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आज तक भारत एक राष्ट्र नहीं बन सका और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख हैं कि वह भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने का राग अलापे जा रहे हैं। जब भी भारत में केन्द्र या किसी राज्य में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकार बनती है, तो आरएसएस इसी तरह का राग अलापना शुरु कर देता है। यह उसका कोई नया राग नहीं है, बल्कि वह अपने जन्म से ही यह राग अलापता आ रहा है। विशेष बात यह है कि आज तक उसका यह बेसुरा राग भारत को हिन्दू राष्ट्र नहीं बना सका। अब तो जनता भी इस बेसुरे राग की इतनी आदी हो गई है कि वह इसे गम्भीरता से लेती ही नहीं। पर आरएसएस कहाॅं मानने वाला है? उसका तो यही एक मात्र मिथकीय मिशन है। पिछले दिनों (इसी 28 नवम्बर 2014 को) हरिद्वार में कनखल के जगदगुरु आश्रम में प्रकाशानन्द महाराज की प्रतिमा का अनावरण करते हुए आरएसएस के सर संघ चालक मोहन भागवत ने हिन्दू राष्ट्र का पुराना राग अलापते हुए भारत के लोकतन्त्र और संविधान पर सीधा हमला किया है। उन्होंने कहा कि ‘सनातन धर्म के उत्थान का समय आा गया है। हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृति और हिन्दू समाज तीनों मिलकर भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाएंगे। यह केवल आज हो सकता है, फिर कभी नहीं।’ (अमर उजाला, 29 नवम्बर 2014)

मोहन भागवत का हिन्दू राष्ट्र का राग इसलिए बेसुरा है, क्योंकि भारत एक लोकतान्त्रिक गणराज्य है, और उसका संविधान धर्मनिरपेक्षवादी है, जिसमें कहा गया है कि कोई भी धर्म राज्य का धर्म नहीं बनेगा। जब नेपाल जैसा हिन्दू देश तक, जिस पर आरएसएस को बहुत गर्व था, लोकतान्त्रिक राष्ट्र बन गया है, तो वह लोकतान्त्रिक भारत को हिन्दू राष्ट्र यानी ब्राह्मणों का देश बनाने का दिवास्वप्न क्यों देख रहे हैं? जबकि वह अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में ब्राह्मणवाद से पीडि़त जातियों में अस्मिता और स्वतन्त्रता की चेतना निरन्तर एक बड़ी सामाजिक क्रान्ति की चेतना बनती जा रही है, जो कभी भारत को हिन्दू राष्ट्र नहीं बनने देगी।

हिन्दू राष्ट्र का राग इसलिए भी बेसुरा है, क्योंकि हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृति और हिन्दू समाज में ही एक राष्ट्र की भावना नहीं है। इसे थोड़ा समझ लिया जाए। राष्ट्र का अर्थ है कौम। यह अंग्रेजी के ‘नेशन’ शब्द का अनुवाद है, ‘कण्ट्री’ शब्द का नहीं। उर्दू में ‘नेशन’ के लिए ‘कौम’ शब्द का इस्तेमाल होता है। हिन्दी में ‘राष्ट्र’ शब्द से ‘देश’ का भ्रम होता है, जबकि यह गलत है। इसका सही अर्थ ‘कौम’ है। अगर हम हिन्दी में राष्ट्र का दूसरा शब्द तलाशेंगे, तो वह ‘नस्ल’ ही हो सकता है। वैसे भी राष्ट्रवाद और नस्लवाद में कोई खास अन्तर नहीं है। हिन्दू राष्ट्र, हिन्दू कौम या हिन्दू नस्ल कुछ भी कह लीजिए, मतलब एक ही है। यहाॅं गौरतलब सवाल यह है कि क्या हिन्दू धर्म एक कौम या नस्ल का धर्म है? क्या हिन्दू संस्कृति एक ही कौम या नस्ल की समान संस्कृति है? और क्या हिन्दू समाज एक ही कौम या नस्ल का समतावादी समाज है? मैं संघपरिवार के रट्टू तोताओं की बात नहीं करता, पर कोई भी सामान्य हिन्दू इन तीनों सवालों का जवाब हाॅं में नहीं दे सकता। हिन्दू धर्म में ब्राह्मण-श्रेष्ठता का राग है, हिन्दू संस्कृति में ब्राह्मण-श्रेष्ठता का दम्भ है और हिन्दू समाज में हजारों जातियों का असमान विभाजन है, तो आरएसएस प्रमुख के इस पागलपन का क्या इलाज है कि भारत हिन्दू राष्ट्र बन जाएगा? वे किस तरह का हिन्दू राष्ट्र बनाएंगे- ब्राह्मण-श्रेष्ठता का, ब्राह्मण-वर्चस्व का या ब्राह्मण-शासन का?

मोहन भागवत कहते हैं कि सनातन धर्म के उत्थान का समय आ गया है। इसका क्या मतलब है? क्या आर्य समाज, ब्रह्म समाज, प्रार्थना समाज सब बेकार के सुधार थे? हैरत की बात है कि आर्य समाजियों ने इसका प्रतिरोध क्यों नहीं किया? जबकि सनातन धर्म का उत्थान पौराणिक धर्म का ही उत्थान है। सनातन धर्म का मतलब वैदिक या औपनिषदिक धर्म का उत्थान नहीं है। वह रामायण -महाभारत के मिथकीय इतिहास को ही भारत का असली इतिहास मानता है और पौराणिक धर्म को ही सनातन धर्म मानता है। आर्य समाज पौराणिक धर्म का खण्डन करता है, फिर वह मोहन भागवत के सनातन धर्म का विरोध क्यों नहीं कर रहा है?

मोहन भागवत कहते हैं कि भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने का काम केवल आज हो सकता है, फिर कभी नहीं। इसका क्या यह मतलब नहीं है कि आज देश में उनकी सरकार है, वे निर्भय होकर हिन्दू राष्ट्रवाद के संविधान-विरोधी मिशन को आगे बढ़ा सकते हैं? पर, यह काम इतना आसान नहीं है, इसे वे भी अच्छी तरह समझते हैं। इसके लिए उन्हें भारत के संविधान को बदलना होगा, जो उनके बश की बात नहीं है। लेकिन, हाॅं वे अपने इस गन्दे मिशन से हिन्दू राष्ट्रवाद का धर्मोन्माद जरूर बनाए रख सकते हैं, जो आगे चलकर भाजपा के लिए ही आत्मघाती साबित होगा।

राष्ट्रवाद वह दुधारी तलवार है, जो एक ओर अपने सहजातियों के प्रति भ्रातृत्व का भाव रखता है और दूसरी ओर अपने विरोधियों के प्रति नफरत का प्रचार करता है। संघपरिवार, जिसमें आरएसएस, उसके अनुषांगिक संगठन और भाजपा सभी शामिल हैं, मुसलमानों और ईसाईयों के प्रति यही नस्लवादी नफरत फैलाकर हिन्दू राष्ट्रवाद को कायम करना चाहते हैं।