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10 thoughts on “लेख भेजें

  1. Tejus

    ये खांसी भी कितनी अजीब होती है न! जिसे फल जाये उसे ऊपर उठा देती है और जिसे न फले उसे ऊपर ही उठा देती है! मुझे भी हुई थी स्कूल के ज़माने में! वैसे तो बीमार होना स्कूली दिनों में वरदान की तरह माना जाता है की चलो अब कुछ दिनों तक स्कूल जाने से छुटकारा तो मिला! परन्तु खांसी एक ऐसी बीमारी होती है की बीमार भी हो जाओ और छुट्टी भी ना कर पाओ! उस समय नेचुरोपैथी नहीं हुआ करती थी ना! लोग वैसे भी नेचुरल ही होते थे! जो होते वही दिखते भी थे! जो ईमानदार होता था वो ईमानदार होता था, उसे किसी को बताने या बनाने की ज़रुरत नहीं होती थी! हाँ तो हम बात कर रहे थे नेचुरोपैथी की, सॉरी खांसी की! ये भूलने की आदत भी ना! चलिए कम से कम अपने बच्चों की कसम खा के ६०० पन्नो का सुबूत तो नहीं भूला! फिर भी भूलना भूलना होता है! हम भूल गए रे हर बात मगर तेरा प्यार (४९ दिनों का) नहीं भूले, तभी तो दुबारा पटाने को चले थे! अब ये तो हमारी बदकिस्मती थी (चुनावों के बाद खुशकिस्मती) की पटा नहीं पाये! इस पटाने के चक्कर में अपना स्टिंग भी करा आये! देखिये मैं फिर पॉइंट से भटक गया! अब हम और आप को तो भटकना शोभा नहीं देता ना, भले कुछ आम आदमी भटक जाएँ! अब भटक जाएँ तो भटक जाएँ, बाद में सेक्युलर और नॉनसेक्युलर वाले तो हैं ना उन्हें अपने रस्ते पर लाने के लिए!
    हाँ तो खांसी भी आम आदमी को कितना ऊपर उठा देती है वो तो आने वाले वर्षों में एक शोध का विषय बन ही जायेगा, क्योंकि अभी तक हम यही जानते थे की ज्यादा दिनों की खांसी आम आदमी को सीधे ऊपर तक उठा सकती है! इसके कई विज्ञापन भी आते रहे हैं रेडिओ पर स्वाथ्य एवम जान कल्याण मंत्रालय द्वारा जनहित में जारी! अब तो मन की बात ही आते हैं!

    अब रही बात मफलर की तो बचपन में जब खांसी आती थी तो माँ कान से लेकर गले तक मफलर लपेट देती थी जिस से ठंढ ना लगे और खांसी ना बढे! असर भी होता था, खांसी काम हो जाती थी! पर वो हो सकता है बचपन के कारण हो जाया करता होगा, अब तो ना होती! आपने भी देखा है! बल्कि अब तो खांसी और मफलर का साथ सात जन्मो का हो गया है!

    खांसी का इलाज़ हो गया और मफलर का मौसम ख़त्म हो गया! लेकिन ये अच्छा नहीं हुआ जी! इधर ये कॉम्बिनेशन टुटा, उधर अंदर खाने की टूट-फुट सड़क पर आ गयी! मतलब खांसी किसी किसी के लिए लकी भी होता है! अब चाहे तो आपलोग इस शोध के लिए मेरा नाम भारत रत्न के लिए प्रस्तावित कर सकते हैं! जब हमारी पार्टी की सरकार बनेगी तो मुझे मिल जाएगी वरना मरणोपरांत तो मिलती नहीं! मेजर ध्यानचंद को भी नहीं मिली! लेकिन कल को अगर खांसी राष्ट्रीय बीमारी और मफलर राष्ट्रीय पोशाक बन जाये तो कोई ताज्जुब की बात नहीं होगी! खांसी को लेकर तो कोई किन्तु परन्तु नहीं है, लेकिन मफलर को नाम लिखे सूट से टक्कर जरूर मिल सकती है! या फिर ऐसा भी हो सकता है की ६ महीने मफलर और ६ महीने सूट राष्ट्रीय पोशाक बना रहे या फिर ऐसा भी हो सकता है की एक राष्ट्रीय पोशाक तो दूसरा राष्ट्रीय उप-पोशाक घोषित हो जाये कश्मीर में हुए गठबंधन की तरह! लेकिन जो भी हो मसरत तो लगेगा ही! ओफ़्फ़, भूल सुधर कर ‘मसरत’ को ‘मशक्कत’ पढ़ें!

    वैसे जी किसी गर्ग मुनि ने ये बुरा किया की बंदा खांस रहा हो और आप पानी देने के बजाये उसकी रिकॉर्डिंग कर लो! कर लिया तो कर लिया उसे लोगों को सुना भी दो! वैसे लोगो ने क्या पता चलना था खांसी की ही तो आवाज आनी थी पर बेड़ा गर्क हो आधुनिक टेक्नोलॉजी का की खांसी के साथ साथ छोड़े हुए दिलवर से दुबारा इलू इलू करने वाली बात भी रिकॉर्ड हो गयी! गर्ग मुनि को भी तब पता चला जब उन्होंने bass कम कर के और treble बढ़ा के उस रिकॉर्डिंग को वॉइस क्लारिटी मोड पर सुना! अब करें भी तो क्या करें, कमान से निकला हुआ तीर और जुबान से निकली हुई बात वापस तो हो नहीं सकती! उस में संसोधन भी नहीं हो सकता, हाँ बाद में उसे ये बताया जा सकता है की हमने किसी और परिप्रेक्ष्य में कहा था और लोगों ने कुछ और समझा!

    अब देखना ये है की हमारे इस व्यंग्य लेखन को किस परिप्रेक्ष्य में समझा जाता है. . . .I

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  2. Tejus

    संपादक महोदय, क्या आप सुझा सकते हैं की मैं अपना लेख कैसे भेज सकता हूँ! मैंने कोशिश की तो वो यहाँ कमेंट के तौर पर पोस्ट हो गया!

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  3. rajk.hyd

    अदरनेीय श्रेी अफ्जल जि , आप्ने इस ब्लोग से लाईन्स जेी का लेख हता क्यो दिया है ?

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  4. sachin pardeshi

    अफजल जी , यह अशोक सिंघलों के नाम खुला पत्र में पाठकों के कमेन्ट की सुविधा क्यूँ हटा ली गई है ?

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  5. zakir hussain

    सहेी कहा सचिन जेी, इस्लिये यहा लिख रहा हु.

    ज़ाहिद साहब, आपने जो सवाल उठाए है, उनमे काफ़ी कुछ सही है, लेकिन कई पे मुझे आपत्ति है. मसलन
    1. धार्मिक सीरियालो की बात है तो मुसलमान धार्मिक चरित्रो के फिलमांकन के विरोधी है. जीसस पे धारावाहिक मैं देख चुका हूँ.
    2. जाकिर नायक का विरोध तो मुस्लिम बहुल देशो मे भी हो रहा है. उनको बेन करने के लिए पाकिस्तान के लोगो ने सोशल मीडिया पे मुहिम भी चलाई है.
    3. सरकारी कर्मचारियो के धार्मिक त्यौहारो मे शरीक होने की बात पे कश्मीर घाटी भी देखिए. हमारे त्यौहार होली, दीवाली जैसे नही है.
    4. मेरे बहुत से दोस्त मुझे सलाम, हाय, हेलो बोलते हैं. कश्मीर के लोकल चैनल्स देखिए.

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  6. afzal khan

    कुछ टेक्निकल प्राब्लम है ,और हमारे वेब को देखने वाले इरफान साहब ने कहा है के आज रात तक ठीक हो जाये गा . आप लोगो को हो रही प्रेषानी के लिये खेद है .

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  7. vikas

    हमें तो जयचंद ने लूटा , गौरी में कहा
    दम था ।
    हमें तो गांधी ने लूटा , जिन्ना में कहा
    दम था ।
    हमें तो नेहरू ने लूटा , चीन में कहा दम
    था ।
    हमें तो केजरीवाल ने लूटा , ओवेसी में
    कहा दम था ।
    हमें तो अखिलेश ने लूटा , आजम में कहा
    दम था ।
    हमें तो साई ने लूटा , महुम्मद में कहा
    दम था ।
    हमें तो हिन्दुओं ने लूटा , मुसलमानों में
    कहा दम था ।
    हमारी किस्ती भी वहाँ
    डूबीं जहाँ सैकुलरिजम था ।

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  8. prasad joshi

    कट्टर हिंदुत्व की विचार धारा बढने लगी तो उसे रोकना चाहीये,
    कट्टर ईस्लामियत बढने लगे तो ऊसे रोकना चाहीये,
    कट्टर माओवाद बढने लगे तो ऊसे भी रोकना चाहीये,
    कट्टर राष्ट्रवाद बढे तो उसे भी रोकना चाहीये…
    हर तरह कि कट्टर विचार धारा को रोका जा सकता है.
    पर कट्टर बुद्धीजिवीयो को कभी रोका नही जासकता है. क्युंकी ये सब बुद्धीजिवी ईस भ्रम मे जिरहे है कि अच्छाइ और बुराइ कि सारी समज सिर्फ इनके पास है. और ईस पृथ्वी पर सदीयो से रहने वाला मानव बस एक वहशी दरींदा था. जिसे ना तो कुछ समझ थी और ना है. बुद्धीजिवीयो कि दृष्टीसे इस दरींदे मानव को Civilize करने की प्रक्रीया को परीवर्तन या विकास का नाम दिया गया. अब ये बुद्धीजिवी पुरी मानव जाती कि अच्छाइयो के ठेकेदार बने घुम रहे है. शांती के ठेकेदार बने घुम रहे है.
    हम आतंकवाद को खत्म कर सकते है क्युं की आतंकवाद एक बुरा दौर है मानव जाती का. हम जाती व्यवस्था और धार्मीक विद्वेष से भी ऊपर ऊठ रहे है. और मै सच कहता हु लोगो के दिलो मे इतनी नफरत नही है एक दुसरे के प्रती कि हर कोइ अपने काम धाम छोड छाड कर मरने मारने पर ऊतरने वाला है.
    पर ये बुद्धीजिवी है के मानते ही नही है. ये बुद्धीजिवी ने मन ही मन मे ये तै किया है के जातीय और धार्मीक महा प्रलय आने वाला है. इस सदिकी सबसे बडी और कभी भी न खत्म होने वाली समस्या ये बुद्धी जिवी है. हर साल लोग मर ते है, कुछ बुढापे कारण, बिमारी के कारण, किसी प्राकृतीक आपदा के कारण, अतर्गत कलह, विवाद, युद्ध, साप के काटने से, पाणी मे डुब कर, viral infection, road accident. ये नियम है हम सबको मरना है.
    पर ये बुद्धी जिवी है के लिखे जार हे है. मौत का कारण दंगे फसाद के अलावा और कुछ है ही नही. अपनी जिंदगी का सारा समय बस यही समस्या सुलझाने मे लगे हुवे है.
    धार्मीक कट्टर पंथीयो के साथ इन बुद्धी जिवी कट्टर पंथी भि ऐक बहोत बडी सामाजीक समस्या है

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