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केंद्र में मोदी सरकार को छह महीने हो रहे हैं। अगर मोदी की नजरों में अच्छे दिन की परिभाषा वास्तव में रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, बिजली, पानी, स्वास्थ्य, सुरक्षा और रोजगार जैसे मानकों पर देश को श्रेष्ठ स्तर पर पहुंचाना ही है तो उनको भविष्य के लिए शुभकामनाएं, मगर सरकार के पहले छह माह में जो कुछ भी घटा है, उसे देखते हुए कुछ बातें लोगों के मन में खटक रही हैं।

यहां लोगों से मतलब विपक्षी दलों या धुर मोदी विरोधियों से नहीं है, क्योंकि उनके लिए तो मोदी कह सकते हैं कि उनको तो हर बात में खोट नजर आएगा ही। यहां लोगों से मतलब उन तटस्थ लोगों से है जो इस उम्मीद में मोदी पर नजर गड़ाए हैं कि अगर हो सकता हो तो चलो मोदी के बहाने ही इस देश का कुछ भला हो जाए। पहले छह महीने में जन-धन योजना, मेक इन इंडिया, स्वच्छता अभियान, महंगाई दर नीचे, डीजल-पेट्रोल के दाम में कमी, आदर्श ग्राम योजना, स्कूलों-गांवों में शौचालय जैसी बातें तो ठीक दिखीं, मगर जो ठीक नहीं दिखा वह भी बहुत महत्वपूर्ण है। लोगों को खटकने वाली इन बातों पर मोदी को जरूर विचार करना चाहिए। विचार करेंगे तो बहुत अच्छा, नहीं करेंगे तो ये छोटी-छोटी बातें आगे उनके लिए बड़ी बाधाएं बन सकती हैं।

मोदी सरकार के पहले छह महीने में लोगों के मन को जो खटका, वह इस प्रकार है-

1- 31 अक्तबूर को नरेंद्र मोदी यदि सरदार पटेल का जन्मदिन मनाने के साथ-साथ कुछ ही देर के लिए इंदिरा गांधी को श्रद्धांजलि देने शक्ति स्थल चले जाते तो उनका कद बढ़ ही जाता, छोटा तो कतई नहीं होता। आखिर कांग्रेसियों ने भी तो उस दिन शक्ति स्थल जाने के अलावा ज्यादा कुछ नहीं किया, लेकिन आरोप मोदी पर लग गया कि उन्होंने इंदिरा की अनदेखी की। यदि वे चले जाते तभी ये लगता कि वे अतीत के महत्वपूर्ण नेताओं को पार्टियों के खाने में रखकर नहीं देख रहे हैं। मोदी को ध्यान रखना चाहिए कि देश की जनता आक्रामक नेता जरूर चाह रही है, पर आक्रामकता का मतलब असहिष्णुता नहीं है। अगर वे ये समझ रहे हैं कि नेहरू या इंदिरा के प्रति इस देश में सम्मान नहीं रह गया है तो यह उनकी बहुत भारी भूल होगी। अब देखिए ना, कांग्रेस को समझ में ही नहीं आ रहा था कि बुरी हार के बाद वह क्या करे, लेकिन नेहरू के बहाने मोदी ने उसे मौका दे दिया कि वह कुछ तो कर सकती है।

2- छह महीने के दौरान जब भी मोदी को सुना, वे यही कहते रहे- मैंने ये कर दिया, मैं ये कर दूगा, मैं ये कर रहा हूं। इसके बजाय यदि वे ये कहते तो ज्यादा बेहतर होता कि हमने या हमारी सरकार ने ये कर दिया या हम ये कर रहे हैं। किसी ने कहा भी है कि महान नेता वही होता है जो काम करने में सबसे आगे रहना है, मगर श्रेय लेते वक्त सबसे पीछे हो जाता है।

3- हो सकता है कि मोदी की कोई रणनीति हो, लेकिन जो दिखा उससे वाकई लगा कि छह माह में मोदी के इतने विदेशी दौरे कुछ ज्यादा ही हो गए। जब देश में नसबंदी से महिलाओं की लाशें बिछ जाती हैं या बाबा रामपाल जैसी घटनाएं होती हैं तो बेशक प्रधानमंत्री हर जगह नहीं जाता, मगर लोगों की नजरें प्रधानमंत्री की तरफ देखती जरूर हैं। ऐसे में जब लोगों को अहसास होता है कि प्रधानमंत्री तो देश में ही नहीं हैं तो उन्हें कहीं कुछ खटकता है, उनके मन को अखरता है।

4- छह महीनों में यह बात बुरी तरह अखरी कि जब प्रधानमंत्री छोटी-छोटी बातों पर भी ट्वीट कर देते हैं तो उन्हें बड़ी बातों पर ट्वीट करने से क्यों पीछे रहना चाहिए? ऐसे ढेरों बड़े और विवादित मसले हैं, जिन पर देश संक्षेप में ही सही, पर उनकी राय जानना चाहता है, लेकिन वे चुप रहे। उन्होंने झाड़ू लगाने पर शरद पवार को तो विदेश से भी ट्वीट करके बधाई दे दी, मगर देश में रहते हुए भी त्रिलोकपुरी दंगा, बवाना की घटना आदि अनेक मसलों पर कुछ नहीं कहा। वे इतना तो कह ही सकते थे कि सरकार ऐसी चीजों को सहन नहीं करेगी।

5- मोदी यह छवि बना रहे हैं कि वे सब कुछ कर सकते हैं। वे कहते हैं कि जनता ने उन्हें मुश्किल कामों के लिए ही तो चुना है। तो क्या ऐसे सक्षम मोदी महीने दो महीने में अपने देश की मीडिया की जिज्ञासाओं को भी शांत नहीं कर सकते? उन्हें खुलकर सामने आना चाहिए और हर वाजिब सवाल का जवाब देना चाहिए। हमने लोकसभा चुनाव में देखा कि वे इंटरव्यू में एक से बढ़कर एक धाकड़ रिपोर्टरों को भी अपने ऊपर हावी नहीं होने दे रहे थे तो अब इंटरव्यू से परहेज क्यों? जनता तो इसका मतलब यही लगाएगी कि आपके पास सवालों के जवाब नहीं हैं। अब तो मीडिया भी आपके लिए न्यूज ट्रेडर नहीं रही। आप उसकी तारीफ ही कर रहे हैं तो फिर सवाल-जवाब से परहेज क्यों?

6- नरेंद्र मोदी ने विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को बनाया, मगर वे भारत में रहती हैं और विदेश यात्रा पर प्रधानमंत्री जाते हैं। अगर सुषमा जी को यहीं बैठाना था तो विदेश मंत्रालय भी मोदी ही रख लेते। इससे लोगों को यह भी लग रहा है कि मोदी, सुषमा को महत्व नहीं दे रहे हैं। विदेश मंत्रालय में सुषमा अगर महत्वपूर्ण और अपरिहार्य होतीं तो शायद उनसे हरियाणा का मुख्यमंत्री बनने के लिए नही पूछा जाता। आखिर एक मुख्यमंत्री (मनोहर पार्रिकर) को केंद्र में बुलाया जा रहा हो और एक केंद्रीय नेता को मुख्यमंत्री बनने के लिए पूछा जा रहा हो तो कोई भी यह सोच सकता है कि मोदी के लिए किसका महत्व ज्यादा है और किसका कम।

7- हर बॉस अपने साथ उस व्यक्ति को रखना चाहता है, जो उसकी बात माने। यह स्वाभाविक है, लेकिन अगर मानव संसाधन विकास जैसे मंत्रालय के लिए मोदी को स्मृति ईरानी के अलावा पार्टी में और कोई विश्वस्त सहयोगी मिला ही नहीं तो इससे यह संकेत भी जाता है कि भाजपा में उनका डंका तो बज रहा है, पर इतने प्रचंड बहुमत के बावजूद वे पार्टी में विश्वासपात्रों की कमी महसूस कर रहे हैं। ये इससे भी जाहिर हो रहा है कि उन्होंने जेटली पर पहले रक्षा मंत्रालय लादा और अब सूचना प्रसारण मंत्रालय। फिर उन्हें रक्षा मंत्री के लिए एक मुख्यमंत्री को बुलाना पड़ा और स्वास्थ्य और रेलवे जैसे महत्वपूर्ण मंत्रियों को बदलना भी पड़ा।

8- मानव संसाधन मंत्रालय में जैसे स्मृति ईरानी ही काफी नहीं थी, इसलिए मोदी ने उन रामशंकर कठेरिया को भी इसी मंत्रालय में भेज दिया, जिन पर अपनी अंकतालिका में हेराफेरी के आरोप लगते रहे हैं। मोदी का मंत्रिमंडल है, वे जानें, उनका काम जाने, पर उनके ये फैसले जनता की आंखों में खटक रहे हैं। वे मानव संसाधन मंत्रालय से जुड़े इन फैसलों से बड़ी आसानी से बच सकते थे। ईरानी को कोई और मंत्रालय दिया जा सकता था। कठेरिया की जगह उनकी जाति के किसी और नेता को भी मंत्री बनाया जा सकता था।

9- छह महीनों में गंगा की सफाई को लेकर भी मोदी उस तरह से मुखर नहीं लगे, जैसे वे चुनाव के पहले थे। यहां तक कि अदालत में गंगा के मुद्दे पर उनकी सरकार को फटकार भी खानी पड़ी।

10- मोदी ने अपनी ये छवि बनाई कि वे तुरंत फैसले लेते हैं, लेकिन सीबीआई निदेशक रंजीत सिन्हा के मामले में कोई भी नहीं समझ पा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट की साफ-साफ समझी जा सकने वाली टिप्पणी के बाद भी मोदी सरकार ने सिन्हा को हटाने का फैसला क्यों नहीं लिया? सिन्हा को भाजपा सरकार ने नियुक्त नहीं किया, भाजपा से सिन्हा का कोई जुड़ाव नहीं रहा, उनके काम पहले भी विवादों में रहे हैं, फिर भी सिन्हा को लेकर चुप्पी लगातार खटकी। इससे तो यही लगता है कि सिन्हा ने भाजपा सरकार में कोई नया कनेक्शन बना लिया है।

11- कालेधन के मामले में मोदी सरकार की गंभीरता को लेकर भी लोगों के मन में खटका हुआ। यदि मोदी इस मामले में पूरी तरह गंभीर हैं तो उन्हें बहुत बाद में रेडियो संदेश के बजाय उसी वक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस करके अपनी बात रखनी चाहिए थी, जब अदालत सरकार को फटकार लगा रही थी।

12- उद्योगपति प्रोजेक्ट लगाते हैं, कोई सामान्य आदमी तो ऐसा नहीं करता, लिहाजा हर सरकार में उद्योगपति सरकार के नजदीक खड़े नजर आते हैं। लेकिन अगर अडानी या कोई भी उद्योगपति विशेष तौर पर मोदी के नजदीक नजर आता है तो मोदी को खुद या अपने सरकारी तंत्र के जरिये यह साफ करना चाहिए कि फलां उद्योगपति को फलां प्रोजेक्ट के लिए फलां सुविधाएं इसलिए दी जा रही हैं कि वह फलां-फलां फायदे देश को देगा। मोदी इस मामले में देश को संतुष्ट करते नजर नहीं आए।

13- भाजपा में चुनाव जीते मुस्लिम नेताओं की भारी कमी है। इस बात को विभिन्न मंचों पर पूरे देश में महसूस किया और कहा जा रहा है। ऐसे में मोदी बाहर से किसी क्षेत्र के विशेषज्ञ को अपने मंत्रिमंडल में लाकर यह संदेश दे सकते थे कि भले ही कोई समुदाय अभी भाजपा के करीब न हो, मगर वे हर समुदाय को प्रतिनिधित्व देने की पूरी इच्छा रखते हैं। वे इस समय भाजपा में उपलब्ध नेताओं को भी तवज्जो देकर यह संदेश दे सकते थे कि हमारे पास तो इतने ही मुस्लिम नेता थे और हमने ज्यादातर का ख्याल रखा है। ऐसे नेताओं में एमजे अकबर, सायना एनसी, असीफा खान आदि हो सकते थे। जेटली चुनाव हारकर तीन मंत्रालय संभाल सकते हैं तो शाहनवाज हुसैन को भी समायोजित किया जा सकता था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले छह महीनों के दौरान सूचनाओं को सरकार से बाहर नहीं आने देने के लिए खासी मेहनत की है, लेकिन इसके बावजूद लोग सरकार को लेकर एक विचार तो बनाते ही हैं। उसे आप किसी रणनीति से या किसी सख्ती से नहीं रोक सकते। यहां लिखी गई बातों को लोग समझ रहे हैं और उनके बारे में बोल भी रहे हैं। मोदी सवा सौ करोड़ लोगों की बातें करते हैं, मगर उन्हें उन ढाई सौ करोड़ आंखों को नहीं भूलना चाहिए जो हर पल उन्हें देख रही हैं, तोल रही हैं। उन्हें इसलिए ज्यादा तोल रही हैं क्योंकि उन्होंने ज्यादा बड़े वायदे किए हैं। सत्ता के गलियारे में कितने भी पहरे हों, मगर ये आंखें सभी पहरों को पार कर जाती हैं। इन आंखों को देर जरूर लगती है, मगर वे समझ सब जाती हैं। इसीलिए लोगों के मन में इन छह महीनों में जो खटका, उस पर मोदी और उनकी सरकार को अवश्य विचार करना चाहिए। निश्चत ही छह महीने किसी भी सरकार के लिए बहुत कम है और इतने कम समय में ज्यादा कुछ नहीं हो सकता, मगर इतने कम समय में किसी सरकार को इतने मौके भी नहीं देने चाहिए कि उसकी छोटी-छोटी बातें भी लोगों की आंखों में खटकने लगे।