Isis-fighters

न्यु एज इस्लाम एडिट डेस्क

इराक और सीरिया के कुछ हिस्से पर क़ब्ज़ा करने के बाद दाइश के गैंग लीडर अबु बकर अल-बग़दादी ने इस्लामी खिलाफत की स्थापना का ऐलान किया और खुद को मुसलमानों का खलीफा नामित किया। उन्होंने दुनिया के मुसलमानों को अपनी खिलाफत में आकर नागरिकता हासिल करने का निमंत्रण दिया और इस्लामी देशों से कहा है कि वो इस इस्लामी खिलाफत को क़ुबूल करके उसकी अधीनता स्वीकार कर लें। जवाब में मरहबा मरहबा के शोर के बजाय इस्लामी दुनिया के प्रमुख आलिमे दीन अल्लामा यूसुफ अलकरज़ावी ने इस खिलाफत को इस्लामी मानने से इंकार कर दिया। ब्रिटेन के उलमा ने भी अपने बयान में कहा कि उनकी तथाकथित सरकार इस्लामी सरकार या खिलाफत नहीं है। किसी भी छोटे से छोटे इस्लामी देश ने भी अबु बकर के इस निमंत्रण पर लब्बैक नहीं कहा और उसकी खिलाफत को स्वीकार करने से इंकार कर दिया। दुनिया के किसी भी हिस्से के किसी भी मुसलमान ने अबु बकर की खिलाफत में जाने में दिलचस्पी नहीं दिखाई। बल्कि इसके विपरीत वहां मौजूद भारतीय मुसलमान निकल भागने की कोशिश में हैं और जो लोग वहां से भागने और अपने देश वापस आने में सफल हो गये, उन्होंने अल्लाह का शुक्र अदा किया।

इराक़ के नजफ़ में नौकरी करने वाले केरल के कोझिकोड के दो मुस्लिम नौजवान सफदर कुन्ही और मोहम्मद अब्बास जो नजफ़ में थे, ने दाइश के लड़ाकों के वहशीपन और दरिंदगी को अपनी आंखों से देखा। वो किसी तरह इराक से निकलने में कामयाब हो गये और वापस अपने वतन केरल चले आए। मोहम्मद अब्बास ने मशहूर न्यूज़ वेबसाइट रीडिफ डॉट कॉम को दिए गए बयान में कहा कि दाइश के लड़ाके वहशी दरिंदे हैं। उनकी दरिंदगी असहनीय है और उनकी हिंसा बयान के लायक़ नहीं है। उनके साथी सफदर कुन्ही ने कहा कि वो जंगली हैं। वो विशेष रूप से शियाओं को निशाना बनाते हैं। वो उन लोगों को भी निशाना बनाते हैं जो पवित्र स्थानों की ज़ियारत के लिए इराक गए हैं। लोगों ने हमें बताया कि वो ज़ायरीन को इबादत या ज़ियारत के वक्त क़त्ल कर देते थे। ज़ायरीन को पकड़ कर बेदर्दी से हत्या कर दी जाती थी। समारा में स्थिति सबसे अधिक गंभीर थी।

इन दोनों बातों से ये स्पष्ट होता है कि इराक में दाइश के लड़ाके केवल इराकी सेना से नहीं लड़ रहे हैं बल्कि वो शियाओं की जमकर हत्या कर रहे हैं क्योंकि उनके दृष्टिकोण से वो काफिर हैं। इसी तरह से जो लोग मज़ार पर देखे गए या मज़ार जाते हुए रास्ते में पाए गए उन्हें भी काफिर करार देकर मार दिया गया। इन्हीं कारणों से इस्लामी दुनिया के मशहूर आलिम और मुफ्ती अल्लामा अलकरज़ावी ने अबु बकर की स्वयंभू खिलाफत को अमान्य और इस्लामी शरीयत का उल्लंघन करार दिया है। ब्रिटेन के शिया और सुन्नी उलमा ने अपने संयुक्त बयान में अबु बकर की तथाकथित खिलाफत का विरोध और निंदा की है और मुसलमानों को इसके बहकावे में न आने की सलाह दिया है। ब्रिटेन के मजलिसे उलेमाए शिया के प्रमुख सैयद अली रिज़वी ने कहा कि हम मुसलमान हैं और हम सब दाइश के खिलाफ, आतंकवाद के खिलाफ, अत्याचार, उत्पीड़न और हिंसा के खिलाफ एकजुट हैं। लीस्टर की मुख्य मस्जिद के इमाम मौलाना शाहिद रज़ा ने कहा कि एक सुन्नी मुस्लिम की हैसियत से मैं दाइश की खिलाफत को स्वीकार नहीं करता। मैं दाइश को एक आतंकवादी संगठन समझता हूँ। कल्याणकारी संगठन जमास के प्रमुख अबु मुन्तसिर ने अपने बयान में कहा,”भाइयों और बहनों! अगर एक वाक्य में दाइश के बारे में कहना चाहूँ तो मैं कहूंगा कि वो बुराई के प्रतीक हैं, झूठे हैं, अपनी इच्छाओं के गुलाम हैं, बुरे लोग हैं। उनके क़रीब न जाएं।”

समाचार रिपोर्टों के अनुसार दाइश ने अपने क़ब्ज़े वाले क्षेत्र खासकर मोसूल में इमाम बारगाहों और सुन्नी बुज़ुर्गों के मज़ारों को ध्वस्त कर दिया और कई चर्चों को अपने कब्ज़े में लेकर अपना काला झंडे लगा दिया है जो कि इस्लामी शिक्षाओं के खिलाफ है।

दाइश के स्वयंभू खिलाफत, उसका स्वयंभू खलीफा दरअसल अमेरिका की पैदावार है और उसे इतना मज़बूत बनाने में अमेरिका की तरफ से प्रदान की गई सैन्य सहायता का बड़ा दखल है। मोसुल में जंग के दौरान इराकी सेना में मौजूद सुन्नी तत्वों ने नूरी अलमालिकी की शिया समर्थक नीति से मायूस होकर अमेरिका के इशारे पर हथियार डाल दिए और जो भी अमेरीकी हथियार, बख्तरबंद गाड़ियाँ और एंटी टैंक रॉकेट उनके पास थे वो भी अमेरिका के इशारे पर उन्होंने दाइश के सुपुर्द कर दिए। इस तरह सीरिया में अमेरिका ने अपने राजनीतिक और सैन्य हितों की पूर्ति के लिए शिया- सुनी गृहयुद्ध को और भड़काया और इस उद्देश्य के तहत उसने दाइश का इस्तेमाल किया। रिपोर्टों के मुताबिक अमेरिका ने दाइश को और टैंक नष्ट करने वाली मिसाइलें और राकेट दिए हैं क्योंकि रूस ने इराक की नूरी अलमालिकी सरकार को अपने सुखोई विमान दिये हैं। इसके अलावा ओबामा ने सीरिया के विद्रोहियों जिनमें आतंकवादी संगठन भी हैं, के लिए पार्लियमेंट से 500 मिलियन डॉलर की और सहायता राशि की मांग की है जो कि उसकी दोगली नीति को बताता है।

ज़ाहिर है अमेरिका दाइश और उनके जैसे अन्य आतंकवादी संगठनों की इतनी मदद इस्लामी खिलाफत की स्थापना के लिए नहीं कर रहा है बल्कि इस क्षेत्र को टुकड़ों में बाँटने के लिए कर रहा है। लेकिन मुसलमानों का एक वर्ग इस सारी राजनीतिक पृष्ठभूमि से अनजान केवल दाइश के ”इस्लामी खिलाफत’ के फरेबी नारे के बहकावे में आकर ये यक़ीन करने लगा है कि अबु बकर की ये खिलाफत वास्तव में ख़ुलफ़ाए राशिदा के इस्लामी खिलाफत की तर्ज़ पर इस्लामी हुकूमत है। हमारे कुछ पत्रकार भी इस खिलाफत के समर्थन में लिख रहे हैं और दाइशियों की दरिंदगी और पंथीय मतभेद के आधार पर मुसलमानों पर उनकी हिंसा और बर्बरता को नज़रअंदाज करके उन्हें सकारात्मक रूप से पेश करने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं। इस सम्बंध में वो दाइश के द्वारा भारत की 46 नर्सों की सम्मानजनक रिहाई के मामले को पेश करते हैं। ये नर्सें तिकरित के एक अस्पताल में दोनों तरफ से होने वाली बमबारी में फंस गई थीं। इनको किसी भी तरह का पहुंचने वाला नुकसान दाइश के लिए अंतर्राष्ट्रीय मुसीबत बन जाता क्योंकि हिंदुस्तान एक शक्तिशाली देश है और सऊदी अरेबिया और अमेरिका से अच्छे सम्बंध हैं और दाइश सऊदी अरब और अमेरिका के रहमो करम पर है। इसलिए सऊदी अरेबिया और अमेरिका के दबाव में उन्होंने नर्सों को सुरक्षा दी और इराक से इन लोगों के निकल जाने का रास्ता बनाया। इस घटना को भारत के दाइश समर्थक पत्रकार और स्तंभ लेखक ले उड़े और सिर्फ एक घटना की मदद से दाइश को एक मानवतावादी और शुद्ध इस्लामी शिक्षाओं पर चलने वाला गिरोह साबित करने में जुट गए। उन्होंने इस तथ्य को भी नज़रअंदाज़ कर दिया कि दाइश ने पिछले महीने पंजाब और उत्तर भारत के रहने वाले 39 मज़दूरों का अपहरण कर लिया जिनका अभी तक कोई सुराग नहीं मिला है। उन्होंने इस हक़ीक़त को भी नज़रअंदाज़ कर दिया कि इस्लामी दुनिया के प्रमुख उलमा ने दाइश को इस्लाम विरोधी और अबु बकर की खिलाफत को शरीयत के खिलाफ करार दिया है और उसे एक आतंकवादी संगठन माना है।

अभी एक साल पहले तक दाइश को अलक़ायदा इन इराक कहा जाता था और ये आतंकवादी संगठन अलक़ायदा की इराकी शाखा थी। अबु बकर अलक़ायदा का ही एक सक्रिय सदस्य था। उसने अलकायदा से अलग होकर अपना अलग संगठन बनाया जिसका उद्देश्य इराक में सुन्नी सरकार का गठन था जहां शिया और उसकी विचारधारा के विरोधी सुन्नियों को भी जीवित रहने का अधिकार नहीं होगा। अबु बकर एक कट्टरपंथी सुन्नी विचारधारा का समर्थक व्यक्ति है जिसकी नज़र में उसकी राय से मतभेद करने वाला क़त्ल किये जाने के लायक़ है। अफ्रीका, दक्षिण एशिया और अरब में कुछ अन्य आतंकवादी संगठन भी इसी विचारधारा के समर्थक हैं और धर्म और पंथ के नाम पर हिंसा और मुसलमानों की हत्या को सही इस्लाम समझते हैं। इनमें पाकिस्तान में जैशे मोहम्मद, लश्करे झंगवी, लश्करे तैयबा, तहरीके खिलाफत (जो अलक़ायदा की ही एक शाखा है) और तालिबान, इराक में जबहतुल नसरा (अलक़ायदा की एक शाखा) और नाइजीरिया में बोको हराम और अलशबाब उल्लेखनीय हैं। बोको हराम पश्चिमी शिक्षा और संस्कृति के खिलाफ है और वो पश्चिमी शिक्षा प्राप्त करने वाली छात्राओं का अपहरण करने के कारण बदनाम है। उसने हाल ही में एक स्कूल के सौ से अधिक छात्राओं का अपहरण कर लिया है।

इसलिए ये बात दिलचस्पी से खाली नहीं कि अबु बकर की खिलाफत को स्वीकार करने में पहल करने वाली संस्थाओं में यही आतंकवादी संगठन हैं, इस्लामी देश नहीं। बोको हराम जैसे आतंकवादी संगठन ने उनकी खिलाफत को स्वीकार करके खुद उसे आतंकवादियों का अमीर (प्रमुख) साबित कर दिया है। पाकिस्तान में अलकायदा की शाखा ‘तहरीके खिलाफत” अलक़ायदा से रिश्ता तोड़कर अबु बकर की खिलाफत को स्वीकार कर लिया है। सीरिया के आतंकवादी गुट ने भी अबु बकर को अपना खलीफा स्वीकार कर लिया है। यानी अब तक तीन आतंकवादी संगठनों ने अबु बकर को अपना खलीफा स्वीकार कर लिया है। इस लिहाज़ से अबु बकर आतंकवादियों के खलीफा स्वीकार किए जा चुके हैं और उनकी खिलाफत को आतंकवादियों की खिलाफत का दर्जा मिल चुका है। आतंकवादियों की ये खिलाफत जब तक इस क्षेत्र में अमेरिका और इज़रायल के हितों को पूरा करने में सहयोग करती रहेगी तब तक उसे ऑक्सीजन प्रदान की जाती रहेगी और जिस दिन उसने अमेरिका और इसराइल के खिलाफ काम करना शुरू कर दिया, अबु बकर का भी अंजाम ओसामा बिन लादेन जैसा होगा। उनकी खिलाफत धरी रह जाएगी।

Source:

http://www.newageislam.com/hindi-section/new-age-islam-edit-desk/caliphate-of-terrorists-आतंकवादियों-की-खिलाफत/d/98161