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80 के दशक में जब अमिताभ बच्चन की कोई भी मामूली, ऊटपटांग सी फिल्म बॉक्स आफिस पर हिट साबित होती थी तो अनेक लोगों, खासकर फिल्म समीक्षकों को बड़ी हैरत होती थी। फिर 80 का दशक बीता, 90 का बीता और नई सदी आ गई। कहा जाने लगा कि अब हिन्दी फिल्मों का दर्शक समझदार हो गया है। डिश टीवी, इंटरनेट और विदेशी फिल्मों के एक्सपोजर से उसने इतना कुछ देख लिया है कि अब वह बहुत चूजी हो गया है, इसलिए अब अगर कहानी, पटकथा में दम नहीं होता है तो वह ऐसी फिल्मों को नकार देता है। इसीलिए आजकल वैसी फिल्में भी चल जाती हैं, जिन्हें 80 के दशक में कला फिल्मों की श्रेणी में रखा जाता था

लेकिन क्या वास्तव में ऐसा ही है? पिछले कुछ सालों से वांटेड, दबंग, बॉडीगार्ड, धूम सीरीज, राउडी राठौर, हैप्पी न्यू ईयर जैसी कहानी, पटकथा, वास्तविकता, तर्कसंगता के हिसाब से बहुत ही हल्की, मगर ऊटपटांग, हास्यास्पद, बेहूदगी भरे दृश्यों के हिसाब से बेहद भारी फिल्मों की बंपर कामयाबी बताती है कि हिन्दी फिल्मों के दर्शक के मिजाज में बहुत ज्यादा बदलाव नहीं आया है। अगर बदलाव आया होता तो ऐसी खर्चीली मगर सिनेमाई दृष्टि से बेहद मामूली फिल्में इतनी बड़ी हिट कैसे साबित होतीं?

कई साल पहले जब सलमान खान की वांटेड रिलीज हुई थी तो समीक्षकों ने लिखा था काफी समय बाद टिपिकल मुंबई मसाला फिल्म की वापसी हुई है और इसे ही इस फिल्म की सफलता का बड़ा कारण माना गया था। लेकिन वांटेड के बाद तो ऐसी फिल्मों की झड़ी ही लग गई और लोग फिर भी नहीं ऊबे। हालांकि ऐसी फिल्मों की ताजी कड़ी है हैप्पी न्यू ईयर की जबरदस्कात मयाबी के बाद लोग पूछने लगे हैं कि आखिर ऐसी सामान्य सी फिल्में कैसे इतनी बड़ी हिट हो जाती हैं? इस सवाल के जवाब में कई कारण गिनाए जा सकते हैं, जो इस प्रकार हैं-

कारण एक

एक बात जो 80 के दशक में कही जाती थी, वही बात आज भी लागू हो रही है। उस समय कहा जाता था कि कहानी कुछ भी हो, लोग तो अमिताभ बच्चन को देखने जाते हैं। उस समय बच्चन एक ब्रांड बन गए थे। कहा जाता था कि एक से लेकर 10 नंबर तक अमिताभ बच्चन ही हैं। ..तो क्या आज स्थिति बदल गई है? शायद नहीं बदली है। आज एक नहीं कई-कई बच्चन हमारे सामने हैं। शाहरुख, सलमान, आमिर, अक्षय, अजय, रणवीर कपूर आदि की इतनी बड़ी फैन फॉलोइंग हो गई है कि कहानी चाहे जैसी हो, ये एक बार तो अपने पसंदीदा सितारे की फिल्म देखने जरूर जाते हैं।

कारण दो

ऐसी मसाला फिल्मों में बाकी पचड़ों में पड़ने के बजाय पैकेजिंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। एक ऐसा पैकेज जिसमें बड़े स्टार लिए जाएं, जिनकी बड़ी फैन फॉलोइंग होती है। एक ऐसा पैकेज जिसमें एक-दो ऐसे भड़कीले आइटम सांग डाले जाएं, जिनमें शामिल महिला शरीर और बोल पुरुष दर्शकों की आंखों-कानों को तर कर सकें और जिन्हें बारातों में बैंड या पार्टियों में म्यूजिक सिस्टम पर बजाया जा सके। एक ऐसा पैकेज जिसमें सस्ती कॉमेडी के साथ एक-दो ऐसे सस्ते और कैची डायलॉग डाले जाएं जो लोगों की जबान पर आसानी से चढ़ जाएं, जैसे- जब मैंने कमिटमेंट कर दी….जो मैं कहता हूं…इतने छेद करेंगे कि….। एक ऐसा पैकेज जिसमें हनी सिंह और मीका जैसे गायकों के सनसनी पैदा करने वाले बोल हों। एक ऐसा पैकेज जिसमें देशभक्ति, पारवारिक मूल्यों, दोस्ती आदि का सतही ही सही मगर ठीकठाक तड़का हो। एक बार जब ऐसा पैकेज बन जाता है तो फिर उसे तूफानी मार्केटिंग के जरिये बाजार में पेश कर दिया जाता है। लोग एक बार तो खरीद कर ले ही जाते हैं।

कारण तीन

आज की पूरी तरह व्यावसायिक फिल्मों का विज्ञापन बजट जबरदस्त हो गया है। लंच बॉक्स जैसी फिल्म के प्रचार पर केवल चार करोड़ खर्च हुए जबकि हैप्पी न्यू ईयर के प्रचार पर 50 करोड़ की रकम लगा दी गई। यानी इतनी राशि में तो एक दूसरी फिल्म बन जाए। बेशक फिल्म का प्रचार उसकी सफलता की गारंटी नहीं है, मगर जब बात केवल दो-तीन दिन या एक हफ्ते की हो और बस इतनी सी अवधि में बाजी इधर या उधर पलट जाती हो तो प्रचार भी बहुत फर्क डाल देता है। प्रचार से प्रभावित होकर एक बार भी लोग फिल्म देखने आ जाएं तो उसके बाद उन्हें फिल्म बकवास भी लगे तो क्या फर्क पड़ता है। लोगों की जेब तो तब तक ढीली हो ही जाती है।

कारण चार

अपने देश में फिल्म देखना एक पिकनिक या आउटिंग की तरह है। ज्यादातर लोग खुद का मानसिक स्तर बढ़ाने या किसी समस्या पर अपनी समझ विकसित करने के लिए फिल्म देखने नहीं जाते। उनके लिए फिल्म देखने का मतलब है घर से बाहर निकलकर मूड को हल्का-फुल्का करना, भीड़भाड़ में शामिल होना, खो जाना, खाना-पीना। सिनेमाहाल में जाकर अपनी दुनिया को भूलकर एक ऐसी दुनिया में चले जाना जहां सुंदरता है, लक्जरी है, लार्जन दैन लाइफ लोग और उनका जीवन है। ऐसे में जबकि मल्टीप्लेक्स का टिकट भी भयंकर महंगा हो और एक बार में एक परिवार को एक हजार रुपये तक की चपत लग जाती हो तो ज्यादातर लोग किसी गंभीर या कम पसंदीदा सितारे की फिल्म के बजाय बड़ी स्टारकास्ट का सरकस देखना ही ज्यादा पसंद करते हैं। जब घर से निकलने पर दिमाग में मौज-मस्ती करने, आनंद उठाने की बात चल रही हो तो हैप्पी न्यू ईयर जैसी फिल्म का चलना हैरतभरा नहीं लगता।

कारण पांच

बड़े सितारों और बड़े प्रॉडक्शन हाउसों की फिल्में ज्यादा स्क्रीन हासिल करने की वजह से भी बड़ी हिट साबित हो जाती हैं। यशराज जैसे बड़े बैनर ने तो अपना खुद का वितरण नेटवर्क बना लिया है। बाकी बड़े प्रॉडक्शन हाउस भी वितरकों से टाईअप करके ज्यादा से ज्यादा स्क्रीन हासिल कर लेते हैं। आज के समय में शाहरुख या सलमान की कोई फिल्म देश में एक साथ चार हजार से ज्यादा स्क्रीन पर दिखाई जाती है, जबकि अन्य अनेक फिल्मों को पूरे देश में 200 स्क्रीन तक नसीब नहीं होते।

अब सीधा सा हिसाब है कि जो फिल्म चार-साढे चार हजार स्क्रीनों पर चल रही है तो अगर वह चार-पांच दिन भी ठीकठाक दर्शक जुटा ले गई तो वह आसानी से सौ या आगे दो सौ करोड़ के क्लब में पहुंच जाती है। चार-पांच दिन में ही हिट-सुपहहिट की आवाजें आने लगती हैं और फिल्म बनाने वाला नोटों के ढेर पर जा बैठता है। इसके बाद आलोचक चिल्लाते रहें कि क्या बकवास फिल्म है या दर्शक सोचते रहें कि वे कैसी फिल्म देखने चले गए, फिल्म वालों की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता।

पहले फिल्में अपनी रिपीट वैल्यू से चलती थीं, यानी लोग उन्हें बार-बार देखने जाते थे। आज कोई नहीं कहता कि उसने हैप्पी न्यू ईयर 20 बार देखी या धूम-3 दस बार। न ऐसा मौका आता और न इसकी जरूरत पड़ती है, क्योंकि 25-30 दिन बाद तो बड़ी से बड़ी फिल्म टीवी पर आ जाती है।

कारण छह

पहले मध्यम और निम्न मध्यम वर्ग के लोग फिल्में देखने जाते थे। इनमें भी लगभग हर आयु वर्ग के लोग फिल्में देख लेते थे। मल्टीप्लेक्स कल्चर के बाद टिकट बेहद महंगे होने और सिंगल स्क्रीन थिएटर बंद होने से निम्न मध्यम वर्ग लगभग पूरी तरह सिनेमा से दूर हो गया। अब मध्यम और उच्च मध्यम वर्ग फिल्में देख रहा है। इसमें भी पहले की तरह हर आयु के लोग नहीं हैं। इसमें युवा वर्ग की संख्या ज्यादा है। इसी बदलाव को कुछ समीक्षकों ने दर्शकों का मिजाज बदलने का नाम दे डाला।

वास्तव में मल्टीप्लेक्स कल्चर से पहले और इस कल्चर के आने के बाद में भी अच्छे सिनेमा को पसंद करने वाले लोग मौजूद रहे हैं। वे हर समय थे और अब भी हैं और रहेंगे, मगर दूसरा वर्ग यानी सिनेमा को टाइम पास समझने वाला वर्ग उन पर हमेशा से ही भारी पड़ता रहा है। पहले मध्यम और निम्न मध्यम वर्ग अपनी समस्याएं, अपने दुख भूलने सिनेमाहाल जाता था, तो आज उसकी जगह उपभोक्तावादी संस्कृति में पैदा हुए उन युवाओं ने ले ली है जो पहले से ही लोकप्रिय हो गए आइटम डांस, प्यार करने के तरीके, हीरोइन के दिलकश अंदाज, हीरो की ड्रेस, बॉडी, मसल्स आदि देखने मल्टीप्लेक्स में जाते हैं।

कारण सात

अभी तक जो भी फिल्में पैसे कमाने के हिसाब से ब्लॉकबस्टर साबित हुई हैं, उनमें से ज्यादातर ईद या दीवाली के वक्त रिलीज की गई हैं। ये वो समय होता है जब लोग सिनेमाहाल पर टूट पड़ते हैं। त्योहारों पर खाने-पीने और मित्रों से मिलने-जुलने के बाद ज्यादातर लोगों का तीसरा काम फिल्म देखने का ही होता है। ईद और दीवाली के बाद के एक हफ्ते में वे लोग भी फिल्म देख डालते हैं जिन्होंने पूरे सालभर फिल्म नहीं देखी होती है। परिवार को खुश रखने के लिए उन्हें ऐसा करना भी पड़ता है। दीवाली पर रिलीज होने के कारण ही हैप्पी न्यू ईयर भारतीय सिनेमा में अब तक की सबसे अच्छी ओपनिंग देने वाली फिल्म बन गई।

समीक्षकों ने लिखा है कि हैप्पी न्यू ईयर में पटकथा, चरित्र चित्रण, घटनाओं के मेल, तर्कसंगतता जैसी सभी चीजों को भुला दिया गया है। निर्देशक ने केवल और केवल मनोरंजन पर अपना ध्यान केंद्रित किया है। ध्यान दीजिए कि कभी यही बातें मनमोहन देसाई की फिल्मों के लिए कही जाती थीं। हैप्पी न्यू ईयर की डायरेक्टर फराह खान का जवाब भी नहीं बदला है। वे भी मनमोहन देसाई के अंदाज में कहती हैं- मैं ऐसी फिल्म क्यों बनाऊं जो केवल दस लोगों को अपील करे और दस मिलियन लोगों को न भाए। अगर आलोचकों को मेरी फिल्म पसंद नहीं आती तो उन्हें बोरिंग फिल्म देखने दो। इसके अलावा मैं क्या कह सकती हूं।

कुल मिलाकर मसाला फिल्मों के समर्थन में बहुत सारी चीजें एकजुट हैं। इन्हें आप सिरे से खारिज नहीं कर सकते। निरी-निरी कला फिल्में यहां प्रशंसा और पुरस्कार तो पा सकती हैं, पर दर्शकों की जेब का समर्थन उन्हें नहीं मिल पाता। फिर हिन्दी सिनेमा में बदलाव क्या हुआ, जिसका जिक्र पिछले कुछ वर्षों से किया जाता रहा है?

वास्तव में बदलाव यह हुआ है कि इस दौरान अनेक ऐसी फिल्में बनाई गईं जिनमें सिनेमाई पक्ष तो प्रबल था ही, मगर साथ ही उनमें व्यावसायिकता का छौंक भी था। यानी एक संतुलन था। लगान, रंग दे बसंती, थ्री इडियट, मुन्नाभाई सीरीज, भाग मिल्खा भाग आदि के रूप में एक मिश्रित प्रकार का सिनेमा दिखाई दिया। ऐसी फिल्मों से समझदार माने जाने वाले दर्शकों का भी एक हिस्सा जुड़ा और टाइम पास करने वाला दर्शकों का भी। लेकिन नई निर्देशकों की आमद के बीच भी ऐसे निर्देशकों की कमी नहीं है, जो मसाला फिल्मों के पक्षधर हैं। ये भी कह सकते हैं कि वे ऐसी फिल्मों से अलग कुछ बना भी नहीं सकते। ठीक उसी तरह जिस तरह श्याम बेनेगल कभी हैप्पी न्यू ईयर जैसी फिल्म नहीं बना सकते। अंत में हम यही कह सकते हैं कि उत्सवधर्मी भारतीय समाज में मसाला फिल्में इतनी आसानी से अतीत की चीजें नहीं बन सकेंगी।