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अभी हाल ही में मुंबई में अखिल भारतीय मुस्लिम महिला एसोसिएशन नामक औरतों के एक संगठन ने एक सर्वे किया, और उसमें ये पाया कि सूफियों के 18 ऐसे मकबरे हैं जिनके आस्तानों पर पहले तो औरतों को प्रवेश की इजाज़त थी लेकिन अब उन स्थानों पर औरतों का दाखिला प्रतिबंधित है। इन सब मकबरों में सबसे अहम हाजी अली दरगाह है जो गैर मुसलमानों के बीच भी काफी मशहूर है। इस दरगाह पर सैकड़ों गैर मुस्लिम खासकर हिंदू हाज़िरी देते हुए देखे जा सकते हैं।

ये रिपोर्ट प्रेस के ज़रिए जारी की गई थी, जो हंगामे का कारण बनी। ये मीडिया के पूरे ध्यान के साथ बहस का ज्वलंत मुद्दा बन चुका है। अनगिनत अखबार और टीवी चैनलों ने इस बात पर ध्यान केंद्रित करना शुरू कर दिया है कि औरतें मज़ारों और मस्जिदों में क्यों नहीं दाखिल हो सकतीं?

क्या इन स्थानों पर वास्तव में औरतों का प्रवेश प्रतिबंधित है? और अगर ये मना है तो किसके आदेश से? दरअसल मुस्लिम मौलवी और मुल्ला हर समस्या में हदीस से सम्पर्क करते हैं, और अगर हदीस में कोई बात कही गई है तो वो बिना किसी आपत्ति के इसका पालन करते हैं।

वो इस बात को समझना नहीं चाहते कि क्या ये हदीस सही है, इसका कोई विशेष संदर्भ तो नहीं और पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.) ने कोई बात किसी विशेष संदर्भ में कही हो। हमारे उलमा पूरी तरह संदर्भ को नज़र अंदाज़ करते हुए सिर्फ हदीस को नक़ल कर देते हैं। कुछ उलमा के मुताबिक़ पैगंबर मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के हदीस को इकट्ठा करने से मना करने का यही कारण था, क्योंकि उन्हें पता था कि आपकी मृत्यु के बाद ये कई समस्याओं का कारण बनेंगी।

स्वाभाविक रूप से, जब मीडिया ने कुछ उलमा से औरतों के दरगाहों में प्रवेश के प्रतिबंधित होने के बारे में सवाल किया तो उन्होंने तुरंत हदीस का हवाला दिया और कहा चूंकि हमारी रवायतों में ये मना है इसलिए उन्हें इसकी इजाज़त नहीं दी जा सकती। लेकिन वास्तव में वो ये कहने में ईमानदार नहीं हैं कि ये पूरा मसला विवादास्पद है। कुछ लोग ये कहते हुए बुखारी की हदीस का हवाला देते हैं कि मज़ारो पर औरतों का प्रवेश प्रतिबंधित है जबकि कुछ लोग ये कहते हुए मुस्लिम (हदीस) का हवाला देते हैं कि इसकी पहले मनाही थी लेकिन बाद के समय में पैग़म्बरे इस्लाम ने इसकी इजाज़त दे दी थी।

दरअसल पैग़म्बरे इस्लाम ने कब्रिस्तान में औरतों के प्रवेश पर इसलिए प्रतिबंध लगा दिया था कि कुछ औरतें अपने चहेतों की कब्रों को गले लगाती थीं और ज़ोर ज़ोर से से रोती थीं। पैग़म्बरे इस्लाम ने हमेशा ज़ोर ज़ोर से रोने और छाती पीट पीट कर रोने से मना फरमाया है और गरिमापूर्ण तरीके से शोक और दुख को ज़ाहिर करने का समर्थन किया है। औरतें मर्दों से अधिक ऐसे तरीके से अपने दुखी होने का इज़हार करती थी और इसलिए पैगम्बरे इस्लाम ने मज़ारों पर औरतों को दाखिल होने से मना किया लेकिन बाद में इसकी इजाज़त दे दी अगर वो गरिमापूर्ण तरीके से मज़ारों पर हाज़िरी देती थीं।

लेकिन कई उलमा (असलाफ), जो ये समझते हैं कि औरतें कमजोर हैं और अपने आप पर क़ाबू (नियंत्रण) नहीं रख सकतीं, उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम की बाद वाली हदीस को सिरे से नज़र अंदाज़ कर दिया और औरतों के मज़रों पर प्रवेश पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी और हर उस जगह पर इसे लागू किया जहाँ जहाँ वो ऐसा कर सकते थे। पैग़म्बरे इस्लाम बहुत दयावान थे और उन्होंने विचार करने के बाद औरतों को मज़ारों पर जाने से मना फरमा दिया, लेकिन आपके कुछ मानने वालों ने इस पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी। औरतों के मज़ारों पर दाखिले पर पाबंदी की कोई और वजह नहीं है, वास्तव में मकबरों में प्रवेश और अपनों के मज़ारों पर हाज़िरी की हक़दार औरतें भी उतनी ही हैं जितने कि मर्द हैं।

एक मौलाना ने तो यहाँ तक कह दिया कि मज़ारों पर औरतों की हाज़िरी से इसलिए मना किया गया है क्योंकि जब कोई औरत दरगाह में प्रवेश करती है तो वो (सूफी लोग जो वहाँ दफ्न हैं) उन्हें बरहना (नग्न) देखते हैं। विश्वास में बेहूदगी की एक सीमा होती है। वो सूफी लोग जिन्होंने अपने जीवन में अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखा, वो अपनी मौत के बाद औरतों को देख कर कैसे उत्तेजित हो सकते हैं? मज़हब एक अफ़ज़ल व आला चीज़ है और ऐसी बेतुकी बातों को इसमें शामिल नहीं किया जाना चाहिए। इस तरह की टिप्पणी कुछ लोगों के बौद्धिक स्तर को प्रदर्शित करती है।

वास्तव में, हमने अपने आपको धर्म के उच्च मूल्यों पर स्थापित करने के बजाय अपने रुढ़िवादी विचारों के द्वारा निम्नता की ओर ले जा रहे हैं। मुझे यहाँ दुहराने की कोई ज़रूरत नहीं है कि क़ुरान ने मर्दों और औरतों दोनों को बराबर गरिमा दी है। दक्षिण एशिया में औरतों को मस्जिदों में प्रवेश करने की इजाज़त नहीं है जबकि उन्हें हर जगह जाने की इजाज़त है। उन्हें सबसे पवित्र मस्जिद काबा में जाने की इजाज़त है, जहां मर्द और औरतें एक साथ नमाज़ अदा करते हैं और एक साथ इसका तवाफ़ (चक्कर लगाना) करते हैं।

पैग़म्बरे इस्लाम ने स्पष्ट रूप से फरमाया कि अल्लाह की बंदियों को अल्लाह के घर में दाखिल होने से मत रोको, और अब हमारे उलमा मस्जिदों में दाखिल होने से उन्हें रोकते हैं। क्या ये उनकी औरतों से नफरत की वजह से नहीं है?

मैंने एक मौलाना से पूछा कि अगर औरतों पर जुमा की नमाज़ फर्ज़ (अनिवार्य) होती तो क्या औरतों को मस्जिद में जुमा की नमाज़ नहीं पढ़नी चाहिए, जैसे कि मर्द पढ़ते हैं? उन्होंने जवाब दिया कि पढ़ना चाहिए लेकिन अगर वो मस्जिद में होंगी तो दोपहर का खाना कौन बनायेगा? इन मौलाना साहब को ये भी नहीं पता है कि फतावा आलमगीरी के मुताबिक पालन पोषण के नियमों के अनुसार मर्द का ये दायित्व है कि या तो वो खुद पत्नी को पका हुआ खाना खिलाए या या बावर्ची का इंतेज़ाम करे। कुरान ने अपनी तालिमात के ज़रिए हमें यथास्थिति से ऊपर उठाने की कोशिश की है ताकि औरतें अपनी ताकत और मकाम को अच्छी तरह जान सकें, लेकिन मर्द अपने सख्त विचारों और दृष्टिकोणों की वजह से लैंगिक समानता को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं। ऐसा लगता है इससे मर्दों के अहंकार को ठेस पहुँचती है। इसलिए मर्दों ने विभिन्न तरीकों से औरतों की गरिमा को इस्लाम से पहले की सतह पर करने में कामयाब हुए हैं।

जहाँ तक औरतों के अधिकारों की बात है तो इस्लामी दुनिया में एक अवांछनीय रिकार्ड रहा है। अगर मुसलमान इस्लामी शिक्षाओं को लेकर गंभीर हैं तो ये उनके ज़रूरी है कि वो अपने आप को क़ुरान के आदर्शों के मुताबिक वाले स्तर पर ले आयें और जो औरतों का अधिकार है, उन्हें वो दिये जायें। कुरान और हदीस दोनों ने इल्म (ज्ञान) हासिल करने पर बहुत ज़ोर दिया है इसके वाबजूद हमारे उलमा ने ऐसे फतवे जारी किये हैं कि आवश्यक मज़हबी रस्मों जैसे नमाज़ वगैरह को अदा करने के लिए ज़रूरी इल्म से ज़्यादा औरतों को न दिया जाए।

ये हमारे लिए बहुत ही शर्म की बात है और हम जितनी जल्दी इन चीज़ों में सुधार करेंगे हमारे लिए उतना ही बेहतर होगा। औरतों की तालीम और उनका उच्च स्तर, हमारी प्रगति के लिए अनिवार्य शर्त है!!!