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हरे राम मिश्र

िश्व हिन्दू परिषद के संयोजक अशोक सिंघल इन दिनों पूरे देश के दौरे पर हैं। सिंघल द्वारा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत के चहेते व उग्र हिन्दुत्व के चेहरे नरेन्द्र मोदी को देश का प्रधानमंत्री बनाने के लिए हिन्दू धार्मिक संस्थाओं के मुखियाओं, संतों को चुनाव प्रचार के लिए आगे लाने की जीतोड़ कोशिश की जा रही हैं ताकि मोदी की राह को आसान बनाया जा सके।

हाल ही में, पता चला था कि अशोक सिंघल नरेन्द्र मोदी के पक्ष में देश के भीतर एक चुनावी लहर का निर्माण करने के लिए धार्मिक संतों का सहारा लेने जा रहे हैं, और इसके पीछे उनका तर्क था कि इस वक्त देश का राष्ट्रवाद खतरे में हैं, और कई ताकतें राष्ट्रवादियों को कुचलने में लगी हुई हैं। अब खबरें यह भी हैं कि उत्तराखंड के संत स्वामी सत्यमित्रानन्द गिरि ने अशोक सिंघल का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया है और जल्द ही पन्द्रह हजार संत नरेन्द्र मोदी के पक्ष में चुनावी माहौल बनाने के लिए पूरे देश में चुनाव प्रचार करने निकलेंगे।

गौरतलब है कि स्वामी गिरि ने नरेन्द्र मोदी को समर्थन देने के जो कारण गिनाए हैं, उनमें पिछले दस साल में बेतहाशा मंहगाई बढ़ने और मातृशक्ति के अपमान होने जैसे कारण प्रमुख हैं। उनका कहना है कि नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बने बिना अब इस मुल्क में हिन्दू धर्म पर मंडरा रहे खतरों को कोई दूर नही कर पाएगा। इसके लिए वे अपने अनुयायियों को मोदी को वोट देने के लिए प्रेरित करेंगे और ऐसा करने के लिए अन्य संतों से कहेंगे। वैसे भी, देश के एक नागरिक के बतौर नरेन्द्र मोदी समेत किसी भी नेता या दल के चुनाव प्रचार में हिन्दू संत समाज का आगे आना कोई अचंभित करने वाली बात नहीं है, और एक नागरिक के बतौर उन्हे भी अपने विचार और राजनैतिक मुुखिया चुनने की आजादी इस लोकतंत्र में एकदम हासिल है। लेकिन, नरेन्द्र मोदी के चुनाव प्रचार में भाग लेने से पहले उन्हे समाज में उठ रहे कुछ सवालों के जवाब इस देश की आवाम को देने ही चाहिए। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या देश का संत समाज, समाज और देश के प्रति अपनी नैतिक जिम्मेदारियों को गंभीरता से समझता है? क्या वह इस समाज को एक धार्मिक और सामाजिक उन्नति की कोई सार्थक दिशा दिखा पा रहा है? क्या वह समाज को धार्मिक उन्नतिशीलता की राह पर ले जाने को तैयार खड़ा दिख रहा है? हिन्दू धर्म का एक संत होने के नाते उनसे हिन्दू समाज को जो अपेक्षाएं थी, वह कितनी इमानदारी से पूरा कर रहे हैं? क्या संत समाज अपने इस अधिकार का इस्तेमाल करते हुए समाज और देश के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करने के लिए गंभीरता से जवाबदेह है?

इसे बेहद कड़वी सच्चाई के बतौर हमें स्वीकार करना चाहिए कि अगर धार्मिक क्षेत्र की ही बात की जाए तो पिछले पच्चीस सालों में इस क्षेत्र में ही किसी नयी सारगर्भित टीका समेत किसी नये रचनात्मक धार्मिक साहित्य का सर्वथा अभाव दिखता है। आखिर क्या वजह है कि देश में सैकड़ों मठ और अखाड़े होने के बावजूद आज तक धर्म पर किसी भी तरह का नया सारगर्भित शोध और एक टीका तक नही निकाली जा सकी? जब आप अपने अधिकारों की मांग करते हैं तो समाज आपसे अपने कर्तव्य को इमानदारी से निभाने की अपेक्षा भी करता है, और इस आधार पर संत समाज फेल हो चुका है। आखिर हिन्दू संत समाज नें पिछले पच्चीस सालों में समाज की आध्यात्मिक उन्नति के लिए क्या-क्या प्रयास किए, इस पर सामूहिक रूप से उसे अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। रही बात मंहगाई की, तो संत समाज ने चुनाव के पहले अपनी चिंता सार्वजनिक करते हुए देश की आवाम के सच्चे हित चिंतक के बतौर कोई विरोध मार्च तक आखिर क्यों नही निकाला? उस वक्त उसकी क्या मजबूरियां थीं?

जहां तक स्वामी सत्यमित्रानन्द गिरि द्वारा मातृशक्ति के अपमान की बात है, कई संत और महात्मा स्वयं ही मातृशक्ति के घोर अपमान में इन दिनों पकड़े गए है। मंदिर आंदोलन के बाद संत से सांसद बने साक्षी महाराज पर बलात्कार के आरोपों को कौन भूल सकता है? अभी हाल ही में संत आशाराम बापू का मामला हम सब के सामने था। क्या यह सच नही है कि मातृशक्ति के अपमान में इन दिनों देश का संत समाज ही गंभीर सवालों के घेरे में है। आखिर जब इस तरह की घटनाएं समाज के सामने आती हैं तो संत समाज इन पर चुप्पी क्यों साध लेता है? आखिर संत समाज आशाराम बापू या उनके जैसे महात्माओं के रेप और यौन शोषण के आरोपों पर अपनी स्थिति को आज तक स्पष्ट क्यों नहीं कर सका? सवाल यह भी है कि क्या देश का हिन्दू संत समाज संतो द्वारा किए गए रेप को अपराध की श्रेणी में नही रखता? यही नहीं, आशाराम बापू कि गिरफ्तारी के बाद जिस तरह की शर्मनाक हर्कतें और प्रतिक्रियाएं संत समाज की ओर से आयीं थीं, उसे देखकर ऐसा लगता है कि यहां का संत समाज देश को ऐसे मुल्क के रूप में देखना चाहता है जहां किसी खास वर्ग को यौेन अपराध समेत किसी किस्म के अपराध की खुली छूट दी जाती हो? मातृशक्ति के अपमान पर बात करने से पहले संतों को आशाराम पर लगे यौन शोषण के आरोपों पर अपनी स्थिति को स्पष्ट करनी ही चाहिए।

मोदी का प्रचार करने के पहले यहां एक बड़ा सवाल और हम सबके सामने आ रहा है। बाबरी मस्जिद विध्वंस के समय संत समाज ने राम मंदिर निर्माण का एक बड़ा आंदोलन पूरे देश में चलाया था। उस वक्त कई सौ करोड़ रुपये बतौर मंदिर निर्माण का चंदा और उसमें लगने वाली ईंटों के नाम पर देश के गरीब आवाम से इकट्ठे किए गए थे। संत समाज मंदिर तो नही बना सका, किन्तु कई सौ करोड़ रूपए इकट्ठा हुए उन चंदों का एक साफ हिसाब देने से आज तक वह बच रहा है, क्यों? सबसे पहले उसे इन चंदों का हिसाब देना चाहिए। चूंकि राम मंदिर निर्माण का आंदोलन एक धार्मिक आंदोलन न होकर विशुद्ध राजनैतिक आंदोलन था, लिहाजा पहले उस आंदोलन पर उठ रहे गंभीर सवालों का जवाब मोदी के पक्ष में चुनाव प्रचार करने वाले संत समाज को देना चाहिए ताकि, फिर किसी किस्म की वसूली न हो सके और आम जनता की जेबें आंदोलन के नाम पर न काटी जा सकें।

एक बात और, सावरकर ने लिखा है कि हिन्दू धर्म का हिन्दुत्व से कुछ भी लेना देना नहीं है और यह एक विशुद्ध राजनैतिक विचारधारा है। जाहिर बात है ऐसी स्थिति में संतो ंके लिए जिनका काम हिन्दू धर्म और उसके सिद्धांतों का प्रचार प्रसार करना है, कोई खास स्पेस नही बनता। संघ की विचारधारा में संतों और धर्म के सिद्धान्तों के लिए कोई स्पेस नही हैं। वह धर्म को सत्ता प्राप्ति का एक जरिया भर मानता है। फिर संतों को संघ के मंच पर जाने से बचना चाहिए। उन्हें आरएसएस द्वारा खुद को इस्तेमाल होने से बचाना चाहिए। कभी चीफ जस्टिस रहे जे.एस वर्मा ने अपने एक फैसले में कहा था कि हिन्दुत्व एक जीवन पद्धति है और गुजरात दंगों के बाद राष्ट्रीय
मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष रहते हुए जब वे दंगों में आयी शिकायतों की जांच कर रहे थे तो उन्हें कहना पड़ा कि आज उनका ही दिया गया फैसला देश में एक खास वर्ग का गला घोंट रहा है। जाहिर सी बात है हिन्दू धर्म की आत्मा के साथ हिन्दुत्व का कोई मेल नही है।

वैसे भी नरेन्द्र मोदी ने गुजरात के मुसलमानों के साथ जो किया है उसकी अनुमति हिन्दू धर्म कभी नहीं दे सकता है। कत्लों के लिए किसी धर्म में कोई स्थान नही हैं। धर्म इंसानों की बेहतरी के लिए हैं, लेकिन संघ के लिए धर्म अपने फासीवादी उद्देश्यों की पूर्ति के लिए महज एक साधन। वह धर्म की व्याख्याएं भी अपने राजनैतिक उद्देश्य के लिए करता है। अगर संत समाज मोदी का चुनाव प्रचार करता है तो ऐसा माना जाएगा कि गुजरात में बेगुनाह
मुसलमानों के कत्ल को वह सही मानता है और इस तरह से वह धर्म को कत्लगाह मान लेने की एक नयी प्रस्थापना को शह देने में लगा हुआ हुआ है जो कि आने वाली नस्लों के लिए दुखद होगा। बेहतर यही होगा कि संत समाज अपनी धार्मिक जिम्मेदारियों का इमानदारी से निर्वहन करते हुए समाज को दिशा दे। इससे इतर कोई प्रयास उसके लिए कई असहज सवाल खड़े कर देगा जिसका जवाब उसकी आने वाली कई पीढि़यों के पास तक नही रहेगा।