srinivasan

ऐसा लग रहा था कि क्रिकेट के बेताज बादशाह के रूप में काम कर रही बीसीसीआई पर एकछत्र राज कर रहे श्रीनिवासन का साम्राज्य खत्म होने वाला है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर बोर्ड के नवम्बर में होने वाले चुनाव चार सप्ताह के लिए टाल दिए गए थे। सभी की नजर अदालत की ओर लगी हुई थी। आईपीएल स्पाट फिक्सिंग और सट्टेबाजी से जुड़े मामले की जांच करने वाली मुद्गल समिति की रिपोर्ट में श्रीनिवासन को सट्टेबाजी और स्पाट फिक्सिंग के लिए दोषी नहीं माना गया। श्रीनिवासन को इससे बड़ी राहत मिली लेकिन जांच समिति ने उन्हें एक खिलाड़ी के बारे में जानते हुए भी कोई कार्रवाई न करने का दोषी जरूर माना है। श्रीनिवासन को क्लीनचिट देने के बावजूद यह रिपोर्ट बहुत बड़े सवाल छोड़ गई है।
सबसे बड़ी बात तो यह है कि बीसीसीआई के सबसे बड़े टूर्नामैंट में जब सट्टेबाजी का बड़ा खेल चल रहा हो तो कोई इससे अनभिज्ञ कैसे रह सकता है। उनके दामाद गुरुनाथ मय्यपन ससुर जी की अपनी टीम चेन्नई सुपर किंग्स के अधिकारी थे और वह, राजस्थान टीम के मालिक राज कुन्द्रा कथित रूप से सट्टेबाजों के सम्पर्क में थे। इसकी जानकारी आईपीएल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सुन्दर रमन को थी लेकिन इसके बावजूद उन्होंने कोई एक्शन नहीं लिया। अगर श्रीनिवासन और 3 अन्य अधिकारियों को पता था कि एक खिलाड़ी नियम तोड़ रहा है तो फिर वह चुप क्यों बैठे रहे। आईपीएल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सुन्दर रमन कोई खिलाड़ी नहीं हैं बल्कि वह तो श्रीनिवासन के करीबी आदमी हैं तो फिर उन्हें कैसे क्लीन चिट दी जा सकती है।

खैर, कुछ भी हो श्रीनिवासन के लिए अब पुन: बीसीसीआई अध्यक्ष बनने का रास्ता साफ हो गया है। इसी वर्ष मार्च में सुप्रीम कोर्ट ने श्रीनिवासन को हटा कर उनकी जगह सुनील गावस्कर को अंतरिम अध्यक्ष बनाने का आदेश दिया था। श्रीनिवासन को क्लीनचिट की खबर फ्लैश होते ही बोर्ड में उनके समर्थकों ने इस बात का ढिंढोरा पीटना शुरू कर दिया कि वे तो पहले ही कहते थे कि श्रीनिवासन निर्दोष हैं। मुद्गल समिति की जांच रिपोर्ट को शरद पवार खेमा किस तरह लेता है, यह गौरतलब होगा क्योंकि पवार भी बोर्ड में अपनी जड़ें जमाने के इच्छुक हैं। श्रीनिवासन को जिस तरह से समर्थन मिल रहा है, लगता नहीं कि कोई उनके विरोध में खड़ा हो पाएगा।

अब सवाल बचा है नैतिकता का। क्या दामाद के दोषी पाए जाने के बाद उनका पुन: अध्यक्ष बनना नैतिक रूप से सही होगा? आज के दौर में नैतिकता-अनैतिकता को कौन मानता है। भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड विश्व की सबसे धनी संस्था है लेकिन इस सारे प्रकरण से बोर्ड की छवि काफी खराब हुई है। अभी तो कुछ खिलाडिय़ों के नाम बाहर आने बाकी हैं। तमाम कोशिशों के बावजूद मैच फिक्सिंग और स्पाट फिक्सिंग के दानव को पिंजरे में कैद नहीं किया जा सका है। इससे कई नामी-गिरामी खिलाडिय़ों का करियर प्रभावित हुआ है। इसके बावजूद क्रिकेट का खेल माफिया की चंगुल में फंसा हुआ है। सट्टेबाजी के तार दाऊद इब्राहिम जैसे माफिया सरगनाओं और डी कम्पनी के नेटवर्क तक जुड़े हुए हैं। खिलाड़ी, अधिकारी, अभिनेता ‘शार्ट कट’ से अपार धन कमाने के चक्कर में इसमें फंस जाते हैं। नैटवर्क इतना बड़ा है कि किसके तार किससे जुड़े हुए हैं, कुछ पता ही नहीं चलता। मुम्बई, दिल्ली जैसे महानगरों में ही नहीं छोटे-बड़े शहरों के सट्टेबाजों के मोबाइल नम्बर पर कनैक्शन दिए जाते हैं। फिर यह कनैक्शन मोहल्लों में बैठे सट्टेबाजों तक पहुंचाए जाते हैं। यह सब नेटवर्क फ्रैंचाइजी की तरह काम करता है। इस मोबाइल कनैक्शन को सट्टेबाजों की भाषा में डब्बा कहते हैं। डब्बा पूरे मैच के दौरान बोलता है, जिसके आधार पर बड़ा खेल खेला जाता है। क्रिकेट को सटोरियों का खेल बनाने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी ही चाहिए। आईसीसी और भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड को इस सवाल का जवाब तलाशना होगा कि वह फुटबाल की सर्वोच्च संस्था फीफा की तरह क्रिकेट की निगरानी और नियमन क्यों नहीं कर पा रही है? खेल में जैसे-जैसे पैसा आता जा रहा है, भ्रष्टाचार की जड़ें गहराती जा रही हैं।