Sahir-and-Amrita

इन दिनों बॉलीवुड में पंजाबी और हिंदी में समान रूप से लोकप्रिय रहीं कथाकार और कवियत्री अमृता प्रीतम के जीवन पर फिल्म बनाने की तैयारी हो रही है। इसमें अमृता प्रीतम का किरदार सोनाक्षी सिन्हा द्वारा निभाए जाने की बात सामने आ रही है। सवाल यह है कि अमृता प्रीतम के जीवन पर फिल्म क्यों बन रही है? उनके जीवन में ऐसा क्या खास है जो बॉलीवुड वालों को लुभा रहा है? बॉलीवुड में साहित्यकारों की रचनाओं पर तो छिटपुट फिल्में बनती रही है मगर किसी साहित्यकार के जीवन पर बॉलीवुड वालों की नजर कम ही पड़ती है।

वास्तव में जितना अमृता प्रीतम का साहित्य विशिष्ट है, उतना ही उनका जीवन भी विशिष्ट रहा। इस जीवन में कई ऐसे चौंकाऊ और दिलचस्प कोण हैं कि उन्हें लेकर एक अच्छी फिल्म बनाई जा सकती है। चंद पंक्तियों में कहानी कुछ यूं है। एक बेहद खूबसूरत युवती थी। वह उतना ही खूबसूरत साहित्य भी रचती थी। वह अपने जीवन में पति के अलावा दो अन्य पुरुषों के निकट आई और इन दोनों ही अलग किस्म के पुरुषों से उसका रिश्ता भी बहुत ही अलग किस्म का रहा। ऐसा रिश्ताए जो आम जीवन में विरले ही देखने को मिलता है। शायद यही विशिष्टता मुंबइया फिल्मकारों को लुभा रही है।

फिल्म कैसी होगी, यह तो बनने के बाद ही पता चलेगा, मगर यहां बताते चलें कि अमृता प्रीतम की शादी 16 साल की उम्र में (1935) ही कर दी गई थी। उनके पति का नाम प्रीतम सिंह था, जो लाहौर के जाने-माने होजरी कारोबारी के बेटे थे। शादी से पहले उनका नाम अमृता कौर था। पति-पत्नी करीब 25 साल साथ रहे। 1960 में अमृता प्रीतम ने पति का साथ छोड़ दिया। उन दिनों अमृता प्रीतम जाने-माने साहित्यकार और गीतकार साहिर लुधियानवी की तरफ आकर्षित थीं। यह चाहत अमृता जी की आत्मकथा “रसीदी टिकट” में भी जाहिर हुई है।

कहा जाता है कि अमृता, साहिर को हद से ज्यादा चाहती थीं। एक प्रेस कान्फ्रेंस में तो उन्होंने कागज पर करीब सौ बार साहिर का नाम लिख डाला था। अमृता और साहिर के संबंध में उपलब्ध साहित्य से हमें पता चलता है कि साहिर और अमृता जब मिलते थे तो ज्यादा बोलते नहीं थे। साहिर सिगरेट से धुआं छोड़ते रहते। जब वे चले जाते तो अमृता सिगरेट के बचे हुए टुकड़े को मुंह में लगा लेती थीं। हालांकि बाद में साहिर लुधियानवी के जीवन में गायिका सुधा मल्हौत्रा का प्रवेश हुआ, जिससे अमृता प्रीतम का दिल टूट गया।

इसके बावजूद 1980 में जब हार्ट अटैक से साहिर लुधियानवी की मौत हुई तो अमृता प्रीतम ने कहा था कि जो सिगरेट उन्होंने पी, उसके धुएं में मिली वो हवा जरूर दूसरी दुनिया में पहुंचेगी और साहिर से मिलेगी। यहां बताते चलें कि साहिर को पूर्ण रूप से न अमृता ही मिल सकीं और न ही सुधा मल्हौत्रा। दोनों ही मामलों में धर्म आड़े आ गया और साहिर जीवनभर कुंवारे ही रहे।

साहिर-अमृता के प्रेम के बारे में कुछ जानकार लोगों का यह भी कहना था कि यह प्रेम अमृता की तरफ से एकतरफा प्रेम था। साहिर उन्हें प्रेम करने के बजाय दिखाने की चीज ज्यादा मानते थे। कहा जाता है कि वे अमृता को अपने दोस्तों के बीच ले जाते थे और यह जाहिर करते थे कि अमृता जैसी खूबसूरत लड़की उन पर मरती है।

इसके बाद अमृता प्रीतम के जीवन में मशहूर चित्रकार और लेखक इमरोज आए। वेस्ट पटेल नगर में इमरोज का घर अमृता प्रीतम के घर के पास ही था। इमरोज उस समय की दिल्ली में पटेल नगर से ही निकलने वाली उर्दू पत्रिका “शमा” में काम करते थे। वहीं पर कुछ मुलाकातों के बाद यह रिश्ता बना। इमरोज, अमृता प्रीतम से सात साल छोटे थे। बाद में यह रिश्ता इतना पुख्ता जुड़ा कि उसके बाद अमृता प्रीतम बिना शादी किए ही मृत्यु तक इमरोज के साथ ही रहीं। हालांकि जब अमृता प्रीतम और इमरोज ने साथ रहना शुरू किया तो अमृता को उनके पति से तलाक नहीं मिला था। उनके पति ने अलग होने के करीब 15 साल बाद उन्हें तलाक दिया।

इमरोज और अमृता प्रीतम का रिश्ता बहुत ही अलग किस्म का रिश्ता रहा। दोनों को कभी एक-दूसरे से यह कहने की जरूरत नहीं पड़ी कि वे एक-दूसरे को प्यार करते हैं। वे बस देखकर ही पहचान जाते थे कि एक-दूसरे को चाहते हैं। दोनों ने एक-दूसरे की इच्छाओं, भावनाओं को पर्याप्त जगह दी। इस रिश्ते की बुनियाद में कोई शर्त नहीं थी, शायद इसीलिए यह रिश्ता बिना शादी के भी 40 साल तक बना रहा। खुद इमरोज ने एक साक्षात्कार में बताया था कि साथ रहते हुए भी वे दोनों अलग-अलग कमरों में सोते थे क्योंकि एक रचनाकार को एकांत और समय की जरूरत होती है।

अमृता प्रीतम की बीमारी के दौरान ही इमरोज उनके कमरे में सोए। इसके अलावा अमृता प्रीतम से मिलने आने वाले लोगों को चाय-पानी भी इमरोज ही देते थे। जब अमृता प्रीतम राज्य सभा की सदस्य बनीं तो संसद भवन तक उन्हें छोड़ने भी इमरोज ही जाते थे और फिर गाड़ी को पार्किंग में लगाकर वापसी के लिए उनका इंतजार भी करते थे।

इमरोज अलग ही किस्म के इंसान हैं। उनमें कोई अहं नहीं था। इमरोज जानते थे कि अमृता साहिर लुधियानवी को चाहती थीं, मगर इससे भी उन पर कोई फर्क नहीं पड़ा। दरअसल इमरोज भी उन व्यक्तियों में शामिल थे जो यह मानते थे कि साहिर लुधियानवी से अमृता का प्रेम एकतरफा था। इमरोज के अनुसार अमृता घरेलू किस्म की लड़की थीं जबकि साहिर फक्कड़ प्रवृत्ति के थे। वह अमृता को प्यार कर ही नहीं सकते थे। इमरोज और अमृता प्रीतम के रिश्तों पर एक किताब “अमृता इमरोज: ए लव स्टोरी” भी लिखी गई है।

अमृता प्रीतम का जन्म 31 अगस्त 1919 को गुजरांवाला पाकिस्तान में हुआ था। उनका बचपन लाहौर में बीता। देश के बंटवारे के वक्त वह दिल्ली आ गई थीं। उनकी मां की बचपन में ही मृत्यु हो गई थी। घर की जिम्मेदारियां कंधे पर आ जाने से उन्होंने बहुत जल्दी लिखना शुरू कर दिया था। उनकी पहली रचना उनकी किशोरावस्था में ही छप गई थी। शुरू में उनकी रचनाओं से ज्यादा चर्चा उनकी खूबसूरती की होती थी, पर उनमें वास्तविक प्रतिभा थी और जल्द ही दुनिया उन्हें गंभीरता से लेने लगी।

उन्होंने छह दशक लंबे अपने लेखकीय जीवन में 100 से ज्यादा किताबें लिखीं। “पिंजर” उनकी सर्वाधिक चर्चित रचना है, जिस पर बाद में फिल्म भी बनी। बीमारी के बाद उनकी मृत्यु 31 अक्तूबर 2005 को दिल्ली में हुई। उस समय वह 86 वर्ष की थीं। वह एक पुत्र और पुत्री की मां थीं। उनके एकमात्र बेटे की 2012 में मुंबई में हत्या कर दी गई थी।