Pandit-Jawaharlal-Nehru

प्रस्तुति – सिकंदर हयात

( यह लेख नेहरू जन्म शताब्दी पर 1989 में भारत के आज़ादी के बाद के पांच बेहतरीन संपादको में से एक माने जाने वाले सवर्गीय राजेंदर माथुर जी ( 1935 -1991 ) ने लिखा था उनकी पुस्तक ” भारत एक अंतहीन यात्रा से ”. साभार )

जवाहरलाल नेहरू को आज सौ साल हो गए , लेकिन उनके जन्म की शतवार्षिकी उस सहज़ता से नहीं मनाई जा सकती जैसे महत्मा गांधी या विवेकानंद या लोकमान्यतिलक की शताब्दियाँ हमने मनाई . कारण स्पष्ट हे राजीवगांधी का परधानमंत्री होना नेहरू की सव्छ्न्द सराहना और ईमानदार मूल्यांकन में बाधा डालता हे ………………… इस बाधा के बावजूद यदि हम नेहरू शताब्दी पुरे साल नहीं मानते हे तो यह एक जाहिल एहसानफ़रामोशी होती , क्योकि बीसवी सदी में गांधी के बाद यदि किसी एक हिंदुस्तानी का इस देश की याददाश्त पर सबसे ज़्यादा हक़ और क़र्ज़ हे तो वह नेहरू ही हे नेहरू यदि आज़ादी के आंदोलन के दिनों में गांधी के सिपाही नहीं होते तो हमारे सवतंत्रता आंदोलन का नक्शा अलग होता . और यदि आज़ादी के बाद के सत्रह वर्षो में वह आज़ाद भारत के प्रधानमंत्री नहीं होते तो , भारत का सामाजिक और राजनितिक भूगोल वह नहीं होता जो आज हे . तब इस देश की राज़नीति के नदी पहाड़ और जंगल सब अलग हो जाते , और हम मानो एक अलग गृह पर साँस ले रहे होते . लाखो लोगो के मन में आज भी एक गहरी शिकायत हे की इस नेहरू निर्मित भारत के पर्यावरण में साँस लेने के लिए परमपिता परमात्मा ने हमें क्यों जन्म दिया हे . काश इस देश का पर्यावरण कुछ और होता . लेकिन यह शिकायत भी नेहरू की विश्वकर्मा – भूमिका को एक गहरी श्रद्धांजलि ही हे , क्योकि अंततः यह उस भारत की कोख में लोट जाने की कामना हे जिसे किसे ने देखा नहीं हे , लेकिन जिसके बारे में कोई भी व्यक्ति कुछ भी कल्पना कर सकता हे .

” बगावती शिष्यतंत्र ” – नेहरु जैसा सिपाही यदि गांधी को आज़ादी के आंदोलन में नहीं मिलता , तो 1927 28 के बाद भारत के नौजवानो को अपनी नाराज़ और बगावती अदा के बल पर गांधी के सत्याग्रही खेमे में खींच खींच कर लाने वाला कौन था ? नेहरू ने उन सारे नौजवानो को अपने साथ लिया जो गांधी के तौर तरीको से नाराज़ थे , और बार बार उन्होंने लिख कर , बोल कर , अपनी असहमति का इज़हार किया . उन्होंने तीस की उस पीढ़ी को जबान दी जो बोल्शेविक क्रांति से प्रभावित होकर कांग्रेस के बेजुबान लोगो को लड़ाकू हथियार बनाना चाहती थी . लेकिन यह सारा काम उन्होंने कांग्रेस की केमिस्ट्री के दायरे में किया और उसका सम्मान करते हुए किया . यदि वे 1932 -33 में सनकी लोहियावादियो की तरह बर्ताव करते , और अपनी अलग समजवादी पार्टी बनाकर गांधी से नाता तोड़ लेते , तो सुभाष चन्द्र बोस की तरह कट कर रह जाते . उससे समाजवाद का तो कोई भला होता नहीं , हां गांधी की फ़ौज़ जरूर कमजोर हो जाती . गांधी से असहमत होते हुए भी नेहरू ने गांधी के सामने आत्मसमर्पण किया , क्योकि अपने को समझ न आने वाले जादू के सामने अपने बिछा देने वाला भारतीय भक्तिभाव नेहरू में शेष था , और अपने अक्सर बिगड़ पड़ने वाले पट्ट शिष्य को लाड करना गांधी को आता था . बकरी का दूध पिने वाला कोई सेवाग्राम जूनियर गांधी तीस के दशक में ना तो युवक ह्रदय सम्राट का पद अर्जित कर सकता था , और ना महात्मा मोहनदास उसे अपना उत्तराधिकारी घोषित कर सकते थे क्योकि आँख पर पट्टी बाँध कर लीक पर चलने वाले शिष्यों की सीमा महात्मा जी खूब समझते थे . नेहरू और गांधी के इस दवंदात्मकसहयोग ने आज़ादी के आंदोलन के ताने बाने को एक अधभुत सत्ता दी और गांधी का जादू नेहरू के तिलस्म से जुड़ कर ना जाने कौन सा बर्ह्मास्त्र् बन गया . खरा और सौ टंच सत्य जब दूसरे सौ टंच सत्य के साथ के साथ अपना अहं त्यागकर मिलता और घुलता हे तब ही ऐसे योगिक बनते हे , जैसे गांधी और नेहरू के सहयोग से बने . इसकी तुलना आज के राजनितिक जोड़तोड़ से कीजिये तो आपको फर्क समझ में आ जाएगा ………. .

”गांधी का भारत ” 1947 के बाद नेहरू भारत को उस रस्ते पर नहीं ले गए , जिस रस्ते गांधी की सौ साला जिंदगी में शायद वह जाता वे ऐसा कर भी नहीं सकते थे क्योकि गांधी की अनुपस्तिति में गांधी का रास्ता किसी को मालूम नहीं था खुद गांधी के जीते जी किसी को पता नहीं होता था की गांधी का अगला कदम क्या होगा . अपनी अंतरात्मा के टोर्च से वे अँधेरे में अपना अगला कदम टटोलते थे यह तोच नितांत निजी और वैयक्तिक होता था ………………………. नेहरू गांधी की राह पर चले हो या नहीं हो , लेकिन यह मानना मूर्खतापूर्ण होगा की कांग्रेस यदि नेहरू के बजाय पटेल या राजेन्द्र परसाद या आचार्य कृपलानी के रस्ते पर चलती , तो वह सच्चा गाँधीवादी रास्ता होता . इसका मतलब यह हुआ की सारी कांग्रेस गाँधीवादी थी और केवल नेहरू गांधी विमुख थे इस विकृत स्थापना में कोई दम नहीं हे. .

”बागडोर और भूगोल ” आज़ादी के बाद के वर्षो में यदि बागडोर नेहरू के हाथ में नहीं होती , तो इस देश का राजनीतिक – सामाजिक भूगोल , उसकी नदी जंगल और पहाड़ किस माने में भिन्न होते ? सबसे पहले तो इस बात का श्रय नेहरू को दे की उन्होंने अपने चरित्र और विचारो के विपरीत कांग्रेस को बनाय रखा . पहले वे अक्सर लिखा करते थे की आज़ादी की लड़ाई सफल होने के बाद कांग्रेस जैसे सर्वदलीय सयुंक्त मोर्चे की कोई जरुरत नहीं रह जायेगी वह टूटेगी और अलग अलग विचारधारा वाली पार्टियो में बट जायेगी जबतक अंग्रेज़ो से लड़ाई चल रही थी तब तक बिड़ला बज़ाज़ और मिल मज़दूर जमींदार किसान इकट्ठे होकर कांग्रेस में रह सकते हे लेकिन उसके बाद इतने बेमेल निहित स्वार्थो की प्रति सरकार कैसे चलाएगी वह उत्तर जायेगी या दक्षिण वह अमीरो का साथ देगी या अमीरो का ? गांधी के दिमाग में भी यह प्रशन उठा था , लेकिन वे शायद एक सत्ता कांग्रेस के मुकाबले एक रचनातमक सेवामुखी कांग्रेस कायम करने की बात सोच रहे थे ……………… कांग्रेस को कायम रख कर नेहरू ने विलक्षण समझ का परिचय दिया , यह इसी से स्पष्ट हे की आज़ादी के 42 वर्ष बाद भी इस देश में पश्चमी तर्ज़ की पार्टिया नहीं बन पायी हे …………. इस माने में नेहरू ने सवतंत्रता के बाद कांग्रेस की सार्थकता का पुनराविष्कार किया उन्होंने पाया की कांग्रेस से टूटी कोई एकांगी पार्टी देश को जोड़े रखने और आगे ले जाने का काम नहीं कर सकेगी नेहरू की इस स्थापना पर देश ने एक मुहर नेहरू की मौत के बाद 1971 में लगाई जब मरणासन्न कांग्रेस को उसने फिर से जिलाकर खड़ा कर दिया . इससे लगता हे की गांधी यदि कांग्रेस को खत्म कर देते तो भारत की जनता उसे किसी न किसी शक्ल में पुनर्जीवित कर देती . ………………………………………

नेहरू के बिना क्या भारत वैसा लोकतान्त्रिक देश बन पता जैसा की वह आज हे ? आपको 1947 में किस नेता में लोकतंत्र की बुनियादी आज़ादियो के प्रति वह सम्मान नज़र आता हे , जो नेहरू में था ? हरिजन से रक्त में एकता महसूस करने वाले नेता कितने थे ? धर्म के ढकोसलों से नफरत और सच्ची रूहानियत के प्रति लगाव कितनो में था ? विज्ञान के प्रति इतना भोला उत्साह आप उस ज़माने में और कहा पाते हे ? भारत के आर्थिक विकास के बारे में क्या किसी और नेता के पास दर्ष्टि थी ? भारत की सारी विविधताओं को इतना स्नेह क्या किसी और नेता ने दिया ? नेहरू नहीं होते तो विभाजन के तुरंत बाद क्या भारत हिन्दू राष्ट्र बनने से बच पाता .

”गांधी की जगह गणदेवता ” भारत 15 अगस्त के बाद लोकतान्त्रिक ही होगा ये इस देश की जन्मपत्री में तो नहीं लिखा था .अनुमान लगाना व्यर्थ हे , लेकिन सोचिये की यदि सरदार पटेल को सावधीनता के बाद सतरह वर्षो तक नेहरू की लोकप्रियता और उनका पद मिला होता तो क्या वे माओतसे तुंग या स्टालिन के भारतीय संस्करण नहीं हो जाते ? सुकर्णो नासिर टिटो अंकुर्मा आदि ने अपनी लोकप्रियता का क्या किया ? देश के धीमेपन से असंतुष्ट होकर जवाहरलाल के सामने क्या यह विकल्प नहीं रहा होगा की लोकतंत्र को एक तरफ रख कर कुछ साल चाबुक चलाया जाए , ताकि देश तेज़ दौड़कर एक बार सबके साथ आ सके ? यदि वे चाबुक चलते तो क्या एक नशीला उत्साह सारते देश में पैदा नहीं होता जिसके रहते लोकतंत्र की हिमायत एक जनद्रोही हरकत नज़र आती ? लेकिन जैसे गांधी के सामने नेहरू ने अहंविहीन आत्मसमर्पण कर दिया था . उसी तरह भारत के लोकतंत्र के सामने उन्होंने हमेशा अहंविहीन आत्मसमर्पण किया . गांधी की जगह गणदेवता ने ले ली . कहा नहीं जा सकता की नेहरू नहीं होते तो भी ऐसा ही होता . और यदि भारत में लोकतंत्र नहीं होता , तो क्या हम अपने आपको एक बिलकुल अलग देश में नहीं पाते यह कहा जा सकता हे की लोकतंत्र के आलावा कोई और प्रणाली होती तो वह भारत जैसे बेमेल देश को एक नहीं रख पाती . तानाशाही का प्रेशर कुकर होता , तो देश जल्दी टूट जाता लेकिन यह दर्ष्टि तो1970 या 80 की हे 47 में तो यह माना जा सकता था की लोकतंत्र में इतना हंगामा हे , खींचतान हे , दंगे फसाद हे , अराजकता हे की भारत जैसे भानुमति के कुनबे में यह खुराफाती चीज़ अगर छोड़ दी गई तो न टूटने वाला देश भी टूट जाएगा . आखिर इसी बुते पर तो चर्चिल आदि कहा करते थे की अंग्रेज़ो के जाने के बाद भारत वासी स्वराज चला नहीं पाएंगे . स्वराज के बारे हम भारतीयों का हीनभाव ही तानाशाही को जन्म दे सकता था उस नियति से हम बच सके इसका सारा श्रेय नेहरू को हे.

”आर्थिक दृष्टि ” …………………… सिर्फ नेहरू में देश के पिछड़ेपन का अहसास था और एक दर्ष्टि और छटपटाहट थी . गांधी की तरह एक सेवामुखी कांग्रेस तो उन्होंने नहीं बनाई , और न कम्युनिस्ट देशो की तरह एक समर्पित काडर तैयार किया , लेकिन अपनी लोकतान्त्रिक सरकार की सारी शक्ति उन्होंने विकास के एक माडल पर अमल करने को झोंक दी बड़े बाँध , सिचाई योजनाय अधिक अन्न उपजाओ , वन महोत्सव सामुदायिक विकास , राष्ट्रिय विस्तार कार्यकर्म पंचवर्षीय योजना , भरी उद्दोग , लोहे और बिज़ली और खाद के कारखाने , नए स्कूल और अफसर , लाखो नई सरकारी नौकरियां , समाजवादी समाज रचना . यह सारा सिलसिला नेहरू की अदम्य ऊर्जा से शुरू हुआ था नेहरू की समाजवादी दर्ष्टि का यहाँ भारत के मध्यम वर्ग की आकांक्षाओं के साथ गज़ब का मेल हुआ ……………………………… चीन और रूस के उदाहरणों से स्पष्ट हे की करोड़ो लोगो को जेल में ठुसे बगैर , जान से मारे बगैर या उन्हें सजा काटने को अरुणचल भेजे बगैर जो आतंकविहीन आर्थिक सरप्लस भारत ने पैदा किया हे और इस सरप्लस के निवेश से जो प्रगति की हे , यह आश्चार्यजनक रही . इतनी सीधी उंगली से इतना ज़्यादा गहि निकलने का काम किसी और देश ने किया हो तो कर्प्या नाम बताय . नेहरू नहीं होते तो हम जापानी टूथपेस्ट खरीद रहे होते या हमारे वकीलों प्रोफेसरों को कोई हुकूमत धान के खेतो में अनुभव प्राप्त करने के लिए भेज देती . नेहरू के बिना हमारी रोजमर्रा की जिंदगी यहाँ भी अलग होती . ”नया इंसान ” और अंत में धर्मनिरपेक्षता जब नेहरू इसकी चर्चा करते थे तब दरअसल वे एक नया इंसान भारत की जमीं पर जन्मते देखना चाहते थे . वे ही क्यों गांधी की भी सारी कोशिश भारत में एक नए मनुष्य को जन्म देने की थी . राममोहनराय से लेकर राममनोहर लोहिया तक हर महत्वाकांक्षी हिंदुस्तानी ने एक नए मनुष्य का सपना देखा हे , और डेढ़ सौ पुरानी यह आदत पिछले बीस पचीस वर्षो में ही विलुप्त हुई हे नेहरू का नया मनुष्य रवीन्द्रनाथ ठाकुर की प्रसिद्ध कविता का मनुष्य हे लेकिन जो युगपुरुष एक नई मनुष्यता का स्वप्न पालता हे उसे समझ ही नहीं आता की आदमी संकीर्ण क्यों हे , क्षुद्र क्यों हे अंधविश्वासी क्यों हे नकली कसौटियों पर अपने आपको बाटने वाला और लड़ने वाला क्यों हे , नफरत से अँधा होने वाला क्यों हे ? हर मसीहा की हर कोशिश के बावजूद नया मनुष्य बार बार पुराना होना क्यों पसंद करता हे ? यह एक लम्बा विषय हे और हम नहीं जानते की गांधी नेहरू के होने का कोई असर हम पर पड़ा हे या नहीं , और हम नए इंसान बने हे या नहीं .लेकिन हम जैसे हे उससे बहुत बुरे अगर नहीं हे , तो इसका श्रेय शायद उन्ही के प्रयासों को देना होगा