Spritual-Leaders-of-India-Pardaphash

हरियाणा का कुख्यात स्वयंभू अवतारी सतलोक आश्रम का स्वामी रामपाल आखिर गिरफ्तार हो ही गया। इसके बाद रामपाल को लेकर भी कमोवेश आशाराम की तरह ही रहस्योद्घाटन हो रहे हैं। आस्था व्यक्तियों की रचनात्मक प्रवृत्ति है लेकिन आस्था और अंधविश्वास में अंतर होता है। एक बार फिर इस निष्कर्ष को प्रचारित करने की जरूरत महसूस होने लगी है लेकिन क्या सनातन धर्म में हर ऐरे-गेरे नत्थू खैरे द्वारा अपने को भगवान घोषित करने की परंपरा इसके बावजूद खत्म हो पाएगी। इसका जवाब हां में दे पाना मुश्किल है क्योंकि वैदिक धर्म सनातन धर्म के मुकाम पर आने तक अपने तात्विक उद्देश्य से काफी पहले भटक चुका था जिसकी वजह से यह धर्म अध्यात्म विरोधी क्रीड़ाओं का अखाड़ा बन चुका है।

कुछ दिनों पहले शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती ने एक बहस सिरडी के सांई बाबा को लेकर शुरू की थी जिसका सार यह था कि सारे हिंदु ग्रंथों में बताया गया है कि भगवान के सिर्फ चौबीस अवतार होंगे इसलिए उन अवतारों के अलावा किसी और को सनातनी रहते हुए भगवान के रूप में कैसे स्वीकार किया जा सकता है। हर धर्म की अपनी व्यवस्थाएं हैं जो उनकी मौलिक किताबों पर आधारित होती हैं। जैसे मुसलमानों के लिए यह मानना जरूरी है कि मुहम्मद साहब के बाद कोई नवी इस धरती पर नहीं आएगा। जो चीज शरीयत और हदीस में नहीं है वह मुसलमानों के लिए बतौर इस्लामिक व्यवस्था स्वीकार नहीं हो सकता। ईसाइयत में भी यह बात है। उनके भी तयशुदा मौलिक ग्रंथ हैं जिससे बाहर कोई भी मनमानी स्थापना उक्त धर्म में स्वीकार नहीं की जाती। यहां तक कि बौद्ध धर्म में भी मौलिक किताबें हैं जिनमें तय किया गया है कि इस धर्म की वे बुनियादी बातें कौन सी हैं जिनसे इतर कुछ स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसी कारण बाबा साहब डा. अंबेडकर ने हिंदुओं को लेकर लिखा था कि उन्हें भी अपनी बुनियादी संहिताएं तय करनी चाहिए ताकि इस धर्म में अराजकता की स्थिति समाप्त हो सके। यह दूसरी बात है कि अपने स्वार्थों की वजह से हिंदु धर्म के मठाधीशों ने इसे स्वीकार नहीं किया।

धर्म के क्षेत्र में गफलत तब शुरू हुई जब संत स्वामी बनने लगे। साधारण मनुुष्य में पांच मुख्य विकार होते हैं काम, क्रोध, लोभ, मोह और मद। जब कोई व्यक्ति आध्यात्मिक रुझान के कारण इन विकारों से परे होने की साधना करता है और यह साधना सिद्ध कर ले जाता है तब वह संत की कोटि में पहुंचता है लेकिन स्वामी में मद का भाव है। स्वामी यानी ऐसा व्यक्ति जो अपने अनुयायियों को अपने अधीन समझता हो। यह बात तो अध्यात्म के बुनियादी सिद्धांत के खिलाफ है। इसी तरह जगद्गुरु जैसे विशेषण भी धार्मिक क्षेत्र में भ्रम पैदा करते हैं। अंचल की, प्रदेश की, राष्ट्र की और सारी दुनिया की परिधियां तो सत्ताधारियों के लिए होती हैं। जैसे-जैसे उनका साम्राज्य बढ़ता जाता है वैसे-वैसे दर्प बढऩे के सूचक के रूप में उनकी डिग्री भी जमींदार से राजा, राजा से महाराजा और फिर महाराज से चक्रवर्ती सम्राट तक पहुंचती है। संत तो सत्ता की हर अनुभूति से परे होता है। उसके लिए जिला गुरु, प्रदेश गुरु, राष्ट्र गुरु और जगद्गुरु जैसे विशेषण गढऩे की जरूरत क्या है।
बहरहाल आदिगुरु शंकराचार्य ने चार पीठों की स्थापना करके शंकराचार्य बनाने की परंपरा इसलिए शुरू की थी कि यह सनातन धर्म के सुप्रीम कोर्ट हों और धार्मिक व्यवस्थाओं का नियमन शास्त्रों के हिसाब से करें लेकिन विश्व हिंदू परिषद ने जब राम जन्मभूमि आंदोलन के बहाने पूरे हिंदू समाज की ठेकेदारी और इजारेदारी का पट्टा अपने नाम शुरू कराने की मुहिम छेड़ी तो शंकराचार्यों ने अपनी हस्ती भुलाकर अपने को विहिप के सुपुर्द कर दिया। शंकराचार्य वही हो सकता है जो जन्म से ब्रह्म्ïाचारी हो लेकिन विश्व हिंदू परिषद के आंदोलन में उस व्यक्ति को भी शंकराचार्य की मान्यता दे दी गई जिसने बाकायदा लंबा गृहस्थ जीवन जिया। चार संतानें पैदा कीं। इसके बाद जब सेना के वायरलैस अनुभाग की नौकरी से रिटायर होकर आया तो उसने अपने को शंकराचार्य घोषित कर दिया।

महामंडलेश्वर के नाम पर ऐसे लोग जो कि संदिग्ध आश्रम चलाते थे जिनमें बाद में वे मासूम औरतों के साथ बलात्कार के मामलों में आरोपित हुए उन्हें विश्व हिंदू परिषद ने शंकराचार्य के साथ बिठा दिया और शंकराचार्यों ने कोई आपत्ति नहीं की। राजनीतिक दलों की तरह अपने संगठन की भर्ती भी किसी से भी बढ़ाने की व्यग्रता में शंकराचार्यों ने अनुशासन की लगाम छोड़ दी। साध्वी जैनियों में होती थीं लेकिन सनातन धर्म में कोई साध्वी बन सकती है यह विचार का विषय है। सन्यासी जिसका स्त्री स्वरूप साध्वी होता है के लिए मनु स्मृति में जो आचार संहिता तय है क्या वर्तमान में साध्वी के रूप जिन्हें मान्यता दी गई है वे उसमें खरी बैठती हैं। एक साध्वी को अध्यात्म का प्रोटोकाल भी चाहिए और वह मंत्री व मुख्यमंत्री बनने के लिए सांसारिक दांवपेंच में उलझे रहने का रास्ता भी नहीं छोडऩा चाहती। क्या यह अध्यात्म के नाम पर जबरदस्त फरेब नहीं है। विश्व हिंदू परिषद के अस्तित्व में आने के बाद स्वयंभू भगवानों की तो हिंदू धर्म में बाढ़ सी आ गई है। उत्तर प्रदेश में परिवहन विभाग में एक कर्मचारी था जिसने अपने को भगवान घोषित कर लिया था और बड़े-बड़े उसी के विभाग के अधिकारी उसके आगे नतमस्तक होते रहते थे। कितने ही लोग हैं जो हत्या, बलात्कार जैसे जुर्म में फरार होकर कानून की आंखों में धूल झोंकने के लिए साधु बन गए और बाद में उन्होंने अपने को भगवान तक घोषित कर लिया। आशाराम और रामपाल तो चंद चेहरे हैं जो कानून की पकड़ में आ सके हैं लेकिन आज तो हर ग्लैमर वाले संत के पास इतना वैभव है कि यह माना ही नहीं जा सकता कि उसके पास काला धन नहीं होगा। काला धन के सबसे बड़े स्वामी तथाकथित संत हैं। आज महंगी गाडिय़ों के सबसे बड़े उपभोक्ता यही स्वयंभू संत और भगवान हैं। अध्यात्म और साधु संतई जीवन जीने का एक अलग तरह का तरीका है। सारे वैभव और सारे ऐशोआराम को त्यागने के बाद ही कोई साधु और संत कहला सकता है। इस कारण अगर हमने ऐश्वर्य के भूखे साधारण लोगों से भी ज्यादा पतित लोगों को भगवान ही नहीं संत और प्रवचन कर्ता की मान्यता देना जारी रखा तो इस देश का अनर्थ कोई नहीं रोक सकता। वजह यह है कि भौतिकतावाद के इस युग में नैतिक पुनरुत्थान के लिए अध्यात्म ही एक ऐसा क्षेत्र बचा है जिससे बदलाव की आशा की जा सकती है लेकिन अगर इस क्षेत्र को मारीचों ने हाईजैक कर लिया तब तो भगवान ही मालिक है।