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‘दि इंडियन एक्सप्रेस’ ( 23 नवम्बर 2014 ) में ‘मजलिसे इत्तेहादुल मुसलमीन’ (एमआईएम) के सदर असादुद्दीन ओवैसी का इन्टरव्यू पढ़ने के बाद बसाख्ता मेरे मुॅंह से निकला कि यह है वह आदमी, जो मुसलमानों में राजनीति की नई समझ विकसित कर सकता है। यह है वह व्यक्ति, जो मुस्लिम अस्मिता की राजनीति में अंगारे बरसा सकता है। यह वह सही रहनुमा है, जिसकी कयादत की भारत के मुसलमानों को जरूरत है। यह मजहब की राजनीति करने वाला लीडर नहीं है और न यह उन सेकुलर नेताओं सरीखा है, जो मुसलमानों को भाजपा से डराकर उनका वोट हासिल करते हैं। उनकी राजनीति का लक्ष्य तो मुसलमानों को मजबूत करके भारतीय लोकतन्त्र को शक्तिशाली बनाना है।

ज़ीशान शेख ( सहायक संपादक ) द्वारा संचालित ‘दि आइडिया एक्सचेंज’ में असादुद्दीन ओवंैसी से जो सवाल पूछे गए थे, वे ऐसे-वैसे नहीं, ज्वलन्त सवाल थे। जब शुभांगी खापड़े ने पूछा कि कुछ दल एमआईएम को भारत के सामाजिक ढाॅंचे के लिए खतरा मानते हैं, तो ओवैसी का उत्तर था- मुस्लिम नुमाइन्दगी जेलों में ज्यादा है, राजनीति में कम है। महाराष्ट्र से कोई भी मुस्लिम नुमाइन्दगी लोकसभा में नहीं है। मुसलमान सेकुलर पार्टियों को तो वोट दे देते हैं, पर उनके वोट हमारे उम्मीदवारों को नहीं मिलते हैं। अगर एमआईएम खतरनाक होती, तो आन्ध्र प्रदेश में मुसलमानों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होती, जिसे सच्चर कमेटी ने भी माना है। महाराष्ट्र में हमारी कामयाबी से भारतीय संसदीय लोकतन्त्र को ताकत मिली है, जहाॅं भाजपा जैसे बड़े दल का विरोध करने के लिए हमारे जैसे छोटे अल्पसंख्यक दल को जगह मिली है। यह हमारी गलत छवि गढ़ी गई है कि हम राष्ट्र के लिए खतरनाक हैं।

ज़ीशान शेख के इस सवाल के जवाब में कि क्या मुस्लिम-एकजुटता से राजनीतिक दल डरते हैं, ओवैसी ने कहा- अगर वे डरते हैं, तो अच्छा है। हम लम्बे समय से देख रहे हैं कि मुस्लिम नेता और मुसलमान इफ्तार पार्टी करते हैं या अजमेर में चादर चढ़ाते हैं। इसमें मुस्लिम लीडरशिप कहाॅं है? ये सब वे अपने राजनीतिक आकाओं को खुश करने के लिए करते हैं। अगर यही सब मुस्लिम नेता होने की पहचान है, तो मैं ऐसा मुस्लिम नेता नहीं बनना चाहूॅंगा। मैं हमेशा मुसलमानों से कहता हूॅं कि हम सेकुलरिज्म के कुली नहीं हैं। बहुत ढो लिया हमने सेकुलरिज्म को। यह हमारा सलीब नहीं है, जो हम अकेले ही उठाएॅं।

कविता अय्यर पूछती हैं कि क्या मुस्लिम अस्मिता की राजनीति के लिए ध्रुवीकरण जरूरी है? ओवैसी कहते हैं-मुसलमान अपने बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं, वे सरकारी योजनाओं में अपनी हिस्सेदारी चाहते हैं, वे यह नहीं चाहते हैं कि पुलिस उन्हें बेवजह परेशान करे। मुसलमानों को निशाना क्यों बनाया जा रहा है। उन्हे उनका हक क्यों नहीं दिया जा रहा है? लोग हमें बताते हैं कि दूसरे इलाकों में सड़कें अच्छी बनी हुई हैं, हमारे क्षेत्र में खराब हालत क्यों है।
‘क्या भारत को एमआईएम या भाजपा जैसी धर्म-आधारित पार्टी चाहिए?’ मानसी फड़के के इस सवाल पर ओवैसी कहते हैं- प्रधानमंत्री कहते हैं कि हमारे यहाॅं हजारों साल पहले ही प्लास्टिक सर्जरी और स्टेम सेल की खोजें हो चुकी हैं। यदि यही बात मैं कहता, तो मीडिया ने मेरी खबर ले ली होती। वह जापान जाते हैं और भारत के प्रधानमन्त्री के रूप में जापान के प्रधानमन्त्री को गीता भेंट करते हैं, जबकि उन्हें वहाॅं बुद्ध प्रतिमा भेंट करनी चाहिए थी। एक तरफ प्रधानमन्त्री कहते हैं कि भारत के मुसलमान कभी भी आईएसआईएस में शामिल नहीं होंगे, पर दूसरी तरफ हमारे प्रधानमन्त्री कहते हैं कि कुछ चीजें डाइमेटरीकली अपोजिट होती हैं। ऐसा करके मोदी अपने वोट बैंक को खुश करते हैं। इसमें अगर मुसलमान अपने लिए खतरा देखते हैं, तो यह पूरे समाज पर सवालिया निशान है। कोई भी मोदी से गुजरात दंगों पर बात करना नहीं चाहता, कोई भी इशरत जहाॅं या एहसान जाफरी पर उनसे बात करना नहीं चाहता। आरएसएस देश को हिन्दूराष्ट्र कहता है, कोई कहता है कि 2019 तक बाबरी मस्जिद का हल मिल जाएगा।

शेख पूछते हैं, ‘जापान के प्रधानमन्त्री को गीता भेंट करने में क्या गलत है?’ इसके जवाब में ओवैसी कहते हैं- मैं यह नहीं कह रहा हूॅं कि मोदी को कुरआन भेंट करनी चाहिए थी। पर अगर आप जापान जा रहे हैं, तो इससे एक बौद्ध शिल्प दिमाग में उभरता है। अभी हम हिन्दूराष्ट्र नहीं हैं, पर अगर मोदी चाहते हैं, तो वे अपने जड़ बहुमत से, संविधान में संशोधन कर सकते हैं और सेकुलर शब्द को हटा सकते हैं। अन्यथा, जब आप देश से बाहर जाते हैं, तो वहाॅं भारत के प्रधानमन्त्री होते हैं, न कि किसी धर्म के प्रधानमन्त्री। भारत एक सेकुलर देश है, क्योंकि मोदी को सिर्फ 31 प्रतिशत वोट मिले हैं।‘लव जिहाद’ पर पूछे गए अंजली लुकोसे के सवाल पर ओवैसी कहते हैं-लव जिहाद भी आरएसएस का ईजाद किया हुआ आइडिया है। अगर दो व्यस्क एक साथ रहने को राजी हैं, तो हम क्या कर सकते हैं? हमें अपनी लड़कियों को शिक्षित करने की जरूरत है। मैं हमेशा अपने चुनाव क्षेत्र में लोगों से कहता हूॅं कि वे पहले अपनी लड़कियों को पढ़ाएॅं, फिर उनकी शादियाॅं करें।

एक सवाल शाही इमाम जैसे धर्मगुरुओं के प्रभाव-तन्त्र पर पूछा गया था। इस पर ओवैसी का दो टूक जवाब था- इस्लाम में धर्मगुरुओं के लिए कोई विशेष दर्जा नहीं है। उनका दर्जा सिर्फ इतना है कि वे बस नमाज पढ़ाएॅं और घर जाएॅं। पर उन्हें विशेष दर्जा देने का काम राजनीतिक पार्टियों ने किया है। अगर शाहजहाॅं को यह पता होता कि शाही इमाम का पद उनकी राजशाही से भी ज्यादा चलेगा, तो वह खुशी से अपनी गद्दी छोड़कर खुद शाही इमाम बन जाता। शाही इमाम ने जामा मस्जिद का इमाम होने के सिवा, जो वक्फ की सम्पत्ति है, क्या किया है समाज के लिए? क्या उन्होंने एक भी गर्लस कालेज को पैसा दिया है?

एक सवाल के जवाब में ओवैसी पिछले 50 सालों में मुसलमानों की बदतर होती स्थिति पर चर्चा करते हुए कहते हैं- मुसलमानों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को कभी सीरियसली नहीं लिया गया। वे उनके लिए सिर्फ एक टोकिन की तरह हैं, ताकि वे कह सकें कि हाॅं हमारे पास मुस्लिम प्रतिनिधित्व है। मौलाना आजाद हैं, बस मौलाना रहेंगे। उसके बाद कोई नहीं है। लोग विभाजन के लिए मुसलमानों को दोषी मानते हैं। पर इस बात को अब 60 साल से ज्यादा हो गए हैं। तब से आपने मुसलमानों के लिए क्या किया? आप हज-सब्सिडीज क्यों दे रहे हैं? आप मदरसों को आधुनिक बनाने के लिए पैसा क्यों दे रहे हैं? बन्द करो यह फंडिंग। इससे मुस्लिम समाज का कोई नुकसान नहीं होना है। यह सब्सिडीज हमारी लड़कियों की तालीम पर दो। ज्यादा से ज्यादा ऐसे स्कूल बनाने में मदद दो।

ज़ीशान शेख ने एक महत्वपूर्ण सवाल मुस्लिम आरक्षण पर पूछा, जिस पर ओवैसी का जवाब था- मैं इसके पक्ष में हूॅं। मैंने गरीब मुसलमानों को आरक्षण से फायदा उठाते हुए देखा है। वे गरीब मुसलमान, जो कालेज में नहीं पढ़ सकते, आरक्षण से पढ़ सकते हैं, डाक्टर और इंजीनियर बन सकते हैं। मुसलमानों को ज्यादा से ज्यादा तालीम की जरूरत है। मुसलमान पढ़ना चाहते हैं, पर उन्हें सुविधाएॅं नहीं मिल रही हैं। हमारे लिए कुछ मत करो। हमको मच्छी मत दो, मच्छी पकड़ना सिखा दो, हम तूफान का सामना कर लेंगे।

आईएसआईएस पर स्मिता नैयर के सवाल के जवाब में ओवैसी का कहना था- हमने हमेशा कहा कि आईएसआईएस अन-इस्लामिक है। मैं नौजवानों से कहता हूॅं कि अगर आपको जिहाद ही करना है, तो गरीबी से जिहाद करो, जहालत से जिहाद करो और एमआईएम में शामिल होकर लोकतान्त्रिक तरीके से जिहाद करो। सामाजिक बुराइयों से लड़ो।

‘क्या आप नरेन्द्र मोदी से हाथ मिलाएॅंगे?’ यह पूछे जाने पर ओवैसी का जवाब था- वे भारत के प्रधानमन्त्री हैं और इस नाते मैं उनका सम्मान करता हूॅं। पर, उनका विरोध करने का अधिकार भी रखता हूॅं। अगर कल को मैं सीएम बनता हूॅं और मेरी निगरानी में 5000 लोग मारे जाते हैं, जिनमें आपके माॅं-बाप भी मारे जाते हैं, तो क्या आप मुझसे हाथ मिलाएॅंगे? जब तक सारे दोषियों को सजा नहीं मिल जाती है, मैं गुजरात को नहीं भूल सकता हूॅं।
क्या ख्याल है मुसलमानों! आपके लिए ‘मजलिसे इत्तेहादुल मुसलमीन’ से बेहतर पार्टी नहीं हो सकती और असादुद्दीन ओवैसी से बेहतर लीडर!