समाज के वज़ूद में आने की उमीद कर सकते हे जहा से उन्हें राज़नीतिक नेतर्त्व मिलने की उमीद भी बढ़ जायेगी .