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बिहार के मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी द्वारा एक सार्वजनिक कार्यक्रम में सवर्णों को विदेशी बताए जाने का मुद्दा गरमाया हुआ है। जीतन राम मांझी पहले नेता नहीं हैं जो जातिगत उत्पीडऩ की वजह बहिरागत आर्यों को मानते हैं। साथ ही वर्ण व्यवस्था को सामाजिक उपनिवेश वाद करार देते हैं। एक समय बहुजन समाज पार्टी भी इसी थ्योरी पर काम करती थी। जिसने सत्ता के शिखर तक पहुंचने के बाद अपने रंग ढंग बदलकर हाथी नहीं गणेश है ब्रह्म्ïाा विष्णु महेश है का नारा लगाना शुरू कर दिया। इसके बावजूद बसपा से छिटके तमाम नेताओं ने छोटे-छोटे राजनीतिक गुट बना रखे हैं जो अभी भी विदेशी सवर्णों को खदेड़कर मूल भारतीयों को देश की सत्ता पर अपना कब्जा करने के लिए उकसाते रहते हैं। मांझी के बयान पर भाजपा बेहद प्रतिक्रियाशील है। उनके बयान में तथ्यात्मक सच्चाई है या नहीं यह एक अलग मुद्दा है लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि हिंदू समाज में कई ऐसी धार्मिक परंपराएं व विधान प्रचलित हैं जो यह जताते हैं कि सवर्ण वंचित समुदाय के प्रति वर्ग शत्रु का नजरिया रखते हैं। इन परंपराओं में विजेता कौम द्वारा विजित कौम के हर तरह के दमन के अधिकार को प्रतिपादित करने का भाव झलकता है। लोकतंत्र के कारण भले ही अब इन परंपराओं की खुलकर हिमायत करने में लोग हिचकने लगे हों लेकिन आज भी सवर्णों में एक ऐसा कट्टरवादी तबका है जो इन परंपराओं में बिल्कुल भी सुधार नहीं चाहता और यह दिवास्वप्न देखता है कि एक दिन फिर वैसा सतयुग आएगा जब दलितों व अन्य वंचित जातियों के साथ जो कि उसकी निगाह में विजित कौमे हैं से पशुओं से भी बदतर व्यवहार बहाल हो जाएगा। हाल ही में एक शंकराचार्य के विवादास्पद बयान से भी सवर्णों के कट्टरवादी तबके की भावनाएं ध्वनित हुई थीं और तब भाजपा ने करारी प्रतिक्रिया नहीं दिखाई थी। होना यह चाहिए कि मांझी व अन्य पीडि़त वंचित नेताओं द्वारा व्यक्त की जाने वाली कटु भावनाओं पर भड़कने की बजाय एक ऐसा नया चलन बनाया जाए जिससे यह भ्रांति दूर हो सके कि वर्ण व्यवस्था में उच्च सोपान पर रहने वाले लोगों को अतीत में वंचितों के साथ हुए व्यवहार को लेकर अफसोस है और इसके माध्यम से वंचित वर्गों को यह आश्वस्त कराया जाए कि अब आगे अतीत की गलतियों की पुनरावृत्ति नहीं होगी।

जहां तक सवर्णों के विदेशी होने की धारणा का प्रश्न है इसका प्रभावी खंडन किसी सवर्ण विद्वान ने नहीं बल्कि एक दलित महापुरुष ने ही किया जिनका नाम है बाबा साहब डा. भीमराव अंबेडकर। विंडबना का विषय यह है कि अगर दलितों का वोट लेने की मजबूरी न हो तो नब्बे प्रतिशत सवर्ण उक्त खांटी अकादमिक व्यक्तित्व को देश के सबसे बड़े खलनायक के रूप में स्थापित करने में पूरी जान लगा देंगे और उन्होंने हाल तक ऐसा किया भी है वरना डा. अंबेडकर को भारत रत्न की उपाधि से नवाजने के लिए चौंतीस वर्ष का समय न लिया जाता। डा. अंबेडकर ने लिखा है कि भारत में जाति व्यवस्था जब अस्तित्व में आई उसके काफी पहले यहां आए तमाम कबीलों जिनमें द्रविड़, आर्य, सीथियंस सभी शामिल हैं के बीच रोटी बेटी के संबंध स्थापित हो चुके थे। इस तरह उनके बीच रक्त की शुद्धता का कोई मतलब नहीं बचा था। न ही उनके बीच कोई नस्लगत अलगाव है। बाबा साहब ने प्रभावी तर्कों और प्रमाणिक उद्धरणों के जरिए यह साबित किया कि दलितों और सवर्णों के बीच नस्ल का कोई अंतर नहीं है फिर भी दलितों व अन्य वंचितों के प्रति जाति व्यवस्था के नियम इतने कठोर कैसे हो गए इसका एक नहीं अनेक कारण हैं। डा. अंबेडकर ने इस बात को भी अपने साहित्य में खंडित किया है कि जाति व्यवस्था के अमानुषिक विधान किसी मनु नाम के एक व्यक्ति द्वारा प्रचलित किए गए हैं। उन्होंने कहा कि एक व्यक्ति के वश में ही नहीं था कि बड़े वर्ग के लिए इतने तिरस्कार पूर्ण नियम व व्यवस्थाएं बना सकता। ऐसा होने पर भीषण विद्रोह अवश्यंभावी था लेकिन इतिहास की चाल कुछ ऐसी दिशा में रही जिससे वर्ण व्यवस्था के कठोर होने की परिस्थितियां बनती गईं। कमाल की बात यह है कि डा. अंबेडकर ने भारतीय एकता को बल देने वाली इतनी महत्वपूर्ण निष्पत्ति प्रदान की वहीं अंबेडकर को अपना प्रेरणा पुरुष बनाने वाली बसपा के नेता शुरूआती दौर में मूल भारतीय और सत्ताधारी विदेशी भारतीयों के बीच कल्पित द्वंद्व की कथाएं कहते रहे।
पश्चिम ने सारी दुनिया में यूं ही राज नहीं किया। उन्होंने साम्राज्यवाद के विस्तार में हथियार से ज्यादा मदद प्रोपोगंडा की ली। आज भी वे हर बाहरी देश और समाज के बीच द्वंद्वात्मकता की गुंजाइश वाले बिंदुओं को उभारते रहते हैं। विभिन्न समाजों के बीच गृह युद्ध की हालत पैदा करने में उन्हें महारथ हासिल है। भारत में उन्होंने द्रविड़ प्रांतों में हिंदी के प्रति घृणा का बीजारोपण सुनियोजित प्रोपोगंडा के जरिए किया। इसी तरह आजादी के बाद तक सीआईए उन लोगों को फंडिंग करती रही जो भारत में जाति व्यवस्था के उत्तरदायी कारणों में नस्लगत द्वंद्व को सर्वोपरि मानते हैं। जाने अनजाने में सामाजिक परिवर्तन के लिए ईमानदारी से काम करने वाले लोग तक सीआईए के मोहरा बने।

इस कारण मूल भारतीय और विदेशी सवर्ण आर्यों के बीच शत्रुता की अवधारणा को खंडित करने के लिए बहुत काम करने की जरूरत है। यह काम सवर्ण उत्पीडऩ के शिकार दलित नेताओं द्वारा इस तरह की बात करने पर उन्हें अपमानित करने की हठधर्मिता दिखाने से नहीं होगा। इसके लिए बाबा साहब जैसी विभूति को प्रणाम करके उनके विचारों को आगे लाकर वातावरण बनाने की जरूरत है। अतीत में सवर्णों ने वंचितों के साथ जो अपराध किए हैं उनके लिए सच्चा अफसोस ही नए भारत के निर्माण की पहली शर्त है। सवर्णों को इस मामले में बड़प्पन दिखाने की जरूरत इतिहास की मांग है। भाजपा की बोली में दम कुछ इसलिए आ गया है कि अब उसका अटल बिहारी वाजपेई युग बीत चुका है और मोदी युग के शुभारंभ के साथ पुनरुत्थान वादी ताकतों को फिर से अपना राज कायम करने का संदेश प्राप्त हो रहा है। उनकी प्रतिक्रिया में इसी अहंकार की झलक है लेकिन सामाजिक दुराव मिटाने में आजादी के आंदोलन से लेकर स्वाधीन भारत के अभी तक के लंबे सफर में सवर्ण महामानवों का योगदान बेहद महत्वपूर्ण है और उम्मीद की जानी चाहिए कि सवर्णों के बीच अभी भी अपने उन पुरखों की कतारों को आगे बढ़ाने की गुंजाइश खत्म नहीं हुई है।