सिकंदर हयात

नेहरू के बिना हम अज़नबी देश में होते !

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Pandit-Jawaharlal-Nehru

प्रस्तुति – सिकंदर हयात

( यह लेख नेहरू जन्म शताब्दी पर 1989 में भारत के आज़ादी के बाद के पांच बेहतरीन संपादको में से एक माने जाने वाले सवर्गीय राजेंदर माथुर जी ( 1935 -1991 ) ने लिखा था उनकी पुस्तक ” भारत एक अंतहीन यात्रा से ”. साभार )

जवाहरलाल नेहरू को आज सौ साल हो गए , लेकिन उनके जन्म की शतवार्षिकी उस सहज़ता से नहीं मनाई जा सकती जैसे महत्मा गांधी या विवेकानंद या लोकमान्यतिलक की शताब्दियाँ हमने मनाई . कारण स्पष्ट हे राजीवगांधी का परधानमंत्री होना नेहरू की सव्छ्न्द सराहना और ईमानदार मूल्यांकन में बाधा डालता हे ………………… इस बाधा के बावजूद यदि हम नेहरू शताब्दी पुरे साल नहीं मानते हे तो यह एक जाहिल एहसानफ़रामोशी होती , क्योकि बीसवी सदी में गांधी के बाद यदि किसी एक हिंदुस्तानी का इस देश की याददाश्त पर सबसे ज़्यादा हक़ और क़र्ज़ हे तो वह नेहरू ही हे नेहरू यदि आज़ादी के आंदोलन के दिनों में गांधी के सिपाही नहीं होते तो हमारे सवतंत्रता आंदोलन का नक्शा अलग होता . और यदि आज़ादी के बाद के सत्रह वर्षो में वह आज़ाद भारत के प्रधानमंत्री नहीं होते तो , भारत का सामाजिक और राजनितिक भूगोल वह नहीं होता जो आज हे . तब इस देश की राज़नीति के नदी पहाड़ और जंगल सब अलग हो जाते , और हम मानो एक अलग गृह पर साँस ले रहे होते . लाखो लोगो के मन में आज भी एक गहरी शिकायत हे की इस नेहरू निर्मित भारत के पर्यावरण में साँस लेने के लिए परमपिता परमात्मा ने हमें क्यों जन्म दिया हे . काश इस देश का पर्यावरण कुछ और होता . लेकिन यह शिकायत भी नेहरू की विश्वकर्मा – भूमिका को एक गहरी श्रद्धांजलि ही हे , क्योकि अंततः यह उस भारत की कोख में लोट जाने की कामना हे जिसे किसे ने देखा नहीं हे , लेकिन जिसके बारे में कोई भी व्यक्ति कुछ भी कल्पना कर सकता हे .

” बगावती शिष्यतंत्र ” – नेहरु जैसा सिपाही यदि गांधी को आज़ादी के आंदोलन में नहीं मिलता , तो 1927 28 के बाद भारत के नौजवानो को अपनी नाराज़ और बगावती अदा के बल पर गांधी के सत्याग्रही खेमे में खींच खींच कर लाने वाला कौन था ? नेहरू ने उन सारे नौजवानो को अपने साथ लिया जो गांधी के तौर तरीको से नाराज़ थे , और बार बार उन्होंने लिख कर , बोल कर , अपनी असहमति का इज़हार किया . उन्होंने तीस की उस पीढ़ी को जबान दी जो बोल्शेविक क्रांति से प्रभावित होकर कांग्रेस के बेजुबान लोगो को लड़ाकू हथियार बनाना चाहती थी . लेकिन यह सारा काम उन्होंने कांग्रेस की केमिस्ट्री के दायरे में किया और उसका सम्मान करते हुए किया . यदि वे 1932 -33 में सनकी लोहियावादियो की तरह बर्ताव करते , और अपनी अलग समजवादी पार्टी बनाकर गांधी से नाता तोड़ लेते , तो सुभाष चन्द्र बोस की तरह कट कर रह जाते . उससे समाजवाद का तो कोई भला होता नहीं , हां गांधी की फ़ौज़ जरूर कमजोर हो जाती . गांधी से असहमत होते हुए भी नेहरू ने गांधी के सामने आत्मसमर्पण किया , क्योकि अपने को समझ न आने वाले जादू के सामने अपने बिछा देने वाला भारतीय भक्तिभाव नेहरू में शेष था , और अपने अक्सर बिगड़ पड़ने वाले पट्ट शिष्य को लाड करना गांधी को आता था . बकरी का दूध पिने वाला कोई सेवाग्राम जूनियर गांधी तीस के दशक में ना तो युवक ह्रदय सम्राट का पद अर्जित कर सकता था , और ना महात्मा मोहनदास उसे अपना उत्तराधिकारी घोषित कर सकते थे क्योकि आँख पर पट्टी बाँध कर लीक पर चलने वाले शिष्यों की सीमा महात्मा जी खूब समझते थे . नेहरू और गांधी के इस दवंदात्मकसहयोग ने आज़ादी के आंदोलन के ताने बाने को एक अधभुत सत्ता दी और गांधी का जादू नेहरू के तिलस्म से जुड़ कर ना जाने कौन सा बर्ह्मास्त्र् बन गया . खरा और सौ टंच सत्य जब दूसरे सौ टंच सत्य के साथ के साथ अपना अहं त्यागकर मिलता और घुलता हे तब ही ऐसे योगिक बनते हे , जैसे गांधी और नेहरू के सहयोग से बने . इसकी तुलना आज के राजनितिक जोड़तोड़ से कीजिये तो आपको फर्क समझ में आ जाएगा ………. .

”गांधी का भारत ” 1947 के बाद नेहरू भारत को उस रस्ते पर नहीं ले गए , जिस रस्ते गांधी की सौ साला जिंदगी में शायद वह जाता वे ऐसा कर भी नहीं सकते थे क्योकि गांधी की अनुपस्तिति में गांधी का रास्ता किसी को मालूम नहीं था खुद गांधी के जीते जी किसी को पता नहीं होता था की गांधी का अगला कदम क्या होगा . अपनी अंतरात्मा के टोर्च से वे अँधेरे में अपना अगला कदम टटोलते थे यह तोच नितांत निजी और वैयक्तिक होता था ………………………. नेहरू गांधी की राह पर चले हो या नहीं हो , लेकिन यह मानना मूर्खतापूर्ण होगा की कांग्रेस यदि नेहरू के बजाय पटेल या राजेन्द्र परसाद या आचार्य कृपलानी के रस्ते पर चलती , तो वह सच्चा गाँधीवादी रास्ता होता . इसका मतलब यह हुआ की सारी कांग्रेस गाँधीवादी थी और केवल नेहरू गांधी विमुख थे इस विकृत स्थापना में कोई दम नहीं हे. .

”बागडोर और भूगोल ” आज़ादी के बाद के वर्षो में यदि बागडोर नेहरू के हाथ में नहीं होती , तो इस देश का राजनीतिक – सामाजिक भूगोल , उसकी नदी जंगल और पहाड़ किस माने में भिन्न होते ? सबसे पहले तो इस बात का श्रय नेहरू को दे की उन्होंने अपने चरित्र और विचारो के विपरीत कांग्रेस को बनाय रखा . पहले वे अक्सर लिखा करते थे की आज़ादी की लड़ाई सफल होने के बाद कांग्रेस जैसे सर्वदलीय सयुंक्त मोर्चे की कोई जरुरत नहीं रह जायेगी वह टूटेगी और अलग अलग विचारधारा वाली पार्टियो में बट जायेगी जबतक अंग्रेज़ो से लड़ाई चल रही थी तब तक बिड़ला बज़ाज़ और मिल मज़दूर जमींदार किसान इकट्ठे होकर कांग्रेस में रह सकते हे लेकिन उसके बाद इतने बेमेल निहित स्वार्थो की प्रति सरकार कैसे चलाएगी वह उत्तर जायेगी या दक्षिण वह अमीरो का साथ देगी या अमीरो का ? गांधी के दिमाग में भी यह प्रशन उठा था , लेकिन वे शायद एक सत्ता कांग्रेस के मुकाबले एक रचनातमक सेवामुखी कांग्रेस कायम करने की बात सोच रहे थे ……………… कांग्रेस को कायम रख कर नेहरू ने विलक्षण समझ का परिचय दिया , यह इसी से स्पष्ट हे की आज़ादी के 42 वर्ष बाद भी इस देश में पश्चमी तर्ज़ की पार्टिया नहीं बन पायी हे …………. इस माने में नेहरू ने सवतंत्रता के बाद कांग्रेस की सार्थकता का पुनराविष्कार किया उन्होंने पाया की कांग्रेस से टूटी कोई एकांगी पार्टी देश को जोड़े रखने और आगे ले जाने का काम नहीं कर सकेगी नेहरू की इस स्थापना पर देश ने एक मुहर नेहरू की मौत के बाद 1971 में लगाई जब मरणासन्न कांग्रेस को उसने फिर से जिलाकर खड़ा कर दिया . इससे लगता हे की गांधी यदि कांग्रेस को खत्म कर देते तो भारत की जनता उसे किसी न किसी शक्ल में पुनर्जीवित कर देती . ………………………………………

नेहरू के बिना क्या भारत वैसा लोकतान्त्रिक देश बन पता जैसा की वह आज हे ? आपको 1947 में किस नेता में लोकतंत्र की बुनियादी आज़ादियो के प्रति वह सम्मान नज़र आता हे , जो नेहरू में था ? हरिजन से रक्त में एकता महसूस करने वाले नेता कितने थे ? धर्म के ढकोसलों से नफरत और सच्ची रूहानियत के प्रति लगाव कितनो में था ? विज्ञान के प्रति इतना भोला उत्साह आप उस ज़माने में और कहा पाते हे ? भारत के आर्थिक विकास के बारे में क्या किसी और नेता के पास दर्ष्टि थी ? भारत की सारी विविधताओं को इतना स्नेह क्या किसी और नेता ने दिया ? नेहरू नहीं होते तो विभाजन के तुरंत बाद क्या भारत हिन्दू राष्ट्र बनने से बच पाता .

”गांधी की जगह गणदेवता ” भारत 15 अगस्त के बाद लोकतान्त्रिक ही होगा ये इस देश की जन्मपत्री में तो नहीं लिखा था .अनुमान लगाना व्यर्थ हे , लेकिन सोचिये की यदि सरदार पटेल को सावधीनता के बाद सतरह वर्षो तक नेहरू की लोकप्रियता और उनका पद मिला होता तो क्या वे माओतसे तुंग या स्टालिन के भारतीय संस्करण नहीं हो जाते ? सुकर्णो नासिर टिटो अंकुर्मा आदि ने अपनी लोकप्रियता का क्या किया ? देश के धीमेपन से असंतुष्ट होकर जवाहरलाल के सामने क्या यह विकल्प नहीं रहा होगा की लोकतंत्र को एक तरफ रख कर कुछ साल चाबुक चलाया जाए , ताकि देश तेज़ दौड़कर एक बार सबके साथ आ सके ? यदि वे चाबुक चलते तो क्या एक नशीला उत्साह सारते देश में पैदा नहीं होता जिसके रहते लोकतंत्र की हिमायत एक जनद्रोही हरकत नज़र आती ? लेकिन जैसे गांधी के सामने नेहरू ने अहंविहीन आत्मसमर्पण कर दिया था . उसी तरह भारत के लोकतंत्र के सामने उन्होंने हमेशा अहंविहीन आत्मसमर्पण किया . गांधी की जगह गणदेवता ने ले ली . कहा नहीं जा सकता की नेहरू नहीं होते तो भी ऐसा ही होता . और यदि भारत में लोकतंत्र नहीं होता , तो क्या हम अपने आपको एक बिलकुल अलग देश में नहीं पाते यह कहा जा सकता हे की लोकतंत्र के आलावा कोई और प्रणाली होती तो वह भारत जैसे बेमेल देश को एक नहीं रख पाती . तानाशाही का प्रेशर कुकर होता , तो देश जल्दी टूट जाता लेकिन यह दर्ष्टि तो1970 या 80 की हे 47 में तो यह माना जा सकता था की लोकतंत्र में इतना हंगामा हे , खींचतान हे , दंगे फसाद हे , अराजकता हे की भारत जैसे भानुमति के कुनबे में यह खुराफाती चीज़ अगर छोड़ दी गई तो न टूटने वाला देश भी टूट जाएगा . आखिर इसी बुते पर तो चर्चिल आदि कहा करते थे की अंग्रेज़ो के जाने के बाद भारत वासी स्वराज चला नहीं पाएंगे . स्वराज के बारे हम भारतीयों का हीनभाव ही तानाशाही को जन्म दे सकता था उस नियति से हम बच सके इसका सारा श्रेय नेहरू को हे.

”आर्थिक दृष्टि ” …………………… सिर्फ नेहरू में देश के पिछड़ेपन का अहसास था और एक दर्ष्टि और छटपटाहट थी . गांधी की तरह एक सेवामुखी कांग्रेस तो उन्होंने नहीं बनाई , और न कम्युनिस्ट देशो की तरह एक समर्पित काडर तैयार किया , लेकिन अपनी लोकतान्त्रिक सरकार की सारी शक्ति उन्होंने विकास के एक माडल पर अमल करने को झोंक दी बड़े बाँध , सिचाई योजनाय अधिक अन्न उपजाओ , वन महोत्सव सामुदायिक विकास , राष्ट्रिय विस्तार कार्यकर्म पंचवर्षीय योजना , भरी उद्दोग , लोहे और बिज़ली और खाद के कारखाने , नए स्कूल और अफसर , लाखो नई सरकारी नौकरियां , समाजवादी समाज रचना . यह सारा सिलसिला नेहरू की अदम्य ऊर्जा से शुरू हुआ था नेहरू की समाजवादी दर्ष्टि का यहाँ भारत के मध्यम वर्ग की आकांक्षाओं के साथ गज़ब का मेल हुआ ……………………………… चीन और रूस के उदाहरणों से स्पष्ट हे की करोड़ो लोगो को जेल में ठुसे बगैर , जान से मारे बगैर या उन्हें सजा काटने को अरुणचल भेजे बगैर जो आतंकविहीन आर्थिक सरप्लस भारत ने पैदा किया हे और इस सरप्लस के निवेश से जो प्रगति की हे , यह आश्चार्यजनक रही . इतनी सीधी उंगली से इतना ज़्यादा गहि निकलने का काम किसी और देश ने किया हो तो कर्प्या नाम बताय . नेहरू नहीं होते तो हम जापानी टूथपेस्ट खरीद रहे होते या हमारे वकीलों प्रोफेसरों को कोई हुकूमत धान के खेतो में अनुभव प्राप्त करने के लिए भेज देती . नेहरू के बिना हमारी रोजमर्रा की जिंदगी यहाँ भी अलग होती . ”नया इंसान ” और अंत में धर्मनिरपेक्षता जब नेहरू इसकी चर्चा करते थे तब दरअसल वे एक नया इंसान भारत की जमीं पर जन्मते देखना चाहते थे . वे ही क्यों गांधी की भी सारी कोशिश भारत में एक नए मनुष्य को जन्म देने की थी . राममोहनराय से लेकर राममनोहर लोहिया तक हर महत्वाकांक्षी हिंदुस्तानी ने एक नए मनुष्य का सपना देखा हे , और डेढ़ सौ पुरानी यह आदत पिछले बीस पचीस वर्षो में ही विलुप्त हुई हे नेहरू का नया मनुष्य रवीन्द्रनाथ ठाकुर की प्रसिद्ध कविता का मनुष्य हे लेकिन जो युगपुरुष एक नई मनुष्यता का स्वप्न पालता हे उसे समझ ही नहीं आता की आदमी संकीर्ण क्यों हे , क्षुद्र क्यों हे अंधविश्वासी क्यों हे नकली कसौटियों पर अपने आपको बाटने वाला और लड़ने वाला क्यों हे , नफरत से अँधा होने वाला क्यों हे ? हर मसीहा की हर कोशिश के बावजूद नया मनुष्य बार बार पुराना होना क्यों पसंद करता हे ? यह एक लम्बा विषय हे और हम नहीं जानते की गांधी नेहरू के होने का कोई असर हम पर पड़ा हे या नहीं , और हम नए इंसान बने हे या नहीं .लेकिन हम जैसे हे उससे बहुत बुरे अगर नहीं हे , तो इसका श्रेय शायद उन्ही के प्रयासों को देना होगा

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19 thoughts on “नेहरू के बिना हम अज़नबी देश में होते !

  1. सिकंदर हयात

    संघियो की घिनोनी बाते -के जी गांधी ने चिढ़ कर नेहरू को पी एम बनवा दिया था असल में 1946 पूंजीपतियों व्यापारियों इज़ारेदारो ने नेहरू की समाजवाद की टर्र टर्र से चिढ कर अचानक पटेल साहब का नाम कांग्रेस में बढ़वा दिया था वार्ना दुनिया जानती थी की कोई नेहरू के आस पास भी न था तीस के दशक से ही तय था की नेहरू ही आज़ाद भारत के पी एम वो कांग्रेस के सबसे ऊर्जावान लोकप्रिय विद्वान नेता थे पटेल साहब को तो भारत से बाहर कोई जानता तक ना था जबकि नेहरू दुनिया भर में खासकर वैश्विक बुद्धिजीवियों में पहचाने जाते थे मेरा ख्याल ये हे की 1937 – 46 के चुनावो में कोंग्रेसियो ने पैसा लेने के बाद सव्भाविक हे पैसे वालो की पसंद पटेल साहब को पी एम के लिए प्रस्तावित किया होगा यु ही उनका दिल रखने के लिए ये कोई भरषटाचार की बात ना थी ज़ाहिर हे पैसा तो चाहिए ही होता हे फिर ज़ाहिर हे जिनसे पैसा लिया जाता हे उनकी कुछ बात सुननी भी पड़ती ही हे कांग्रेस आज़ादी से पहले ये सब करती थी इसी से जुड़े कुछ मज़ेदार किस्से बेदाग़ और लोकप्रिय नेता महावीर त्यागी जी की पुस्तक ” आज़ादी का आंदोलन हँसते हुए आंसू ” में पढ़ लीजिये तो यही राज़ था 12 कांग्रेस कमेटियों के पटेल नाम प्रस्तावित करने का मगर फिर गांधी के सामने किसी की चु की मजाल नहीं हुई और देश का सर्वाधिक लोकप्रिय ऊर्जावान और सवस्थ ( सरदार साहब को तब तक ही २ दिल के दौरे पड़ चुके थे ) लोकतान्त्रिक सेकुलर उदारवादी समाजवादी विद्वान नेता पी एम के रूप में मिला जिसने दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंन्त्रिक सेकुलर देश रचा नेहरू ना होते तो भारत भी ना होता इसमें कोई शक ही नहीं हे

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  2. सिकंदर हयात

    Shailendra Kumar – सिकंदर हयात • 2 days ago
    आपने संघ की दृष्टि से न भारत को कभी देखा है न कभी पढ़ा है। केवल उसके विरोधियों की दृष्टि से ही उसके दर्शन को देखा है कुछ संघ के नजरिये से भारत को देखिये। किसी भी सत्य के कई पहलु होते है। यहाँ देखिये सिकंदर हयात Shailendra Kumar • a day ago
    में सभी पहलु पढता और सुनता हे वैसे तो और बाते हे मगर आप एक बात अच्छी तरह समझ लीजिये उपमहादीप में 90 करोड़ हिन्दू और 60 करोड़ मुस्लिम हे इनके बीच कही भी कोई भी कटटरपन्ति तत्व मज़बूत होंगे तो उसकी सव्भाविक नियति हे की वो दूसरे से जरूर भिड़ेंगे और तनाव फैलाएंगे ये बिलकुल नेचुरल हे ऐसा ही होगा आपको भाजपा को वोट देना हो तो दीजिये मगर संघ बज़रंग से दूर ही रहिये जैसा की आप ने खुद ही 2011 में मुझे बताया था की आप शायद एक मध्यमवर्गीय परिवार से आते हे जो आर्थिक संकट से घिरा हे जैसा की होता हे कटटरपन्तियो के हरावल दस्ते निम्न या मध्यमवर्गीय ही होते हे गरीब के पास तो समय नहीं होता और अमीर इन सबका इस्तेमाल ही करता हे हिन्दू मुस्लिम कटट्रपंथ को मध्यमवर्गीय लोग ही बढ़ावा देते हे और सोचते हे की वो महान देशभक्त या धर्मभक्त हे में आपको सलाह दूंगा की अपना काम धंधा कीजिये कुछ करना ही हे तो सेकुलरिज़म समाजवाद ( नया ) उदारवाद को मज़बूत करिये इन कटरपन्तियो के चक्कर में मत पड़िये कुछ हासिल ना होगा चाहे तो अगले चार साल में महसूस कर लीजिये की चाहे मोदी हो या कांग्रेस के राज़ में आपका जीवन तो जस का तस हे

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  3. सिकंदर हयात

    अफज़ल भाई नेहरू की महानता का एक किस्सा ए एम यु से भी जुड़ा हे जो एक महान शिक्षण संस्थान हे मगर इसमें कोई शक ही नहीं हे की पाकिस्तान और टू नेशन थ्योरी के निर्माण में इसका अहम रोल रहा था जो लीग 1937 में बुरी तरह चुनाव हारी थी उस लीग को 1946 के चुनाव में भारी सफलता मिली मुसलमानो के तो कहते हे की 93 % वोट लीग को मिले थे ये चमत्कार किसने किया था ? असल में भारतीय मुस्लिम समाज पर अलीगढ यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी पढ़े लिखे लोगो का भारी प्रभाव था ( आज भी हे ) जैसा की मेने कई बार पाक टी वि पर सुना भी की अलीगढ़ के बच्चे पुरे भारत में फैल गए और लीग को वोट दिलवाए ( राही मासूम रजा आधा गाव का एक दर्शय ) एक बार तो जिन्ना जब अलीगढ़ में आये तो छात्रों ने उनके घोड़ो को खोल दिया और खुद खींच कर उनकी बग्गी स्टेशन से यूनिवर्सिटी तक लाये ( हालांकि मेरा अंदाज़ा हे की ये नौजवान पाकिस्तान में बिना कम्पीटीशन मिलने वाली सरकारी नौकरियों पदो के लिए उत्साहित थे इस्लाम तो इनका एक बहाना था ) तो ये था अब जब भारत आज़ाद हुआ तो आवाज़ उठने लगी की भारत विभाजन करने वाली इस यूनिवर्सिटी को बंद कर दिया जाए मगर महान उदारवादी नेहरू को पता था की भारत जैसे उस समय लगभग अनपढ़ देश में एक महान शिक्षण संस्थान को जो बरसो में और भारी संसधानो से तैयार होते हे उन्हें कुछ लोगो की करतूत के लिए मिटाना ठीक न होगा नेहरू ने ये कहकर ये मांग ठुकरा दी की ”इतनी अलीगढ यूनिवर्सिटी को हमारी जरुरत नहीं हे जितनी हमें इस महान यूनिवर्सिटी की जरुरत हे ”

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  4. सिकंदर हयात

    Indresh Uniyal (India)
    November 17,2014 at 10:10 PM GMT+05:3
    अगर नेहरू न होते तो कश्मीर की समस्या न होती. हिन्द्स्तान का नक्शा इससे बड़ा होता.
    जवाब दें

    बहुत बढ़िया कॉमेंट है! (0)
    यह कॉमेंट आपत्तिजनक है
    (Indresh Uniyal को जवाब )- sikander hayat
    November 18,2014 at 11:31 AM GMT+05:30
    एकदम बकवास नेहरू ना होते तो कश्मीर का बड़ा हिसा भारत को ना मिलता नेहरू की गुडविल से कश्मीर भारत को मिल सका वर्ना मऔन्टबेटन और ब्रिटेन कासमीर को पाक का सवभाविक हक समझता था जेसे हेदराबाद जूनागढ़ भारत के . फिर लद्दाख का जो निर्जन बंजर इलाका चीन ने हडपा था उसके बदले भी भारत को बाद को 1973 मे रियासत सिक्किम जेसा अधभुत इलाका मिला चीन तब हाथ मलता रह गया हमला कर ना सका क्योकि वो पहले ही दुनिया मे नेहरू जी की लोकप्रियता से जलभुन कर 62 मे हमला कर चुका था रोज रोज हमला कर नही सकता था यानि नेहरू जी की ” श्‍हादत ” से भारत को सिक्किम जेसा बेहतरीन इलाका भी मिला खुदा ना खास्ता कोई और पी एम बनता तो भारत नाम का कोई देश ही ना होता
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  5. सिकंदर हयात

    sikander hayat को जवाब )- Indresh Uniyal (India)
    November 18,2014 at 09:29 PM GMT+05:
    भारत की जमीन चीन ने हड़पी, चाहे वह बंजर ही क्यों न थी पर हमारी थी. यही नेहरू ने भी संसद मे कहा था की बंज़र जमीन ही थी. तब राममनोहर लोहिया ने जबाब दिया था की आपके सर पर भी बॉल नही उग रहे हैं बंजर होगया है आपका सिर् तो क्या काट दोगे? सिक्किम के बारे मे आपका तर्क बड़ा ही हास्‍स्यासपद है. वह इंदिराजी का कमाल था न की नेहरू का.
    जवाब दें
    (Indresh Uniyal को जवाब )- sikander hayat
    November 19,2014 at 09:37 AM GMT+05:30
    चीन ने जमीन हड़पी थी और सिक्किम भारत का अभिन्न अंग था ? य सस्ती देशभक्ति आपको ही मुबारक हो . चीन ने पूरी कोशिश की थी की सिक्किम भारत को ना मिले उसकी भी नज़र थी मतलब सॉफ है की यानि नेहरू ने 62 का हमला अपने सीने पर ना झेला होता जिससे उनकी जान भी गयी थी तो चीन सिक्किम का भारत विलय ना होने देता मगर 62 के हमले के कारण् वो सिक्किम पर चाह कर भी युध ना कर सका चलिये आपने इंदिरा जी को ही क्रेडिट दिया जिनका की घोर अपमान आपके प्रिय मोदी ने किया है कासमीर पर भी आगे और लिखता हु की किस तरह से नेहरू जी ने कश्मीर पर जो जो जो किया सब सही किया संघियो बज़रंगियो ने नाहक नेहरू को कासमीर पर बदनाम कर रखा है आएहसआनफरामोश संघी

    Reply
  6. सिकंदर हयात

    इंसान इतना फितरती और सेल्फिश होता हे की इसी कारण कोई समस्या सुलझ नहीं पाती हे अब देखे नेहरू विरोधियो का एक तबका तो संघी महासभाई हिन्दू कटरपन्ति हे दूसरा नेहरू विरोधी तबका अंग्रेजी पूंजीवादी पिशाचों का तबका हे ये नेहरू की समाजवादी नीतियों का कोसता रहता हे ( जबकि समाजवादी भी नेहरू विरोध पर थे खासकर लोहिया ) के जी इस कारण भारत वेस्ट यूरोप ना बन सका ( तवलीन सिंह जी ने अपनी सारी जिंदगी इसी लाइन को लाख बार लिखने को समर्पित कर दी हे ) ठीक हे अब देखिये की ये वो अंग्रेजी पिशाच हे जिन्हे भारत में अंग्रेजी बने रहने से खूब फायदा हुआ आम आदमी का नुक्सान हुआ मगर अंग्रेजी से इन्हे देश विदेश में खूब फायदे हुए तो अंग्रेजी भी नेहरू जी के कारण ही बनी रही थी वार्ना अंग्रेजी भी हटा दी जाती मतलब साफ़ हे की अंग्रेजी से नेहरू विरोधी पूंजीवादी पिशाचों को जमकर लाभ हुआ फिर भी उल्टा ये नाशुक्रेअहसानफ़रामोश नेहरू को कोसते हे बताइये क्या तुक हे ? अब जहा तक अंग्रेजी की बात हे तो ऐसा नहीं हे की नेहरू हिंदी के खिलाफ थे नहीं मगर उस समय एक तो ये था की हिंदी की ज़िद करने वाले लोग हिंदी हिन्दू का नारा लगाने वाले भी थे और नेहरू भारत को किसी कीमत पर हिन्दू राष्ट्र नहीं बनने देना चाहते थे दूसरा की हिंदी वाले भी शायद नेहरू को संतुष्ट ना कर पाये हो की हिंदी में साइंस टेक्नोलॉजी मेडिकल की पढ़ाई कैसे होगी ? निश्चित रूप से नेहरू हिंदी विरोधी नहीं थे नंदन नीलकेणी ने तो अपनी किताब में अंग्रेजी का महिमांडन करते हुए नेहरू को हिंदी समर्थक तक बता डाला

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  7. सिकंदर हयात

    afzal khan
    June 9, 2014
    हयत जी
    मुझे याद आ रहा है के जो भी साहित्यकार, कलाकार या खिलाडी पाकिस्तान गया वो बहुत परेशान हुआ जैसे जोश मलीहाबादी, नूर जहा , रफिकुल हक और भी बहुत से लोग पाकिस्तान जाने के बाद पश्टये. जोश तो दुबारा भारत वापस आ गये.
    REPLY
    सिकंदर हयात
    June 9, 2014
    सही कहा अफज़ल भाई वास्तव में जिस जिस मुस्लिम ने नेहरू पर भरोसा किया वो छा गए जैसे की दिलीप कुमार रफ़ी साहब नौशाद साहब बिस्मिल्लाह खान मकबूल फ़िदा आदि आदि आधे महान कलाकार मुस्लिम थे आधो के गुरु मुस्लिम थे ( जैसे लता जी ) अगर ख़ुदा न खास्ता ये लोग पाकिस्तान चले जाते तो वहा जाकर न ये किसी काम के रहते न भारत इनके बिना ये दुनिया की सबसे बड़ी सांस्कर्तिक दुर्घटना हो जाती भला बताइये जिस नूरजहाँ की लता बाई दीवानी थी कहती थी मुझे नूरजहाँ जैसा गाना हे वो नूरजहाँ उन्होंने पाक जाकर सिर्फ अपने अफयर्स के लिए सुर्खिया बटोरी गाती भी कैसे ? नौशाद शकील बदायुनी सलिल चौधरी सी रामचन्द्र रवि मज़रूह कैफ़ी जाफरी आनद बक्शी शंकर जयकिशन तो यहाँ थे ? लेखक कलाकार का 100 % सेकुलर होना अनिवार्य इसलिए लेखक दीपक असीम ने सही लिखा हे की सरफ़रोश फिल्म एक मधुर गायक को आतंकवादी दिखाया जाना बिलकुल गलत हे कोई अच्छा कलाकार आतंकवादी हो ही नहीं सकता जैसे ही वो होगा फिर उसकी कला ही मर जायेगी

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  8. सिकंदर हयात

    एक बात की नेहरू के सेकुलर प्रभाव की काट के लिए बज़रंगियो ने नेट पर उनके बारे ये अफवाह जमकर उड़ा रखी हे ये बात में कई साइटों पर पढ़ चूका हु के जी नेहरू के दादा कश्मीरी ब्राह्मण नहीं मुस्लिम थे अफ़सोस को सोशल मिडिया के लगातार बढ़ते प्रभाव के बीच कोंग्रेसियो को राहुल को इतनी समझ भी नहीं हे की इन घिनोने अफवाहबाज़ो को कोर्ट में घसीटे

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  9. सिकंदर हयात

    ब में बड़वानी ज़िले के कलेक्टर अजय गंगवार को फ़ेसबुक पर नेहरू-गांधी परिवार की तारीफ़ करना महंगा पड़ गया है.
    उन्हें बड़वानी के कलेक्टर पद से हटा कर सचिवालय में उपसचिव बना दिया गया है.
    अजय गंगवार ने बुधवार को अपने फेसबुक पोस्ट में लिखा था, “ज़रा ग़लतियां बता दीजिए जो नेहरू को नहीं करनी चाहिए थी. अगर उन्होंने 1947 में आपको हिंदू तालिबानी राष्ट्र बनने से रोका तो यह उनकी ग़लती थी, उन्होंने आईआईटी, इसरो, आईआईएसबी, आईआईएम, भेल स्टील प्लांट, बांध, थर्मल पावर लाए ये उनकी ग़लती थी.”
    “आसाराम और रामदेव जैसे इंटिलेक्चुअल्स की जगह साराभाई और होमी जहांगीर को सम्मान और काम करने का मौक़ा दिया ये उनकी ग़लती थी, उन्होंने देश में गौशाला और मंदिर की जगह यूनिवर्सिटी खोली ये भी उनकी घोर ग़लती थी”.
    Image copyrightFACEBOOK
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    अजय गंगवार ने की थी नेहरू की तारीफ़
    इस पोस्ट की चर्चा होने के बाद गुरुवार को उन्होंने उसे हटा दिया था.

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  10. सिकंदर हयात

    Sanjay Tiwari
    7 hrs ·
    आज डॉ राम मनोहर लोहिया की पुण्यतिथि है। कल ही विश्वनाथ चतुर्वेदी ने लोहिया नेहरू संबंध पर एक जबर्दस्त किस्सा बताया। लोहिया और जवाहरलाल नेहरू राजनीति के दो ध्रुव थे। लेकिन वह दौर और था। इसलिए राजनीति के दो ध्रुव होने का मतलब जानी दुश्मन होना बिल्कुल नहीं होता था। लोहिया जी बीमार पड़े। आखिरी अवस्था आ गयी थी। इलाहाबाद में उनके शुभचिंतक परेशान थे कि उनको कहां रखा जाए। घर परिवार तो था नहीं। या तो अस्पताल में रखा जाता जहां उनका इलाज और सेवा हो जाती या फिर किसी के घर पर।
    विचार विमर्श चल रहा था। किसी ने कहा अस्पताल में भर्ती कर देते हैं तो किसी न कहा किसी के घर पर ले चलते हैं। इतने में लोहिया जी ने कहा, अगर मेरी हालत इतनी खराब हो जाए कि मैं बोल भी न सकूं तो मुझे तीन मूर्ति (प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का आवास) पहुंचा देना। वही एक जगह ऐसी है जहां मेरी तीमारदारी हो जाएगी।
    डॉ लोहिया ने नेहरू का जीवनभर राजनतीकि विरोध किया लेकिन उन्हें व्यक्तिगत रूप से नेहरू पर सबसे ज्यादा भरोसा था कि यह व्यक्ति बुरे वक्त में जरूर साथ देगा। ऐसी होती थी राजनीति। और ऐसे होते थे राजनेता।

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  11. सिकंदर हयात

    पटेल और नेहरू के बारे में मोदी की बेबुनियाद बातें -अरुण माहेश्वरीभारत की राजनीति में सरदार पटेल की विशेष पहचान किस बात से है ?
    रियासती राज्यों का भारत में विलय कराके भारत के राजनीतिक और प्रशासनिक एकीकरण को सुदृढ़ करने से।इस एकीकरण की एक शुरूआत अंग्रेजों, बल्कि कंपनी राज के जमाने से ही हो गयी थी। 1834 का ‘डाक्ट्रिन आफ लैप्स’ – बेवारिस और नालायक राजाओं के राज्य को ब्रिटिश शासन के अधीन करने का विस्तारवादी डाक्ट्रिन। तहत लार्ड डलहौजी (1848-1856) ने तत्कालीन लगभग छ: सौ रियासतों में से झांसी, उदयपुर, अवध आदि 21 रियासतों को ब्रिटिश राज के अधीन कर लिया था। 1857 के अनेक कारणों में से एक कारण यह भी था।ब्रिटेन में 18 जुलाई 1947 के दिन भारत की आजादी का कानून पारित हुआ। इसमें भारत के विभाजन के साथ ही रियासती राज्यों की आजादी की बात भी कही गयी थी। एक देश की सीमा में इतने स्वतंत्र देशों के अस्तित्व को असंभव समझ कर ही उसके पहले से माउंटबेटन ने रियासतों के मामले के लिये एक कोर कमेटी का गठन किया था जिसके सचिव थे सी एस वी पी मेनन। पटेल के एक करीबी अधिकारी।जिस समय नेहरू भारत के संविधान को तैयार करने में लगे हुए थे, पटेल के जिम्मे मेनन और माउंटबेटन के साथ रियासतों के मसले को सुलझाने का काम था।वैसे भी इन रियासती राज्यों की कोई स्वतंत्र हैसियत बची नहीं थी, इसीलिये चाय की टेबुल पर सभी राजाओं से हस्ताक्षर लेकर बड़ी आसानी से उस काम को पूरा कर लिया गया। लेकिन जम्मू और कश्मीर के महाराजा हरि सिंह, हैदराबाद के निजाम उस्मान अली खां और जूनागढ़ के नवाब तृतीय मुहम्मद महताब खांजी ने अडि़यल रुख अपनाया। जूनागढ़ का नवाब एक धमकी से मान गया, हैदराबाद के निजाम को मनाने के लिये गणपरिषद के के.एम.मुंशी आदि की मदद से कुछ मेहनत करनी पड़ी।

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  12. सिकंदर हयात

    अरुण माहेश्वरीजम्मू और कश्मीर के हरि सिंह को हिंदू महासभा का समर्थन था और वह भारत सरकार की एक नहीं सुन रहा था।ऐलेन कैंबल जान्सन ने अपनी किताब ‘मिशन विथ माउंटबेटन’ माउंटबेटन के अनुभव को बताते हुए लिखा है :‘‘सरदार वल्लभ भाई पटेल के निर्देशों के अधीन गृह मंत्रालय बिल्कुल अलग, ऐसी कोई कार्रवाई नहीं कर रहा था जिसका यह मायने लगाया जा सके कि वह कश्मीर के हाथ बांध रहा हो और साथ ही यह आश्वासन दे रहा था कि पाकिस्तान द्वारा उसे हथियाने की कोशिश को भारत नजरंदाज नहीं करेगा।’’इससे जाहिर है कि कश्मीर के प्रश्न पर सरदार पटेल की भूमिका स्पष्ट नहीं थी।सन् 1950 में पटेल की मृत्यु हो गयी। भारत के एकीकरण का काम तब भी अधूरा था। फ्रांस और पुर्तगाल के हाथ में भारत के कुछ क्षेत्र रह गये थे। इन कामों को प्रधानमंत्री नेहरू ने पूरा किया। गोवा में तो सेना भी भेजनी पड़ी थी।कहने का तात्पर्य यह कि भारत के एकीकरण में पटेल और नेहरू एक दूसरे के पूरक थे।हैदराबाद में कानून-व्यवस्था के लिये पटेल सेना भेजना चाहते थे, नेहरू ने बाधा नहीं दी। कश्मीर में नेहरू और शेख अब्दुल्ला भारत में शीघ्र विलय के पक्ष में थे, पटेल प्रतीक्षा करना चाहते थे। लेकिन बाद में कश्मीर में सेना उतारने के मामले में दोनों एकमत थे।अब भी क्या कोई कहेगा कि यदि पटेल भारत के प्रधानमंत्री होते तो भारत की राजनीति की दिशा भिन्न होती ?इन दोनों व्यक्तित्वों को राजनीति के दो छोर बताना एक शरारतपूर्ण कोशिश है। स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल शक्तियों और उससे अलग रहने वाली आरएसएस की तरह की ताकतों को भारत की राजनीति के दो छोर कहा जा सकता है। नेहरू-पटेल के छद्म द्वैत को खड़ा करके संघ सिर्फ अपने लिये समर्थन का आधार खोजना चाहता है।नेहरू और पटेल के बीच फर्क किसी भी दो व्यक्ति के बीच पाये जाने वाले विचार-आचरण के स्वाभाविक फर्क की तरह है। जो पटेल आजाद भारत के पहले चुनाव के पहले ही दिवंगत हो गये, उनकी धर्म-निरपेक्षता को कथित ‘वोट बैंक वाली धर्म-निरपेक्षता’ से अलग बताना नरेंन्द्र मोदी की ढेरों हवाई बातों की तरह ही एक और तीर-तुक्के वाली एक बात ह

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  13. सिकंदर हयात

    Pankaj Srivastava
    4 hrs ·
    मोदी सरकार ने एक आरटीआई के जवाब में लिखकर दे दिया है कि नेताजी सुभाष बोस का निधन 1945 में विमान दुर्घटना में हुआ था।
    नेहरू के ख़िलाफ़ दशकों तक घृणित अभियान चलाने वालों को आख़िरकार सच्चाई स्वीकार करनी पड़ी। लगातार यह प्रचार किया गया कि सुभाषचंद्र बोस से जुड़ी फ़ाइलों के उजागर होते ही नेहरू की ‘बोस विरोधी’ असलियत सामने आ जाएगी। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भी यह मुद्दा भुनाने की कोशिश की गई…लेकिन हुआ क्या ?…इन फ़ाइलों से उलटा यह पता चला कि नेहरू नेताजी का कितना सम्मान करते थे। उन्होंने नेता जी की बेटी अनिता के ख़र्चे के लिए बाक़ायदा ट्रस्ट गठित कराया और लगातार उन्हें आर्थिक मदद पहुँचाई जाती रही।
    जनसत्ता ने लिखा है- केंद्र सरकार ने शायद पहली बार लिखित तौर पर कहा है कि नेताजी सुभाषचंद्र बोस की मृत्यु एक विमान दुर्घटना में 1945 में ताइवान में हुई थी। सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत मांगी गई जानकारी के जवाब में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने जवाब दिया है, “शहनवाज कमेटी, जस्टिस जीडी खोसला कमीशन और जस्टिस मुखर्जी कमीशन की रिपोर्टें देखने के बाद सरकार इस नतीजे पर पहुंची है कि नेताजी 1945 में विमान दुर्घटना में मारे गए थे। ”
    गृह मंत्रालय ने अपने जवाब में कहा है, “मुखर्जी कमीशन की रिपोर्ट के पृष्ठ संख्या 114-122 पर गुमनामी बाबा और भगवानजी के बारे में जानकारी उपलब्ध है। मुखर्जी कमीशन के अनुसार गुमनामी बाबा या भगवानजी नेताजी सुभाषचंद्र बोस नहीं थे। गृह मंत्रालय ने नेताजी से जुड़ी 37 गोपनीय फाइलें सार्वजनिक कर दी हैं।”Pankaj Srivastava
    4 hrs · Dilip Khan
    2 hrs ·
    कॉरपोरेटाइजेशन इसलिए भी ख़तरनाक है क्योंकि आपको पता भी नहीं चलता कि विकल्प के तौर पर आप जिसको चुन रहे हैं, वो असल में विकल्प है ही नहीं। मसलन,
    ✴एडिडास और रिबॉक एक ही कंपनी के उत्पाद हैं। आप एक से चिढ़कर दूसरा जूता ख़रीदते हैं, लेकिन पैसा मिलता है एक ही मालिक को।
    ✴whatsapp/Instagram सब फ़ेसबुक का है। सबका मालिक एक है। नाम है मार्क ज़करबर्ग।
    ✴बिग बाज़ार और इज़ी डे सब एक ही कंपनी के बच्चे हैं।
    ✴दैनिक जागरण से ऊबकर आप नई दुनिया ख़रीदते हैं तो सारा पैसा गुप्ता जी को जाएगा। दोनों उन्हीं के प्रॉडक्ट हैं।
    ऐसे दर्जनों उत्पाद हैं जो अलग-अलग ब्रांड नेम के साथ हमारे बीच हैं और जिनकी कंपनी एक ही है। जैसे कोका-कोला और थंप्स अप/स्प्राइट, या फिर पेप्सी या मिरिंडा।
    बड़े कॉरपोरेशंस आपको विकल्प मुहैया कराने का ढोंग रचते हैं।Urmilesh Urmil
    12 hrs ·
    देश की कई राज्य सरकारें, नागरिक संगठन और कानूनविद् कह चुके हैं कि केंद्र सरकार या किसी को भी हमारे जैसे विविधता भरे समाज में लोगों की खान-पान की आदत और जीवनशैली आदि को नियंत्रित या किसी एक समुदाय की इच्छानुसार बनाने की कोशिश करना लोकतंत्र और देश के हित में नहीं होगा। पर संघ-भाजपा संचालित केंद्र सरकार लोकतंत्र और देश की परवाह किए बिना अनाप-शनाप आदेश और अधिसूचना जारी करने में लिप्त है। केरल, तमिलनाडु, पूर्वोत्तर के अधिकतर राज्यों और बंगाल आदि में तरह-तरह से जनाक्रोश फूटता नजर आ रहा है। शासन में बैठे लोग एक तरफ ‘डर्टी वार’ में देश को उलझा रहे हैं और दूसरी तरफ खानपान और जाति-बिरादरी के अंतर्विरोधों को बढ़ाकर पूरे समाज को ‘गृहयुद्ध’ की तरफ ढकेलते नजर आ रहे हैं। प्लीज, देश के हित में अपनी इन जनविरोधी नीतियों पर तत्काल रोक लगाइये।Sheetal P Singh
    3 hrs · New Delhi ·
    हरियाणा की एक सड़क
    भविष्य में नंदी बैल और बूढ़ी गायें इन सड़कों पर बहुमत में होंगी !
    राजस्थान की हिंगोनिया गोशाला में बीते बरस करीब आठ हज़ार गायें मर गईं / गायब कर दी गईं थीं । सरकार करीब दो करोड़ रुपये इस गोशाला को वार्षिक ग्रांट देती है । राजस्थान में बीजेपी की सरकार है !
    यानि गोशालाएं बूढ़ी अपंग बाँझ बीमार गायों और नंदियों की देखभाल में अक्षम साबित हुई हैं !
    अब सड़क ही सहारा है ! क्योंकि देश “गाय” है “गाय” ही देश है ! गाय वोट भी है !Prakash Govind
    3 hrs ·
    सन् 2019
    बसन्ती की मौसी
    मौसी के घर अमित शाह वोट मांगने गए तो।
    मौसी -: देखो बेटा पढ़ी लिखी सियानी हूँ, कोई स्मृति ईरानी तो हूँ नही। हां.. इतना तो पूछना ही पड़ेगा कि तुम्हारे नेता ने किया क्या है?
    अमित -: करने का क्या है मौसी जी, एक बार फिर से PM बनेगा, देश की जिम्मेदारी सिर पे पड़ेगी तो कुछ करने भी लग जायेगा।
    मौसी -: हाय दय्या! फिर मतलब ? पहले 5 साल में कुछु भी नहीं किया ?.
    अमित -: अरे अरे मौसी आप तो हमारे मोदी को गलत समझ रही है। 5 साल होते ही कितने है, गौ हत्या, जेनयू, भारत माता, जाट-पटेल और दंगे-पंगे,,, अडानी अम्बानी की लूट में पता ही कहाँ चले।
    मौसी -: हाय! इतना कुछ हुआ और वो कुछु बोला भी नाही।
    अमित -: अब बोलने का क्या हैं मौसी! मन की बात तो बहुत बोली। मगर संघ के खिलाफ भला कैसे बोलते।
    मौसी -: ओ हो हो! तो क्या संघी है?
    अमित -: अरे अरे मौसी ,, वो और संघी,, न न ना। अब लड़कपन में किसे क्या पता होता है ,, क्या अच्छा क्या बुरा। किसी ने बहला फुसला के शाखा में भर्ती करा दिया, तो कर लिया बेचारे ने …
    एक बार फिर से PM बन जाये तो संघ तो बस यूँ छूट जाएगा यूँ।
    मौसी -: मुझ बुढ़िया को समझा रहे हो बेटा संघ-वंघ की लत किसी की छूटी है जो छूटेगी।
    अमित -: अरे मौसी PM बनते ही दे दनादन विदेशों के दौरे शुरू हो जाएंगे। संघ तो भारत में ही छूट जाएगा न।
    मौसी -: बस यही एक कमी रह गयी थी।
    अमित -: मौसी जी! विदेश तो बड़े-बड़े खानदान के पढ़े-लिखे लोग ही जाते है।
    मौसी -: एक बात तो माननी पड़ेगी लाख कमी हो तुम्हारे नेता में मगर तुम्हारे मुँह से तारीफ़ ही निकले हैं।
    अमित -: अब क्या बताये मौसी हम भक्तो का तो दिमाग ही ऐसा हैं।
    मौसी -: जाते जाते ये ही बताते जाओ बेटा तुम्हारा नेता पढा-लिखा कितना है?
    अमित -: बस यूं समझिये मौसी जी, जैसे ही सही खबर मिलेगी, सबसे पहले आपको ही बतायेगे।
    तो मौसी जी आपका वोट पक्का समझू।Dilip C Mandal
    1 hr ·
    जस्टिस शर्मा जी हाईकोर्ट के जज हैं। कहते हैं कि मोर राष्ट्रीय पक्षी है क्योंकि मोरनी आँसू पीकर गर्भवती होती है।
    और गाय राष्ट्रीय पशु क्यों बने, लगे हाथों यह भी बता देते।
    ये तो हद की भी हद हो गई। पता नहीं विदेशी लोग सुनते होंगे, तो हम लोगों के बारे में क्या सोचते होंगे!
    बस करो। देश का नाम मिट्टी में मिला दोगे क्या?

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  14. सिकंदर हयात

    Krishnan Iyer with Onkar Toshniwal.
    Yesterday at 14:00 ·
    एक चड्डी ने बोला कि जब स्वर्गीय कमला नेहरूजी की तबियत खराब थी तब नेहरूजी ऐय्याशी कर रहे थे और कमलाजी को लावारिस मरने छोड़ दिया था..इससे ज्यादा नीचता और क्या हो सकती है? लुगाई छोड़, सेक्स रैकेट गिरोह को मेरा जवाब तारीख के साथ :
    1931 के अंत से कमलाजी की तबियत खराब रहने लगी..जुलाई 1934 को उनहे शायद पहली बार TB का पता चला..ईलाज शुरू किया गया.. TB sanatorium भोवाली, नैनीताल में ईलाज शुरू हुवा..10 मार्च से 15 जुलाई 1935 तक उनका भोवाली में ईलाज हुवा.. Dr L. S. White उनका ईलाज कर रहे थे..इसी ईलाज से उन्हें काफी फायदा हुवा और वो स्विट्ज़रलैंड जाने के लायक सेहत बना पायी..कहा थे नेहरूजी ईस वक्त? सुनिये जवाब-
    जब कमलाजी भोवाली में ईलाज करवा रही थी तब नेहरूजी को अंग्रेजो ने अल्मोड़ा जेल में कैद कर रखा था..हॉस्पिटल का रेकॉर्ड बताता है कि नेहरूजी 6 बार कड़े पुलिस पहरे में कमलाजी से मिलने गये.. अंग्रेजो ने अनुमति दी थी..आपभी जाकर वो विजिटर रजिस्टर देख सकते है..225 एकर का ये TB हॉस्पिटल आजभी मौजूद है.. जिस कमरे में कमलाजी का ईलाज हुवा था उसका नाम अब ‘कमला कॉटेज’ है..वो उनकी याद में संजो कर रखा गया है…
    उस वक्त TB का कोई ईलाज नही होता था..तड़प तड़प कर मौत हो जाती थी TB रोगियों की..कमसे कम भारत मे तो ईलाज नही था..कमलाजी को स्विट्ज़रलैंड में ईलाज करवाने का फैसला किया गया..
    बाकी का इतिहास बताने के पहले जरा टाइम मशीन में सवार हो जाइये.. 1930 का वो दौर याद कीजिये..भगत सिंह की फांसी, डांडी नमकयात्रा, लाहौर पूर्ण स्वराज, हरिजन यात्रा, असहयोग और भी अनगिनत आंदोलन..भारत में आज़ादी की हवा बहुत जोर से बह रही थी.. नेहरूजी और सुभाषचन्द्र युथ आइकॉन बन चुके थे..जिम्मेदारी इतनी की रातों की नींद बस 2 घण्टे..नेहरूजी और सुभाषचंद्र की दोस्ती और कमलाजी का ईलाज- दोस्ती की एक अनकही दास्तान सुनिये..
    कमलाजी को स्विट्जरलैंड लाया गया ईलाज के लिये.. उनदिनों विदेश यात्रा आजकी तरह आसान नही होती थी..नेहरूजी खुद गये कमलाजी का ईलाज करवाने लेकिन भारत वापस आना पडा और फिर गिरफ्तार कर लिये गये..इंदिराजी अकेली अपनी माँ की सेवा कर रही थी स्विट्ज़रलैंड में..
    सुभाषचंद्र उस वक्त वियेना में थे..जैसे ही उन्हें मालूम हुवा वो वियेना से Badenweiler आ गये कमलाजी और इंदिराजी का साथ देने के लिये…सुभाषचन्द्र ने कमलाजी के ईलाज की पूरी जिम्मेदारी सम्हाल ली..अंग्रेजो ने फिर भी नेहरूजी को जेल से नही रिहा किया..बहुत कोशिशों के बाद नेहरूजी को रिहाई मिली.. 28 फ़रवरी 1936 को स्विटज़रलैंड के लोज़ान शहर में कमला नेहरू ने अंतिम साँसें लीं..उनके मृत्यु के समय सुभाषचंद्र, नेहरुजी के साथ-साथ, इंदिराजी, नेहरु की माता स्वरुपरानी जी और डॉ अटल वहां मौजूद थे..
    ये थे स्वंत्रता सेनानी कमलाजी के जीवन के सबसे दर्द भरे पल..अब एक सवाल : माता जशोदा भी पिछले 50 सालों में कभी ना कभी बीमार हुई थी…साहेब क्या एक बार भी माता जशोदा को किसी डॉक्टर के पास ले गये क्या? क्यों हमारी मातावो पर कीचड़ उछालते हो? हम तो तुम्हारी मातावो को अपनी माता से भी ज्यादा सम्मान देते है….हमे जितना दर्द दोगे, हम उतने मजबूत बन कर उभरेंगे…क्योंकि हमारे पास दो मातावो का आशीर्वाद है : हमारी माँ और तुम्हारी माँ – दोनो का आशीर्वाद.. समझे?
    ईसी मुद्दे से जुड़ा हुवा एक बहुत महत्वपूर्ण इतिहास शाम को एक बहुत छोटी सी पोस्ट में लिखूंगा.. नेहरूजी और सुभाषचन्द्र की दोस्ती की एक छोटी सी दास्तान..
    जय हिंद …कमला नेहरू अमर रहे..Krishnan Iyer
    17 July at 17:11 ·
    ममताजी ने आज अपने प्रेस कांफ्रेंस में तीन बहुत महत्वपूर्ण और विस्फोटक सवाल पूछे है :
    1. दार्जीलिंग में पशुपति गेट बॉर्डर के पास 400 चीनी भाषा की स्कूल खोली गई है!!! किसने खोली ये चीनी स्कूल? बॉर्डर तो राज्य सरकार के हाथों में नही होती..
    2. जमाते इस्लामी के लोग बांग्लादेश बॉर्डर पर करके कैसे आये? बंगाल में जमाते इस्लामी का कोई नामोनिशान नही है..किसने खोली बॉर्डर?
    3. गोरखा जनमुक्ति मोर्चा का गठबंधन बीजेपी के साथ है..बीजेपी ने दार्जीलिंग हिंसा रोकने के लिये गोरखा मोर्चा को क्यों नही रोका?
    बंगाल एक ऐसा राज्य है जहां चीन, बांग्लादेश, भूटान की सीमाये लगती है…सही मायनों में बंगाल और चीन शायद 1-2 घण्टे की दूरी पर है…कौन सा खेल चल रहा है ये? क्या चीन के साथ मिलकर कोई खेल खेला जा रहा है? कौन है ये खिलाड़ी? ममताजी की देशभक्ति का सर्टिफिकेट भी जारी हो रहा है…जनरल करियप्पा वाला किस्सा तो नही दोहराया जा रहा?
    भगवा गिरोह हर मदरसे की जानकारी रखता है…ये 400 चीनी स्कूल कहा से आये? जावो तोड़ दो सारी चीनी स्कूलों को !!
    जागते रहो !!!!Krishnan Iyer

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  15. सिकंदर हयात

    नेहरू के दिए संस्कार Jagadishwar Chaturvedi
    7 hrs · जब इंदिरा गाँधी के साथ जेपी रोए
    ————————२४मार्च ‘७७ दिल्ली के रामलीला मैदान में जनता गठजोड़ की तरफ से विजय रैली रखी गई थी. जनता के सभी विजयी नेताओं के अलावा जेपी भी उस सभा को संबोधित करने वाले थे. लेकिन अपनी राजनीतिक विजय के सबसे बड़े दिन जेपी विजय रैली में भाषण देने नहीं गए. यह वही रामलीला मैदान था जहां पच्चीस जून को भाषण देने के बाद जेपी को गिरफ्तार किया गया था. यहीं फरवरी सतहत्तर में जेपी ने जनता के चुनाव अभियान की शुरुआत की थी. अब इसी रामलीला मैदान में जनता का विजयोत्सव मनाया जा रहा था. लेकिन जेपी वहां नहीं गए. वे गांधी शांति प्रतिष्ठान के अपने कमरे से निकलकर सफदरजंग रोड की एक नंबर की कोठी में गए जहां पराजित इंदिरा गांधी रहती थीं. जैसे महाभारत के बाद भीष्म पितामह गांधारी से मिलने गए हों. इंदिरा गांधी के साथ उनके सिर्फ एक सहयोगी एचवाई शारदा प्रसाद थे और जेपी के साथ गांधी शांति प्रतिष्ठान के मंत्री राधाकृष्ण और मैं. अद्भुत मिलना था वह. मिलकर इंदिरा गांधी रोईं और जेपी भी रोए.
    जेपी के बिना इंदिरा गांधी पराजित नहीं हो सकती थीं और जेपी उनसे संघर्ष नहीं करते तो देश में लोकतंत्र बच नहीं सकता था. लेकिन जेपी अपनी विजय पर हुंकार भरने के बजाय अपनी पराजित बेटी के साथ बैठकर रो रहे थे. ऐसा महाभारत लड़नेवाले एक ही कुल के दो योद्धा कर सकते थे. उस वक्त और आज की राजनीति में दो नेता तो ऐसा नहीं कर सकते. जेपी के लिए वे बेटी इंदु थी भले ही उनके खिलाफ जेपी ने आंदोलन चलाया और चुनाव अभियान की अगुवाई की. निजीतौर पर इंदिरा गांधी भी जेपी को अपना चाचा मानती रहीं लेकिन राजनीतिक लड़ाई उनने भी आखिरी दम तक लड़ी ही.
    जेपी ने जैसे बेटी से पूछते हैं – इंदिरा जी से पूछा कि सत्ता के बाहर, अब काम कैसे चलेगा? घरखर्च कैसे निकलेगा? इंदिरा जी ने कहा कि घर का खर्च तो निकल आएगा. पापू (जवाहरलाल नेहरू) की किताबों की रॉयल्टी आ जाती है. लेकिन मुझे डर है कि ये लोग मेरे साथ बदला निकालेंगे. जेपी को यह बात इतनी गड़ गई शांति प्रतिष्ठान लौटते ही उनने उसी दिन प्रधानमंत्री बने मोरारजी देसाई को पत्र लिखा. कहा कि लोकहित में इंदिरा शासन की ज्यादतियों पर जो भी करना हो जरूर कीजिए लेकिन इंदिरा गांधी पर बदले की कोई कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए. सबेरे जेपी विमान से पटना गए लेकिन वहां उनका डायलिसिस बिगड़ा तो वायुसेना के विमान से उन्हें मुंबई और जसलोक अस्पताल भेजा गया.
    वरिष्ठ पत्रकार स्व.श्री प्रभाष जोशी
    “जेपी और इंदिरा गांधी”
    (१४ अक्टू.२००२के आलेख के कुछ अंश )
    कैलाश भसीन की वाल से। Jagadishwar Chaturvedi
    वाया हिमांशु कुमार, आशुतोष कुमार

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  16. सिकंदर हयात

    Pushker Awasthi
    8 hrs ·
    कांग्रेस की सरकारों और उनके बने गए शिक्षाविदों और बुद्धजीवियों ने भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को लेकर ऐसा मिथक बनाया है की लोग अपने बाल काल से ही उन्हें चाचा नेहरू ऐसे भवनात्मक रिश्ते से स्वयं को बाँध लेते थे। इसका इतना मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ा है की लोगो में नेहरू को लेकर उभरते हुए प्रश्नो को देखने की या अपनी दृष्टि ही खत्म हो गयी या फिर नेहरू को लेकर प्रश्न पूछने को एक कार्डिनल सिन बना दिया गया है। इस चचा नेहरू सिंड्रोम का मैं भी अपवाद नही रहा हूँ लेकिन जब पिछले 25 वर्षो में खुद सोचने और समझने की ऊष्मा जागी तब नेहरू को लेकर बताई गयी समकालीन बातो में विरोधाभास स्पष्ट दिखने लगे थे।
    मैंने इसी विरोधाभास को समझने के लिए, भारत में स्वतंत्रता के बाद लिखे गये कांग्रेसी शासन तंत्र द्वारा पोषित, वामपंथी विचारधारा से आत्ममुग्ध बुद्धजीवियों के लिखित इतिहास को पढ़ा वहीं मैंने कम से कम अंतराष्ट्रीय व राष्ट्रीय लेखकों की 50 किताबे और भी पढ़ी जो कांग्रेसियों और वामपंथियो की छाया से तटस्थ थे। इस तमाम पठन पाठन के बाद जवाहर लाल नेहरू को लेकर मेरा बाल सुलभ प्रेम स्वतः समाप्त हो गया। मैंने भारत की स्वतंत्रता और उसके पुनर्निर्माण को लेकर नेहरू का आंकलन, कांग्रेसियों या फिर अपने पूर्वजो की आँखों से करना बंद कर दिया है।
    भारत के पुनर्निर्माण को लेकर नेहरू को नकारने से पहले एक प्रश्न जरूर खड़ा होता है की क्या नेहरू , क्या नाकारा थे ? या फिर ऐसा क्या नेहरू में था जिसको गाँधी ऐसे सशक्त संबल ने भारत का प्रथम प्रधानमंत्री बना डाला था? आप या मैं कितना भी नेहरू के विरोधी हो लेकिन नेहरू का आंकलन एक तरफा करना स्वयं वर्तमान के साथ धोखा होगा और मेरा मानना है की उनका आंकलन एक तरफा नही हो सकता है।
    मेरा मानना है की गाँधी जी की एक राजनैतिज्ञ के रूप में असफलता का प्रारम्भ 1930 के दशक से ही शुरू हो गया था और उनकी असफलता का प्रमुख कारण, गांधी जी की नेहरू के प्रति आसक्ति थी, जो उम्र के साथ बढ़ती रही थी। इसी आसक्ति ने नेहरू को महामंडित किया जिसको स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस ने शासन का मूल मंत्र बना लिया है।
    तटस्थ हो कर देखा जाय तो नेहरू,एक जबरदस्त शख्सियत थे। नामी परिवार से थे, खूबसूरत थे, अंग्रेजो के अंग्रेज थे , राजा रजवाड़ों के से कम जहीन नही थे, संक्षेप में 20 वीं शताब्दी के शुरू में उनमे वह सारे गुण थे जो राष्ट्रिय और अंतराष्ट्रीय स्तर पर बुद्धजीवियों और समान्य जनमानस को उनकी तरफ आकर्षित कर सकता था। इसमें भी कोई शक नहीं है की भारत की स्वतंत्रता और उसके बाद भारत के विकास के प्रति उनकी प्रतिबद्धता पूरी थी लेकिन फिर ऐसा क्या हुआ, जो मेरा जैसा भारत का एक बड़ा वर्ग, स्वतंत्रता के 7 दशक के बाद, नेहरू को महान नायक मानने से न केवल इंकार कर रहा है बल्कि आज के भारत और उसके समाज में व्याप्त विभीषका के लिए उनको जिम्मेदार मानने लगा है?
    .
    विश्व में प्रथम विश्वयुद्ध के बाद, ख़ास टूर से योरप में वैसा ही वातावरण था जैसे भारत में ‘जेऐनयु’ ऐसे विश्वविद्यालयों में का मौहाल है। उस काल में विश्व में राजतंत्र के पराभव के साथ,19 वीं शताब्दी में यांत्रिकी युग के उफान से उपजी पूंजीवादी व्यवस्था में बने पूंजीपतियों की एक तरफा संकीर्णता और लालच ने, नये पढ़े लिखे चैतन्य युवा वर्ग को मार्क्स वाद की तरफ आकर्षित किया था। उस वक्त के हर उस व्यक्ति को जो शोषण या उपनिवेशवाद के विरुद्ध खड़ा हुआ था उसे यह एक सार्थक विकल्प लगा था।
    नेहरू भी अपने योरप प्रवास के दौरान इससे प्रभावित हुए थे और उस वक्त के योरप के तमाम बुद्धजीवी, लेखक, पत्रकार व राजनीतिज्ञ भी सोशिलिस्म और वामपंथी विचारधारा में आर्थिक विषमता को लेकर समाज के लिये उत्तर ढूंढ रहे थे। उनके सामने 1918 की रूस में हुयी बोल्शेविक क्रांति एक बड़ा प्रेरणा श्रोत भी था और उसका असर योरप की राजनीती पर सीधा पड़ भी रहा था। मै समझता हूँ की नेहरू का उससे प्रभावित होना बड़ा स्वाभविक था और पराधीन भारतीय की राजनीती में वो अकेले ऐसे अकेले भी नहीं थे। देखा जाय तो, जो उस काल जो नेहरू के साथ हुआ, उन्ही परिस्थियों में मेरे ऐसे व्यक्ति के साथ भी हो जाना बड़ा स्वाभाविक होता।
    मेरे और उस काल के नेहरू में अंतर् बस अंतर यही खत्म हो जाता है क्यूंकि मैंने 25 /30 वर्ष पहले समझी हुयी और सीखी बातो को, परिणाम व विरोधाभास के तराजू पर तौल कर विकल्प की तलाश की है और वही नेहरू, क्यों की वह गलत हो ही नही हो सकते है, इसलिए उन्होंने कभी नये आये समय में, स्वतंत्रता काल में स्थापित नए तंत्रो व नई परिस्थितियों में अपने विचारो का पुनर्मूल्यांकन नहीं किया और लड़ने की कोशिश नही की। उन्होंने शायद अपने जीवन के आखरी काल में कोशिश की हो लेकिन तब तक नेहरू ने अपने को गुलाम मानसिकता के दरबारियों से घेर लिया था और सचेतन अपने को भारत का नया महाराजा बनने दिया था।
    नेहरू प्रधानमंत्री कैसे बने और क्यों बने अब इसका कोई मतलब नही रह गया है। जो 15 अगस्त 1947 को जो हो गया वो हो चूका है। उसको लेकर विलाप का कोई औचित्य नहीं है, बात तो उसके बाद की है। भारत को जिस रूप में स्वतंत्रता मिली है उसमे उनके योगदान को हम नही नकार सकते है। हम नेहरू का भारत में हैवी इंडस्ट्री और तकनिकी शिक्षा के प्रति उनकी संकल्पता को भी नही नकार सकते है।
    मेरा मानना है इस सब को लेकर उनकी नियत तो अच्छी थी लेकिन उसके साथ उनकी समाजवाद को लेकर रोमानियत और उसके साथ अपने को विश्व नेता माने जाने के अहंकारोन्माद व भारत के स्वयंभू विश्व गुरु होने के मुगालते ने उन्हें बर्बाद कर दिया। उनकी आँख में भारत का चश्मा न हो कर योरप का चश्मा था जिसने भारतीयता को पुरातनपंथी समझ कर तिरस्कार किया वही प्रगतिशीलता के नाम पर पाश्चात्य की बौद्धिकता को न स्वयं अपनाया बल्कि उसको भारत की नीव में जड़े भी दी। नेहरू अपनी महिमामंडल से इतने आसक्त हो गये थे के वे खुद अपने से बेहद मुहब्बत करने लगे थे।
    नेहरू ने स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस के आदर्शवाद के चरित्र को ही केंचुल की तरह उतार फेका था। गांधी जी जब मरे थे तब वह कोई भी सम्पति अपने किसी उत्तराधिकारी की लिये नही छोड़ गये थे, यही हाल सरदार पटेल जी का था। जब वह मरे थे तो उनकी विरासत में 2 धोती कुरता और कुछ बर्तन थे। लेकिन नेहरू, लेनिन, स्टेलिन वामपंथियो की तरह वर्गविहीन समाज में अलग वर्ग का प्रधानित्व करने लग गये थे। उन्होंने बाकायदा अपनी वसीयत की और सब कुछ अपनी बेटी के नाम कर गये। नेहरू स्वतंत्रता के संघर्ष काल के अग्रिम पंक्ति के अकेले ऐसा नेता थे जो देश को न देकर अपना सब कुछ अपने बच्चे को देकर गये थे।
    नेहरू ने स्वतंत्रता के तुरंत बाद धर्मनिरपेक्षिता के नाम पर मुस्लिम अपीसमेंट को भारत के शासन तंत्र का ध्रुव बनाया जिसने हिन्दू बहुल राष्ट्र में हिंदुत्व ही हीनता का शिकार हो गयी है।
    नेहरू ने राजनैतिक लाभ के लिये मुस्लिम वोट बैंक का निर्माण किया जिसने भारतीय समाज को ऐसे असाध्य बीमारी से ग्रसित कर दिया है जिसका बिना रक्तपात के इलाज की संभवना क्षीण लगती है।
    नेहरू ने भारतीय राजनीती में वंशागत परिवार को बढ़ाने का सूत्रपात किया था। नेहरू ने भारत की राजनीती में होने वाले भृष्टाचार पर सबसे पहले अपनी आँखे मूंदी थी। उनके ही सगे दामाद फिरोज गांधी( गांधी नाम नेहरू ने दिया था वो कोई गुजरती हिन्दू नही था),ने उन पर भृष्टाचार को प्रश्य देने का इलज़ाम लगाया था। नेहरू ने ही सबसे पहले विदेशो से मिले उपहारों को राष्ट्र को समर्पित न कर के, व्यक्तिगत उपयोग और राजकीय कोष में जमा न करने की परम्परा शुरवात की थी।
    नेहरू, जैसे गांधी जी को महात्मा पुकारा गया और वह मान लिये गये, उसी तरह जवाहर लाल नेहरू को भी, विश्व का शांति दूत और महान नेता हो जाने का यकीन था और वह इस विश्वास में इतने वाहियात हो गये थे की जब चीन उनको, सीमा के विवाद को लेकर बार बार समझा रहा था तब वह पंचशील समझौते की बात कर रहे थे और अपने मित्र मेनन, जो एक अंग्रेजदां वामपंथी था उसे देश का रक्षामंत्री बनाये रक्खे हुये थे।
    खैर जो है वो तो है ही है, नेहरू ने जहाँ मेरे भारत के लिये कुछ अच्छा किया वही उन्होंने उससे ज्यादा भारत का बुरा भी किया जो आज हमारे सामने परलिक्षित है। उनको आज अमर्यादित बाते कही जारही है वह पूरी तरह इसके भागी है क्यूंकि लोकतंत्र में रजवाड़ो की तर्ज़ पर, वंशगत उत्तराधिकारी को जंत्रांतिक वैधानिकता उन्होंने ही प्रदान की है। नेहरू की सहमति से, नेहरू की कांग्रेस ने भारत के जनमानस में यह अच्छी तरह बात बैठा दी थी की वह शासक है और उनके परिवार का, उनपर शासन करने का पहले अधिकार है और उसी मानसिकता से नेहरू का खानदान आज तक अपने को नहीं निकाल पाया है।
    आज नेहरू का जन्मदिवस कोई हर्षोउल्लाह्स नही लाता है सिर्फ पीड़ा दे जाता है।
    #pushkerawasthi

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  17. सिकंदर हयात

    Shesh Narain Singh
    Yesterday at 11:51 ·
    जवाहरलाल नेहरू का जन्मदिन है आज
    महात्मा गांधी , नेहरू और सरदार पटेल की साझा समझ ने कश्मीर को भारत का हिस्सा बनाया
    शेष नारायण सिंह
    देश में नेताओं और बुद्धिजीवियों का एक वर्ग जवाहरलाल नेहरू को बिलकुल गैर ज़िम्मेदार राजनेता मानता रहा है . मौजूदा सरकार में इस तरह के लोगों की संख्या बहुत ज्यादा है . नेहरु की नीतियों की हर स्तर पर निंदा की जा रही है . जवाहरलाल ने तय कर रखा था कि कश्मीर को भारत से अलग कभी नहीं होने देगें लेकिन अदूरदर्शी नेताओं को नेहरू अच्छे नहीं लगते थे . जम्मू-कश्मीर की मौजूदा सरकार में भी ऐसे लोग हैं जो हालांकि भारत के संविधान की बात करते हैं लेकिन भारत की एकता और अखण्डता के नेहरूवादी ढांचे को नामंजूर कर देते हैं .जम्मू-कश्मीर की मौजूदा सरकार में कुछ ऐसे लोग हैं जो पाकिस्तान परस्त अलगाव वादियों से दोस्ती के रिश्ते रखते हैं और कुछ ऐसे लोग है जो १९४६-४७ में कश्मीर के राजा हरि सिंह के समर्थकों के राजनीतिक वारिस हैं . यह लोग हर क़दम पर गलतियाँ कर रहे हैं और जब भी गड़बड़ होती है ,केंद्र सरकार से फ़रियाद करते हैं कि मामलों में दख़ल दो. केंद्रीय हस्तक्षेप के कारण ही कश्मीर की यह दुर्दशा हुयी है . आज की सत्ताधारी पार्टी बीजेपी है . यह जब भी विपक्ष में रही है , कश्मीर में संविधान के आर्टिकिल ३७० का विरोध करती रही है लेकिन जब भी सत्ता में आती है उससे अपने को अलग कर लेती है और नेहरू की लाइन को मानने लगती है .
    जम्मू-कश्मीर के राजा हरि सिंह को सरदार पटेल में औकात बताई थी और २६ अक्तूबर १९४७ को उससे विलय दस्तावेज़ पर वी पी मेनन को भेजकर दस्तखत करवा लिया था . जम्म-कश्मीर के मामलों में सरदार के उस हस्तक्षेप ने दक्षिण और मध्य एशिया की भावी राजनीति की दिशा तय कर दी थी . लेकिन उसके बाद हमने देखा है जब भी जम्मू-कश्मीर में केंद्रीय हस्तक्षेप हुआ है , नतीजे भयानक हुए हैं . शेख अब्दुल्ला की १९५३ की सरकार की बर्खास्तगी हो या फारूक अब्दुल्ला को हटाकर गुल शाह को मुख्यमंत्री बनाने की बेवकूफी, केंद्र की गैर ज़रूरी दखलंदाजी के बाद कश्मीर में हालात हर बार खराब होते हैं . कश्मीर में केन्द्रीय दखल के नतीजों के इतिहास पर नज़र डालने से तस्वीर और साफ़ हो जायेगी. जम्मू-कश्मीर की जनता हमेशा से ही बाहरी दखल को अपनी आज़ादी में गैरज़रूरी मानती रही है . इसी रोशनी में यह भी समझने की कोशिश की जायेगी कि जिस कश्मीरी अवाम ने कभी पाकिस्तान और उसके नेता मुहम्मद अली जिन्नाह को धता बता दी थी और जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन राजा की पाकिस्तान के साथ मिलने की कोशिशों को फटकार दिया था, और भारत के साथ विलय के लिए चल रही शेख अब्दुल्ला की कोशिश को अहमियत दी थी , आज वह भारतीय नेताओं से इतना नाराज़ क्यों है. कश्मीर में पिछले २५ साल से चल रहे आतंक के खेल में लोग भूलने लगे हैं कि जम्मू-कश्मीर की मुस्लिम बहुमत वाली जनता ने पाकिस्तान के खिलाफ भारतीय नेताओं, महात्मा गाँधी , जवाहर लाल नेहरू और जयप्रकाश नारायण को अपना रहनुमा माना था. पिछले ७० साल के इतिहास पर एक नज़र डाल लेने से तस्वीर पूरी तरह साफ़ हो जायेगी.
    देश के बँटवारे के वक़्त अंग्रेजों ने देशी रियासतों को भारत या पाकिस्तान के साथ मिलने की आज़ादी दी थी. बहुत ही पेचीदा मामला था . ज़्यादातर देशी राजा तो भारत के साथ मिल गए लेकिन जूनागढ़, हैदराबाद और जम्मू-कश्मीर का मामला विवादों के घेरे में बना रहा . कश्मीर में ज़्यादातर लोग तो आज़ादी के पक्ष में थे . कुछ लोग चाहते थे कि पाकिस्तान के साथ मिल जाएँ लेकिन अपनी स्वायत्तता को सुरक्षित रखें. इस बीच महाराजा हरि सिंह के प्रधान मंत्री ने पाकिस्तान की सरकार के सामने एक स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट का प्रस्ताव रखा जिसके तहत लाहौर सर्किल के केंद्रीय विभाग पाकिस्तान सरकार के अधीन काम करेगें . १५ अगस्त सन ४७ को पाकिस्तान की सरकार ने जम्मू-कश्मीर के महाराजा के स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया जिसके बाद पूरे राज्य के डाकखानों पर पाकिस्तानी झंडे फहराने लगे . भारत सरकार को इस से चिंता हुई और जवाहर लाल नेहरू ने अपनी चिंता का इज़हार इन शब्दों में किया.”पाकिस्तान की रणनीति यह है कि अभी ज्यादा से ज्यादा घुसपैठ कर ली जाए और जब जाड़ों में कश्मीर अलग थलग पड़ जाए तो कोई बड़ी कार्रवाई की .” नेहरू ने सरदार पटेल को एक पत्र भी लिखा कि ऐसे हालात बन रहे हैं कि महाराजा के सामने और कोई विकल्प नहीं बचेगा और वह नेशनल कान्फरेन्स और शेख अब्दुल्ला से मदद मागेगा और भारत के साथ विलय कर लेगा.अगर ऐसा हो गया गया तो पाकिस्तान के लिए कश्मीर पर किसी तरह का हमला करना इस लिए मुश्किल हो जाएगा कि उसे सीधे भारत से मुकाबला करना पडेगा.अगर राजा ने इस सलाह को मान लिया होता तो कश्मीर समस्या का जन्म ही न होता..इस बीच जम्मू में साम्प्रदायिक दंगें भड़क उठे थे . बात अक्टूबर तक बहुत बिगड़ गयी और महात्मा गाँधी ने इस हालत के लिए महाराजा को व्यक्तिगत तौर पर ज़िम्मेदार ठहराया .पाकिस्तान ने महाराजा पर दबाव बढाने के लिए लाहौर से आने वाली कपडे, पेट्रोल और राशन की सप्लाई रोक दी. संचार व्यवस्था पाकिस्तान के पास स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट के बाद आ ही गयी थी. उसमें भी भारी अड़चन डाली गयी.. हालात तेज़ी से बिगड़ रहे थे और लगने लगा था कि अक्टूबर १९४६ में की गयी महात्मा गाँधी की भविष्यवाणी सच हो जायेगी. महात्मा ने कहा था कि अगर राजा अपनी ढुलमुल नीति से बाज़ नहीं आते तो कश्मीर का एक यूनिट के रूप में बचे रहना संदिग्ध हो जाएगा.
    राजा की गलतियों के कारण ही कश्मीर का मसला बाद में संयुक्त राष्ट्र में ले जाया गया जिसके कारण भारत की सरकार खूब पछताई और आज तक उसका पछतावा है . उसके बाद बहुत सारे ऐसे काम हुए कि अक्टूबर १९४७ वाली बात नहीं रही. संयुक्त राष्ट्र में एक प्रस्ताव पास हुआ कि कश्मीरी जनता से पूछ कर तय किया जाय कि वे किधर जाना चाहते हैं . भारत ने इस प्रस्ताव का खुले दिल से समर्थन किया लेकिन पाकिस्तान वाले भागते रहे , शेख अब्दुल्ला कश्मीरियों के हीरो थे और वे जिधर चाहते उधर ही कश्मीर जाता . लेकिन १९५३ के बाद यह हालात भी बदल गए. . बाद में पाकिस्तान जनमत संग्रह के पक्ष में हो गया और भारत उस से पीछा छुडाने लगा . इन हालात के पैदा होने में बहुत सारे कारण हैं.बात यहाँ तक बिगड़ गयी कि शेख अब्दुल्ला की सरकार बर्खास्त की गयी, और शेख अब्दुल्ला को ९ अगस्त १९५३ के दिन गिरफ्तार कर लिया गया.उसके बाद तो फिर वह बात कभी नहीं रही. बीच में राजा के वफादार नेताओं की टोली जिसे प्रजा परिषद् के नाम से जाना जाता था, ने हालात को बहुत बिगाड़ा . अपने अंतिम दिनों में जवाहर लाल ने शेख अब्दुल्ला से बात करके स्थिति को दुरुस्त करने की कोशिश फिर से शुरू कर दिया था. ६ अप्रैल १९६४ को शेख अब्दुल्ला को जम्मू जेल से रिहा किया गया और नेहरू से उनकी मुलाक़ात हुई. शेख अब्दुल्ला ने एक बयान दिया जिसे , कश्मीरी मामलों के जानकार बलराज पुरी ने लिखा था . शेख ने कहा कि उनके नेतृत्व में ही जम्मू कश्मीर का विलय भारत में हुआ था . वे हर उस बात को अपनी बात मानते हैं जो उन्होंने अपनी गिरफ्तारी के पहले ८ अगस्त १९५३ तक कहा था. नेहरू भी पाकिस्तान से बात करना चाहते थे और किसी तरह से समस्या को हल करना चाहते थे.. नेहरू ने इसी सिलसिले में शेख अब्दुल्ला को पाकिस्तान जाकर संभावना तलाशने का काम सौंपा.. शेख गए . और २७ मई १९६४ के ,दिन जब पाक अधिकृत कश्मीर के मुज़फ्फराबाद में उनके लिए दोपहर के भोजन के लिए की गयी व्यवस्था में उनके पुराने दोस्त मौजूद थे, जवाहरलाल नेहरू की मौत की खबर आई. बताते हैं कि खबर सुन कर शेख अब्दुल्ला फूट फूट कर रोये थे. नेहरू के मरने के बाद तो हालात बहुत तेज़ी से बिगड़ने लगे . कश्मीर के मामलों में नेहरू के बाद के नेताओं ने कानूनी हस्तक्षेप की तैयारी शुरू कर दी,..वहां संविधान की धारा ३५६ और ३५७ लागू कर दी गयी. इसके बाद शेख अब्दुल्ला को एक बार फिर गिरफ्तार कर लिया गया. इस बीच पाकिस्तान ने एक बार फिर कश्मीर पर हमला करके उसे कब्जाने की कोशिश की लेकिन पाकिस्तानी फौज ने मुंह की खाई और ताशकेंत में जाकर रूसी दखल से सुलह हुई. .
    कश्मीर की समस्या में इंदिरा गाँधी ने भी हस्तक्षेप किया , शेख साहेब को रिहा किया और उन्हें सत्ता दी. . उसके बाद जब १९७७ का चुनाव हुआ तो शेख अब्दुला फिर मुख्य मंत्री बने . १९७७ का जनता पार्टी के राज में हुआ विधान सभा चुनाव बहुत ही निष्पक्ष चुनाव माना जाता है .शेख की मौत के बाद उनके बेटे फारूक अब्दुल्ला को मुख्य मंत्री बनाया गया. लेकिन अब तक इंदिरा गाँधी बहुत कमज़ोर हो गयी थीं , एक बेटा खो चुकी थीं और उनके फैसलों को प्रभावित किया जा सकता था . अपने परिवार के करीबी , अरुण नेहरू पर वे बहुत भरोसा करने लगी थीं, . अरुण नेहरू ने जितना नुकसान कश्मीरी मसले का किया शायद ही किसी ने नहीं किया हो . उन्होंने डॉ फारूक अब्दुल्ला से निजी खुन्नस में उनकी सरकार गिराकर उनके बहनोई गुल शाह को मुख्यमंत्री बनवा दिया . गुल शाह की कोई राजनीतिक हैसियत नहीं थी, बस एक योग्यता थी कि वे शेख अब्दुल्ला के दामाद थे .यह कश्मीर में केंद्रीय दखल का सबसे बड़ा और मूर्खतापूर्ण उदाहरण माना जाता है . हुआ यह था कि फारूक अब्दुल्ला ने श्रीनगर में कांग्रेस के विरोधी नेताओं का एक सम्मलेन कर दिया .और अरुण नेहरू नाराज़ हो गए . अगर अरुण नेहरू को मामले की मामूली समझ भी होती तो वे खुश होते कि चलो कश्मीर में बाकी देश भी इन्वाल्व हो रहा है लेकिन उन्होंने पुलिस के थानेदार की तरह का आचरण किया और सब कुछ खराब कर दिया . इतना ही नहीं . कांग्रेस ने घोषित मुस्लिम दुश्मन , जगमोहन को जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल बनाकर भेज दिया . उसके बाद तो हालात बिगड़ते ही गए. उधर पाकिस्तानी राष्ट्रपति जनरल जिया उल हक लगे हुए थे. उन्होंने बड़ी संख्या में आतंकवादी कश्मीर घाटी में भेज दिया . बची खुची बात उस वक़्त बिगड़ गयी . जब १९९० में वी पी सिंह के काल में तत्कालीन गृह मंत्री, मुफ्ती मुहम्मद सईद की बेटी का पाकिस्तानी आतंकवादियों ने अपहरण कर लिया यही दौर है जब कश्मीर में खून बहना शुरू हुआ . और आज हालात जहां तक पंहुच गए हैं किसी की समझ में नहीं आ रहा है कि वहां से वापसी कब होगी.
    इस तरह से हम देखते हैं कि कश्मीर के मामले में पिछले ७० वर्षों में बार बार केंद्रीय हस्तक्षेप हुआ है लेकिन सच्चाई यही है कि कश्मीर के बारे में नेहरू की सोच ही सही साबित होती रही है और रास्ता बातचीत का ही है जिसको मौजूदा गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने शुरू किया और अब एक अफसर को पूरी ताक़त देकर भेजा गया है. उम्मीद की जानी चाहिए कि नेहरू और पटेल की कश्मीर नीति को गरियाने वाले कुछ समय शांत रहेंगे और हालात को सामान्य बनाने में अपना शांत योगदान करेंगे .Shesh Narain Singh

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  18. सिकंदर हयात

    Rajiv Tiwari13 November at 21:56 · जब जवाहरलाल नेहरू ने 3 सितंबर 1946 को अंतरिम सरकार में शामिल होने का फैसला किया तो उन्होंने आनंद भवन को छोड़ कर अपनी सारी संपत्ति देश को दान कर दी.नेहरू को पैसे से कोई खास लगाव नहीं था. उनके सचिव रहे एम ओ मथाई अपनी किताब रेमिनिसेंसेज़ ऑफ़ नेहरू एज में लिखते हैं कि 1946 के शुरू में उनकी जेब में हमेशा 200 रुपए होते थे, लेकिन जल्द ही यह पैसे ख़त्म हो जाते थे क्योंकि नेहरू यह रुपए पाकिस्तान से आए परेशान शरणार्थियों में बांट देते थे.
    ख़त्म हो जाने पर वह और पैसे मांगते थे. इस सबसे परेशान हो कर मथाई ने उनकी जेब में रुपए रखवाने ही बंद कर दिए.
    लेकिन नेहरू की भलमनसाहत इस पर भी नहीं रुकी. वह लोगों को देने के लिए अपने सुरक्षा अधिकारी से पैसे उधार लेने लगे.
    ईमानदारी की मिसाल
    मथाई ने एक दिन सभी सुरक्षा अधिकारियों का आगाह किया कि वह नेहरू को एक बार में दस रुपए से ज़्यादा उधार न दें.
    मथाई नेहरू की इस आदत से इतने आजिज़ आ गए कि उन्होंने बाद में प्रधानमंत्री सहायता कोष से कुछ पैसे निकलवा कर उनके निजी सचिव के पास रखवाना शुरू कर दिए ताकि नेहरू की पूरी तनख़्वाह लोगों को देने में ही न खर्च हो जाए.
    जहाँ तक सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी का सवाल है जवाहरलाल नेहरू का कोई सानी नहीं था.
    जाने-माने पत्रकार कुलदीप नय्यर ने एक ऐसी बात मुझे बताई जिसकी आज के युग में कल्पना नहीं की जा सकती. कुलदीप ने कुछ समय के लिए नेहरू के सूचना अधिकारी के तौर पर काम किया था.
    नेहरू शरणार्थियों की हरसंभव मदद करने की कोशिश करते थे

    नेहरू की बहन विजय लक्ष्मी पंडित के शौक बहुत ख़र्चीले थे. एक बार वह शिमला के सर्किट हाउस में ठहरीं. वहाँ रहने का बिल 2500 रुपए आया.

    वह बिल का भुगतान किए बिना वहाँ से चली आईं. तब हिमाचल प्रदेश नहीं बना था और शिमला पंजाब का हिस्सा होता था. तब भीमसेन सच्चर पंजाब के मुख्यमंत्री होते थे.

    उनके पास राज्यपाल चंदूलाल त्रिवेदी का पत्र आया कि 2500 रुपये की राशि को राज्य सरकार के विभिन्न खर्चों के तहत दिखला दिया जाए. सच्चर के गले यह बात नहीं उतरी.

    उन्होंने विजय लक्ष्मी पंडित से तो कुछ नहीं कहा लेकिन झिझकते हुए नेहरू को पत्र लिख डाला कि वही बताएं कि इस पैसे का हिसाब किस मद में डाला जाए. नेहरू ने तुरंत जवाब दिया कि इस बिल का भुगतान वह स्वयं करेंगे.

    उन्होंने यह भी लिखा कि वह एक मुश्त इतने पैसे नहीं दे सकते इसलिए वह पंजाब सरकार को पांच किश्तों में यह राशि चुकाएंगे. नेहरू ने अपने निजी बैंक खाते से लगातार पांच महीनों तक पंजाब सरकार के पक्ष में पांच सौ रुपए के चेक काटे.

    शोर मचाने वाला पंखा

    नेहरू सोलह शयन कक्षों के तीन मूर्ति भवन में रहते ज़रूर थे लेकिन वहाँ भी सादगी से रहने पर ही ज़ोर रहता था. उनके शयन कक्ष में एयरकंडीशनर नहीं था.

    गर्मी के दिनों में जब वह दिन के भोजन के लिए तीन मूर्ति भवन आते थे तो मुख्य बैठक के सोफ़े पर बैठ कर आराम करते थे. वहाँ पर आगंतुकों के आराम के लिए एयरकंडीशनर लगा हुआ था. इसके बाद वह थोड़ी देर लेटने के लिए अपने शयन कक्ष में चले जाते थे.

    उनके बड़े से शयन कक्ष में छत के पंखे के अलावा एक बहुत पुराना टेबल फ़ैन लगा हुआ था जो बहुत आवाज़ करता था. एक दिन इंदिरा गाँधी की सचिव उषा भगत ने नेहरू की देखभाल करने वाले शख़्स से कहा कि इस पंखे को तुरंत बदल दीजिए.पंखा बदल दिया गया.

    दूसरे दिन नेहरू का अर्दली दौड़ा हुआ उषा भगत के पास आया कि उन्होंने नया पंखा देखकर कोहराम मचा दिया है. अंतत: नेहरू पुराने शोर मचाने वाले पंखे को दोबारा लगवा कर ही माने.

    कैडलक कार

    नेहरू ने विदेशी दौरे में भेंट मिली कार राष्ट्रपति के वीआईपी कार बेड़े में शामिल करवा दी

    1956 में नेहरू सऊदी अरब की राजकीय यात्रा पर गए. उन्हें रियाद में शाह सऊद के महल में ठहराया गया. उनके दल के सदस्य के हर बाथरूम में शैनल 5 परफ़्यूम की एक बड़ी बोतल रखी गई.

    नेहरू रात में कोई किताब पढ़ना चाहते थे, इसलिए उन्होंने पूछा कि क्या उनके कमरे में टेबिल लैंप लगाया जा सकता है ?

    महल के लोगों ने समझा कि शायद कमरे में रोशनी पर्याप्त नहीं है. इसलिए अगले दिन नेहरू के कमरे में और तेज़ रोशनी वाला लैंप और बल्ब लगा दिया गया. उसकी चमक को कम करने के लिए नेहरू के साथ गए मोहम्मद यूनुस ने उसके चारों तरफ कपड़ा लपेट दिया.

    रोशनी तो कम हो गई लेकिन उससे निकलने वाली गर्मी ने कपड़े को करीब करीब जला ही दिया.

    जब नेहरू वहां से वापस आने लगे तो शाह सऊद ने उनके लिए एक कैडलक कार और उनके दल के सदस्यों के लिए स्विस घड़ियाँ उपहार में भिजवाईं.

    नेहरू इससे थोड़ा असहज हो गए. वह नहीं चाहते थे कि वह विदेशी दौरे से कार उपहार में ले कर लौंटे.

    मोहम्मद यूनुस उनकी परेशानी समझ गए. उन्होंने कहा, ‘इनके पास और क्या है? अगर मोटर न दें तो फिर क्या दें? तेल का पीपा या रेत का बोरा?’ नेहरू इस पर ज़ोर से हंसे. उन्होंने कार का तोहफ़ा स्वीकार कर लिया और शाह सऊद को अपना धन्यवाद भिजवाया.

    शाह जानना चाहते थे कि नेहरू को कार के लिए कौन सा रंग पसंद है. वैसे उन्होंने पहले से ही उनके लिए हरे रंग की कैडलक पसंद कर रखी थी.

    नेहरू ने कहा आपकी पसंद मेरी पसंद. भारत आते ही उन्होंने यह कार राष्ट्रपति भवन के वीआईपी कार बेड़े में शामिल करवा दी.

    57 साल पहले भेंट दी गई यह कार आज भी राष्ट्रपति भवन के कार बेड़े में मौजूद है.

    हाज़िरजवाबी

    बहुत व्यस्त होने के बावजूद वह अपने दोस्तों की चुटकियां लेने से पीछे नहीं हटते थे. एक बार नाश्ते की मेज़ पर नेहरू छूरी से सेब छील रहे थे.

    इस पर उनके साथ बैठे रफ़ी अहमद किदवई ने कहा कि आप तो छिलके के साथ सारे विटामिन फेंके दे रहे हैं. नेहरू सेब छीलते रहे और सेब खा चुकने के बाद उन्होंने सारे छिलके रफ़ी साहब की तरफ बढ़ा दिए और कहा, “आपके विटामिन हाज़िर हैं. नोश फ़रमाएं.”

    1962 के भारत- चीन युद्ध के बाद नेहरू की इस चंचलता को ग्रहण लग गया. उनकी आँखों की चमक न जाने कहाँ चली गई. वह अपने आप में घुटने लगे.’नेहरू जीवित हैं’
    नेहरू की सादगी और ईमानदारी की दूसरी मिसाल मिलना बेहद मुश्किल
    27 मई ,1964 को सुबह नौ बजे जाने माने लेखक और ब्ल्टिज़ के स्तंभकार ख़्वाजा अहमद अब्बास का फ़ोन बजा. ब्लिट्ज़ के संपादक रूसी करंजिया लाइन पर थे.
    ‘हेलो अहमद.’
    ’गुड मॉर्निंग रूसी.’
    ‘कुछ बहुत खराब या तो हो चुका है या होने जा रहा है.’ अब्बास ने पूछा नेहरू ठीक ठाक तो हैं.
    करंजिया ने कहा नहीं उनको एक और स्ट्रोक हुआ है. तुम तुरंत दफ़्तर आ जाओ. तुम्हें उन पर चार पेज का फ़ीचर लिखना है.
    जैसे ही अब्बास ब्ल्टिज़ के दफ़्तर पहुंचे करंजिया ने कहा तुम्हारे पास नेहरू के ऊपर लेख लिखने के लिए चार घंटे हैं.
    ख़्वाजा अहमद अब्बास ने लिखना शुरू किया. आर्ट विभाग का एक व्यक्ति उनके पास आ कर कहने लगा, ‘पहले हेडलाइन लिखिए ताकि मैं उस पर काम करना शुरू कर दूँ.’
    अब्बास ने कांपते हाथों से लिखा….. नेहरू… थोड़ी देर सोचा और फिर लिखा…. लिव्स. दो बजे नेहरू का देहांत हो गया. अगले दिन ब्ल्टिज़ की तीन इंच की बैनर हेड लाइन थी….. नेहरू लिव्स..)————————————————————Nitin Thakur
    5 hrs ·
    ये अमित मालवीय है. बीजेपी आईटी सेल का हेड. नेहरू की इन तस्वीरों का कोलाज लगाकर उसने क्या साबित किया वो आप पढ़ सकते हैं. मालवीय नेहरू को चरित्रहीन प्रमाणित करना चाहता है और साथ ही संदिग्ध सीडी का सहारा लेकर हार्दिक का चरित्र हनन भी कर रहा है. मोदी जी अगर छप्पन इंच का सीना रखते हैं तो अपने सोशल मीडिया योद्धा मालवीय के मन की बात मंच से कह कर दिखा दें.Ashok Kumar Pandey दो में वह अपनी “नन्हीं” विजयालक्ष्मी पंडित के साथ हैं। एक में उनकी बिटिया है।
    ये किस भारतीय संस्कृति के रखवाले हैं जिसमें बहन और भांजी को गले से लगाना, बिटिया से कम उम्र की कलाकार को प्रोत्साहन देना या किसी विदेशी राजनयिक की पत्नी के सम्मान में लाइटर सुलगा देना आपत्तिजनक होता है? इतनी भयावह यौन कुंठा का इलाज़ होना चाहिए, शमन करते करते तो ये देश का कबाड़ा कर देंगे।——————————————————————————————————————————————————-जितना मेने अध्ययन किया हे तो उससे ये पता चलता हे की शायद ही किसी और ने देश और इंसानियत के चक्कर में इस कदर अपने जीवन से मिल रहे प्रेम सेक्स और आकर्षण का बलिदान किया हो त्याग किया हो जानबूझ कर छोड़ा हो जितना नेहरू ने किया महिलाये नेहरू पर फ़िदा थी ज़ाहिर हे एक इतना वीर विद्वान बेखोफ ईमानदार सादगी पसंद रोचक विश्वनेता जननेता जाहिर हे की बहुत स्त्रियाँ नेहरू को चाहती थी मगर देश के लिए इंसानियत के लिए काम जेल आंदोलन फिर बीवी की लम्बी बीमारी फिर एक नए देश का निर्माण के लिए काम फिर बेटी को देखते हुए दूसरी शादी ना करना वास्तव में नेहरू जितने प्रेम आकर्षण और सेक्स के हक़दार थे उसका दस % भी उन्हें नहीं मिला होगा क्योकि उन्होंने त्याग दिया था

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  19. सिकंदर हयात

    Arun Maheshwari
    12 hrs ·
    इंदिरा गांधी होने का मतलब
    कल से इंदिरा गांधी का जन्म शताब्दी वर्ष शुरू होगा ।
    अपने लगभग पंद्रह साल के प्रधानमंत्रित्व (1966-1977 ; 1980-1984) के दौरान शुरू से ही उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा ।
    शुरू में कांग्रेस दल के अंदर के सिंडिकेट धड़े के दबाव आए। इंदिरा ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण और राजाओं के प्रिवि पर्स को ख़त्म करके व्यापक जन समर्थन के बल पर उन्हें पूरी तरह निरस्त कर दिया ।
    फिर बांग्लादेश के मुक्ति युद्ध के समय मुक्ति योद्धाओं को सैनिक सहायता दे कर और सीधे भारतीय सेना को उतार कर उसने धर्म पर आधारित राष्ट्र की थिसिस को खारिज कर दिया । इसमें भी जनता का उसे भरपूर समर्थन मिला ।
    इस प्रकार अपने प्रारंभिक उठान के दौर में ही इंदिरा गांधी ने व्यापक जन-समर्थन से बड़े-बड़े कदम उठाए । लेकिन इसी दौर में उनकी छवि को जीवन से इतना बड़ा बना दिया गया जिसके चलते उनमें एक तानाशाह की प्रवृत्ति पैदा हुई और 1975 में उन्होंने आंतरिक आपातकाल के जरिये सारी सत्ता को अपने हाथ में ले लिया । 1977 में वे बुरी तरह पराजित हुई ।
    लेकिन इसके साथ ही फिर इंदिरा ने जनता की ओर रुख़ किया । जनता पार्टी की सरकार अपने अन्तर्विरोधों के कारण अढ़ाई साल में ही गिर गई और 1980 में फिर इंदिरा गांधी सत्ता पर आ गई ।
    1980 में सत्ता पर आने के बाद ही उनके लिये बड़ी चुनौती पैदा हुई पंजाब में सिख आतंकवाद की । इंदिरा ने ऑपरेशन ब्लू स्टार (जून 1984) के जरिये अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में सेना भेज कर उसे जड़ से उखाड़ दिया, लेकिन इसकी उन्हें बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ी । चार महीने बाद ही 31 अक्तूबर 1984 के दिन उनके दो सिख सुरक्षाकर्मियों ने उनकी हत्या कर दी ।
    गौर करने की बात है कि इंदिरा गांधी ने पूरे राजनीतिक जीवन में बार-बार जनता के बीच से अपने लिये शक्ति हासिल की और बड़े से बड़े फैसले के वक्त भी कभी अस्थिरता और अनिर्णय का परिचय नहीं दिया । 1971 में पाकिस्तान को बुरी तरह से पराजित करने के बाद भी इंदिरा गांधी में कोई अति-उत्साह नहीं देखा गया और न ही इसके पहले बैंकों के राष्ट्रीयकरण और प्रिवि पर्स की समाप्ति के वक्त उन्होंने कोई उछल-कूद की । आपरेशन ब्लु स्टार का निर्णय लेते समय भी वे पूरी तरह से धीर-स्थिर बनी रही ।
    इंदिरा गांधी की तुलना में जब हम आज के प्रधानमंत्री मोदी को रखते हैं, मोदी के चरित्र का उथलापन, उसकी अगंभीरता और विवेकशून्यता जैसे निपट नंगे रूप में हमारे सामने दिखाई देने लगते हैं । मोदी हमेशा जनता से युद्ध की मुद्रा में रहते हैं, आम लोगों को सता कर ख़ुश होते हैं । इन्होंने सामान्य लोगों को चोर बताते हुए उन्हें दंडित करने के लिये नोटबंदी और विकृत जीएसटी की तरह के कदम उठाए । इसी प्रकार, इंदिरा के विपरीत, चंद बड़े लोगों के लिये मोदी सरकार के ख़ज़ाने की झोली खोल कर खड़े दिखाई देते हैं । मोदी बोलते ज्यादा और काम कम करते हैं । अमेरिका सहित विदेशी राष्ट्राध्यक्षों को गले लगाने की इनकी आतुरता आँखों को और भी चुभने वाली होती है ।
    मोदी सिर्फ साढ़े तीन साल के शासन के बाद ही हाँफने लगे हैं । आज स्थिति इतनी बदतर है कि 2019 के पहले ही उन्हें गद्दी छोड़ कर राजनीति के किसी उपेक्षित कोने में दुबक कर बैठना पड़ सकता है । इसीलिये वे अमेरिकी प्राइवेट एजेंसियों से अपने और अपनी सरकार के लिये प्रमाण पत्र जुटाते हैं । वास्तविकता यह है कि जनता के बीच मोदी की कोई साख नहीं बची है और काला धन आदि के विरुद्ध इनकी सारी बातें लोगों को कोरी चकमेबाजी लगने लगी है ।
    इंदिरा ने सिख आतंकवाद पर निर्णायक प्रहार किया और मोदी हिंदू आतंकवादी ताकतों को बढ़ावा दे रहे हैं ।Arun Maheshwari

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